रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा ३३ वाक्यों से "धर्म का ज्ञान उत्पन्न ही नहीं होता" यह भी नहीं कहा जा सकता। जो वस्तु जिस प्रमाण से विदित होती है उसका अभाव भी उसी प्रमाण से विदित होता है। यदि धर्म प्रत्यक्षादि से विदित होता तो उसका अभाव भी प्रत्यक्षादि से विदित हो सकता था। नेत्रगम्य रूप का अभाव श्रोत्र से विदित नहीं हो सकता। इसी तरह शास्त्रों से गम्य धर्म का अभाव प्रत्यक्षादि से सिद्ध नहीं हो सकता। प्रत्यक्षादि से अनुपलब्ध धर्म में या अलौकिक साध्यमा धन-भाव में वह उपदेशएवं तज्जन्य ज्ञान ही प्रमाण है और वह प्रमाण भी अनपेक्ष अर्थात् स्वतः है। ऐसे ज्ञान के प्रामाण्य के लिए ज्ञानान्तर या पुरुषान्तर की अपेक्षा नहीं होती। जैसे घटादि-कार्य की उत्पत्ति में ही साधनों की अपेक्षा होती है जलाहरणादि कार्य में उनकी अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही ज्ञान को अपनी उत्पत्ति में ही साधनों की अपेक्षा होती है; उत्पन्न ज्ञान अपने कार्य—विषय प्रकाश में अन्य की अपेक्षा नहीं रखता। अन्यथा यदि प्रथम ज्ञान को अपने प्रामाण्य के लिए प्रमाणान्तर की अपेक्षा होगी तो उस प्रमाण को भी प्रमाणान्तर की अपेक्षा होगी। ऐसी स्थिति में अनवस्था का प्रसंग अनिवार्य होगा। अतः प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः ही मान्य होता है। यदि विषय का बाध-ज्ञान तथा कारण-दोष का ज्ञान उत्पन्न हो तो तभी उनका अप्रामाण्य होता है। यही मत बादरायण महर्षि को भी मान्य है। श्रीबुल्के के अनुसार "वास्तोष्पति और सीता जो कि गृह और क्षेत्र के अधिष्ठाता देवता थे उनका महत्त्व अग्न्यादि देवताओं की अपेक्षा अल्प था; क्योंकि आर्यों का कुशल-क्षेम अग्न्यादि देवताओं पर निर्भर रहता था।" वे कहते हैं कि "सीता, क्षेत्रपति आदि कृषिसम्बन्धी देवताओं के कम महत्त्व का एक और कारण यह है कि प्रारम्भ में कृषि की अपेक्षा पशुपालन प्रधान रहा होगा।" उनके अनुसार यह सूक्त यद्यपि चौथे मण्डल का है जिसे वे प्राचीन मानते हैं, तथापि "इसकी रचना दशवें मण्डल के समकाल में होनी चाहिये; क्योंकि इसमें 'समा' शब्द का प्रयोग है जो दशवे मण्डल को छोड़कर अन्यत्र कहीं भी प्रयुक्त नहीं है।" वस्तुतः वेदार्थनिर्णय करने की पद्धति पाश्चात्यों की अपनी निजी है। उसका वैदिक साहित्य एवं वैदिक- परम्परा से कोई सम्बन्ध नहीं है। वे तथाकथित भाषाविज्ञान के अनुसार जिन शब्दों को अर्वाचीन मानते हैं उन शब्दों का जिन मन्त्रों में प्रयोग देखते हैं उन मन्त्रों को अर्वाचीन एवं जिनमें प्राचीन शब्दों को देखते हैं उन्हें प्राचीन मानते हैं। यही कारण है कि केवल मात्र 'समा' शब्द को देखकर चौथे मण्डल में आने पर भी, जिसे कि वे प्राचीन मानते हैं, इस सूक्त को नवीन मान लेते हैं। किन्तु वैदिक-दृष्टि से जैमिनि, शबर, कुमारिल आदि मनीषी शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध को नित्य मानते हैं। शब्दार्थसम्बन्ध की अनादि परम्परा पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि आदि वैयाकरण महर्षियों की दृष्टि से भी शब्द और शब्दार्थ का सम्बन्ध नित्य ही माना जाता है, अतः किसी शब्द को अर्वाचीन और किसी को प्राचीन मानना यह वैदिक-परम्परा के सर्वथा विरुद्ध है। आम तौर पर जिन शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध को हम परम्परा से सुनते और समझते चले आ रहे हैं, जिनके निर्माण का कोई काल प्रामाणिक नही सिद्ध होता, न हुआ और न होगा उन्हें अनादि मानना ही ठीक है। अपभ्रंश शब्द और उनके किसी नवीन अर्थ में प्रयोग के प्रामाणिक होने पर उनको सादि माना जा सकता है; तथापि ऐसे शब्द 'यदृच्छा' शब्द के नाम से व्यवहृत किये जाते हैं। इस तरह पद तथा पदार्थबोध से सम्पन्न आस्तिक एवं नास्तिक को आसानासाधारण वाक्य के श्रवणमात्र से वाक्यार्थ-बोध होता ही है। इसी लिए "अग्निहोत्रम् जुहुयात् स्वर्गकामः।" इस वाक्य के श्रवण से अग्निहोत्र-होम से स्वर्गप्राप्ति होती है ऐसा ज्ञान नास्तिक को भी होता ही है। ५