रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 120, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्यायं कामिल बुल्के की रामकथा ४३ वस्तुतः श्रीबुल्के की पुस्तक ‘रामकथा’ में ऊपर वर्णित मन्त्र अशुद्ध छपा है । शुद्ध मन्त्र यों है— “प्र तद्दुःशीमे पृथवाने वेने प्र रामे वोचमसुरे मघवत्सु । ये युक्त्वाय पञ्च शतास्मयु पथा विश्वाव्येषाम् ॥” “ये देवा पञ्च शता शतानि रथान् युक्त्वाय अश्वैर्युक्त्वा अस्मयु अस्मत्कामाः सन्तः पथा यज्ञमार्गेण गच्छन्ति तेषाम् एषां देवानां विश्वावि देवानां लोके वा विशेषेण श्रावकगुणयुक्तं तत्स्तोत्रं दुःशीमे तन्नाम्नि पृथवाने पृथवानः पृथ्विः तस्मिन्वेने च असुरे बलवति रामे चैतेषु राजसु प्रवोचम् प्रब्रवीमि प्रख्यापयामि इत्यर्थः । मघवत्सु अन्येषु धनवत्सु च प्रख्यापयामीत्यर्थः ।” इस सूक्त में पञ्चदश ऋचाएँ हैं। इनके द्वारा अङ्गिरा ऋषि ऋत्विग्रूप से वृत होकर देवताओं की स्तुति करते हैं । जो देवगण पाँच सौ रथों को घोड़ों से युक्त करके मेरी कामना से अर्थात् मुझसे स्तुत्य होने की कामना से यज्ञ-मार्ग से आते हैं उन देवताओं के लोक में अथवा उन देवताओं के श्रावकगुण-युक्त स्तोत्र का मैं दुःशीम पृथवान्—बलवान् वेन तथा राम इन राजाओं में प्रवचन या प्रख्यापन करता हूं। इसी तरह अन्य मघवानों अर्थात् धनवानों में मैं उस स्तोत्र का प्रख्यापन करता हूं । श्रीबुल्के कहते हैं—ऋग्वेद में इक्ष्वाकु का केवल एक बार वर्णन हुआ है, इससे इतना ही प्रतीत होता है कि वे कोई राजा थे :— “यस्येक्ष्वाकुरुप व्रते रेवान् माराय्येधते” जिसकी सेवा में धनवान् और प्रतापवान् इक्ष्वाकु की वृद्धि होती है । पूरा मन्त्र इस प्रकार है :— “यस्येक्ष्वाकुरुप व्रते रेवान् मराय्येधते । दिवीव पञ्च कृष्टयः ।” ( ऋ० सं० १०।६०।४ ) मन्त्र का सायणानुसारी अर्थ यह है— जिस जनपद का इक्ष्वाकु राजा व्रत में अर्थात् रक्षणरूप व्रत या कर्म में वृद्धि को प्राप्त होता है, वह राजा रेवान् अर्थात् रयिवान्—धनवान् है और मरायी शत्रुओं का मारक है । इन दो विशेषणों से मालूम होता है कि वह जनता को धन-धान्य से समृद्ध बनाता है और परराष्ट्रकृत सब उपद्रवों का निराकरण करता है। उसके राज्य में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण एवं पञ्चम निषाद—सभी लोग द्युलोक में रहनेवाले सङ्कल्पसिद्ध देवताओं के समान सुखी रहते हैं । “ब्राह्मण ग्रन्थों तथा प्राचीन उपनिषदों में अश्वपति और जनक का, पहले पहल उल्लेख हुआ है । अश्वपति का रामायण के पात्रों से कोई सम्बन्ध निर्दिष्ट नहीं हुआ है। इतना ही विदित होता है कि वे ऐतिहासिक राजा थे जो सम्भवतः जनक के समकालीन थे । ब्राह्मण ग्रन्थों के जनक एवं रामायणीय जनक की अभिन्नता की समस्या का निर्णय असम्भव प्रतीत होता है ।” परन्तु यह कथन संगत नहीं। जब सिद्धान्ततः मन्त्र और ब्राह्मण दोनों ही वेद हैं और ऋग्वेद में दशरथ का वर्णन है ही इधर रामायण में भी, जो कि वेद का ही विस्तृत व्याख्यान है, दशरथ और अश्वपति का सम्बन्ध है ही फिर यह क्यों न मान लिया जाय कि महाराजा दशरथ की पत्नी कैकेयी महाराज केकयाधिपति अश्वपति की ही पुत्री हैं तथा वही भरत की माता और राम की विमाता भी हैं। संदिग्ध अर्थ का निर्णय असन्दिग्ध प्रमाणों से होना उचित है, अतएव श्रीबुल्के का यह कहना भी असंगत है कि “रामायण की सीता के पिता जनक का प्रसिद्ध वैदिक जनक के साथ सम्बन्ध तो जुड़ता है, यह स्पष्ट भी