भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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“तमृचश्च सामानि च यजूंषि च ब्रह्म चानुव्यचलन्” ( अथ० सं० १५।६।८ ) “ऋचः सामानि छंदांसि पुराणं यजुषा सह उच्छिष्टाज्जज्ञिरे ।” ( अथ० सं० १५।९।२४ ) “ऋग्वेदं भगवोध्येमि.... इतिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदम् ।” ( छा० उ० ७।१।२ ) “इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः ॥” ( छा० उ० ७।१।४ ) इत्यादि रूप से वेद-मन्त्रों तथा उपनिषदों में इतिहास, रामायण, महाभारत और पुराणों का उल्लेख है। अतएव मन्त्र, ब्राह्मण, उपनिषद्, व्याकरणादि षडङ्ग, पूर्वोत्तर मीमांसा, इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र आदि का समन्वय करके ही जो वेदार्थ का निर्धारण किया जाता है, वही वेदार्थ का सम्यक् निर्धारण है, मनमाने ढंग से नहीं । अतएव महर्षि याज्ञवल्क्य ने अष्टादश विद्यास्थानों में सबका संकलन किया है। उनमें उन्होंने पुराणों का सर्वप्रथम स्थान माना है— “पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः । वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥” ( या० स्मृ० १।३ ) पुराण, न्यायवैशेषिक, पूर्वोत्तर मीमांसा, धर्मशास्त्र, छह अङ्गों ( व्याकरण, निरुक्त, शिक्षा आदि ) से युक्त चारों वेद इस प्रकार ये चौदह धर्म और विद्याओं के स्थान हैं । “बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।” ( म० भा० १।१।२६८ ) “इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् ॥” ( म० भा० १।१।२६७ ) अल्पश्रुत से वेद डरता है कि यह अल्पज्ञ अर्थ का अनर्थ करेगा, अतएव इतिहास-पुराण के द्वारा वेद का तात्पर्य समझना चाहिए । कुछ लोग कहते हैं “वेदों में ब्राह्मणों को ही पुराण माना गया है” पर वह असंगत है। गोपथब्राह्मण में “सब्राह्मणाः सोपनिषत्काः सान्वाख्यानाः सपुराणाः” ( गो० ब्रा० १।२।९ ) इस प्रकार ब्राह्मणों से पृथक् पुराणों का उल्लेख है । “प्रमाणेन खलु ब्राह्मणेन इतिहासपुराणानां प्रामाण्यमनुज्ञायते ।” ( ४।१।६२ गौ० सू० भा० ) इस वात्स्यायनभाष्य के अनुसार भी ब्राह्मण-ग्रन्थ इतिहास-पुराण का प्रतिपादन करते हैं। एतावता “ब्राह्मण- विशेष इतिहास-पुराण हैं ।” वात्स्यायनभाष्य का यह कथन केवल बृहदारण्यक के लिए ही है, अन्य स्थलों के लिए नहीं । अतः अन्य स्थलों के लिए वह कैसे प्रमाण होगा। पद्मपुराण को ईस्वीय शती का बतलाना भी सर्वथा निराधार ही है। प्रामाण्य तथा अप्रामाण्य-चर्चा “औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धस्तस्य ज्ञानमुपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात् ।” ( जै० सू० १।१।५ ) अर्थात् शब्द और अर्थ का सम्बन्ध नित्य है। प्रत्यक्ष एवं अनुमान से अनधिगत—अज्ञात अग्निहोत्रादिलक्षण धर्म का निमित्त ज्ञापक उपदेश अर्थात् विशिष्ट शब्द का उच्चारण ही होता है अर्थात् “अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः” इत्यादि नित्य वैदिक उपदेश ही धर्म में प्रमाण है और उक्त वैदिक वाक्यों से उत्पन्न होनेवाले ज्ञान का अव्यतिरेक अर्थात् संशय-विपर्यय-बाध-राहित्य भी सिद्ध है, क्योंकि उक्त वाक्यों से उत्पन्न ज्ञान का बाध नहीं होता, अतः वह भ्रमात्मक नहीं है और वह ज्ञान निश्चयात्मक होने से संशयात्मक भी नहीं है। शब्द और उसके अर्थ के सम्बन्ध के ज्ञानवान् नास्तिकको भी उक्त वाक्यों से स्वर्ग एवं अग्निहोत्र का कार्य-कारणभाव स्पष्ट ही मालूम होता है, अतः उक्त