रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ रामायणमीमांसा द्वितीय हैं और स्वाभाविक भी है, लेकिन इस अभिन्नता के लिए वैदिक साहित्य से कोई प्रमाण उद्धृत नहीं किया जा सकता, क्योंकि जनक के सारे वृत्तान्त में रामकथा का कोई सङ्केत विद्यमान नहीं है ।” क्योंकि पूर्वोक्त युक्ति से यह तो स्पष्ट ही है कि जनक एवं विदेह कुल हैं। उनमें अनेक जनक एवं विदेह उत्पन्न हुए हैं। विशेष वर्णन के आधार पर सामान्य का निर्णय किया जाना स्वाभाविक ही है । अतः सामान्यरूप से प्रसिद्ध वैदिक जनक का विशेषरूप रामायण के वर्णन से निश्चित होना उचित ही है । इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान देने योग्य है कि रामायण, महाभारत तथा पुराणों का असाधारण सम्बन्ध है। रामायण आदि में वैदिक धर्म एवं वैदिक संस्कृति का ही वर्णन है । ये सभी ग्रन्थ वेद की प्रशंसा करते हैं और वेद को ही अपना मूल बतलाते हैं । वेदों में भी रामायण आदि से सम्बन्धित व्यक्तियों एवं घटनाओं का भी वर्णन है ही । इसके अतिरिक्त रामायण, महाभारत तथा पुराणों के रचयिता भी साधारण व्यक्ति नहीं हैं, किन्तु वे सर्वज्ञकल्प महर्षिवृन्द हैं। वे जितना वेद और वेदार्थ जानते थे, उतना भारतीय वैदिक विद्वान् भी नहीं जान सकते, फिर विदेशी विद्वानों को, जिनके आचार-विचार तक वैदिकविधानों के अनुकूल नहीं हैं एवं जिनका वेदाध्ययनाधिकार भी नहीं है, वेद तथा वेदार्थ-ज्ञान कितना हो सकता है ! इसके अतिरिक्त वेद की बहुत सी शाखाएँ कलिकाल में लुप्त भी हो जाती हैं । वाल्मीकि और व्यास आदि के समय में वेद की सभी शाखाएँ उपलब्ध थीं । महाभाष्यकार पतञ्जलि के समय में भी, आज की अपेक्षा अधिक शाखाएँ उपलब्ध थीं, क्योंकि महाभाष्य एवं पुराणों के अनुसार वेदों की ग्यारह सौ इकतीस ( ११३१ ) शाखाएँ प्रसिद्ध हैं। प्रत्येक शाखा की मन्त्रसंहिता, ब्राह्मण एवं उपनिषदें पृथक्-पृथक् होती हैं । अर्वाचीन देशी या विदेशी कोई भी विद्वान्, जिनके सामने यथाकथञ्चित् ९ या १० शाखाएँ मिलती हैं । फिर वे कैसे कह सकते हैं कि वैदिक जनक या अश्वपति का सम्बन्ध रामायण के पात्रों के साथ नहीं है या रामकथा का वेदों में अभाव है । इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान देने योग्य है कि लौकिक या वैदिक किसी भी ग्रन्थ में किसी के भी जीवन का समग्र वृत्तान्त नहीं मिल सकता, किन्तु कतिपय ही घटनाओं का वर्णन मिल सकता है। वाल्मीकिरामायण में भी तो राम के जीवन का पूरा वृत्तान्त कहाँ है । भगवान् राम ने ग्यारह हजार वर्षों तक राज्य किया । ग्यारह हजार वर्षों में केवल चालीस वर्षों की ही कुछ ही घटनाओं का वर्णन है । पुराणानुसार तो शतकोटि श्लोकों में रामचरित का वर्णन है, पर आज वह भी कहाँ उपलब्ध है ? “चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥” ( पद्मपु० ५।१।१४ ) अर्थात् राघवेन्द्र राम के चरित्र शतकोटि श्लोकों में विस्तृत हैं, उनका एक-एक अक्षर महापातकों को नष्ट करने की क्षमता रखता है । इसी तरह यह कथन भी असंगत है कि “वैदिक काल में रामायण की रचना हुई थी अथवा वैदिक काल में राम-कथा प्रसिद्ध हो चुकी थी । इसका विस्तृत निर्देश वैदिक साहित्य में कहीं नहीं पाया जाता” क्योंकि वैदिक काल कोई काल नहीं है और न ही कभी वैदिक साहित्य की रचना हुई है। “पूर्वे पूर्वेभ्यो वच एतदूचुः” ( तै० ब्रा० ३।१२।९२ ), “वाचा विरूपनित्यया” ( ऋ० सं० ८।७५।६ ) इत्यादि के अनुसार वेद अनादि एवं नित्य हैं, उनकी कभी रचना नहीं होती । ईश्वर ही उनके पठन-पाठनरूप सम्प्रदाय का प्रवर्तन करता है । प्रजापति, अग्नि, वसु, आदित्य आदि विभिन्न मन्त्रद्रष्टा नित्यसिद्ध वेदसूक्तों का दर्शनमात्र करते हैं, निर्माण नहीं । “ऋषिर्दर्शनात्” ( नै० २. ३. २ ) इस निरुक्त-वचन से तो यही सिद्ध होता है । ऐसी स्थिति में सभी काल वेद-काल हैं। व्यास के पुराणों एवं ब्रह्मसूत्रों में भी “अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा