भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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४२ रामायणमीमांसा द्वितीय बुल्के साहब का यह कथन भी सर्वथा अशुद्ध है कि "वाल्मीकिरामायण पर भी सीता (कृषि की अधिष्ठात्री देवी) का प्रभाव पड़ा है। यद्यपि रामायण में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं है, फिर भी अयोनिजा सीता के जन्म और तिरोधान के जो वृत्तान्त मिलते हैं वे सम्भवतः इस वैदिक सीता के व्यक्तित्व से प्रभावित हैं।" (पृ० २३), क्योंकि जिस वाल्मीकिरामायण की चर्चा आप कर रहे हैं उसी रामायण में यह भी स्पष्ट उल्लेख है कि महर्षि वाल्मीकि ने लव और कुश को वेद का अध्ययन करा कर वेदार्थ के उपबृंहण के लिए ही रामायण ग्रन्थ पढ़ाया— "स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ । वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ॥" (वा० रा० १।४।६) नागेश के अनुसार तत् तत् अर्थों का तात्पर्य-ग्रहण ही वेद का उपबृंहण है । उसी प्रयोजन के लिए श्रुति- तात्पर्यविषयीभूत अर्थ के प्रतिपादकरूप से ही महर्षि ने वेदार्थ परिनिष्ठित लव और कुश को रामायण ग्रन्थ पढ़ाया । इतर भारतीय संस्कृति में भी इतिहास और पुराण के द्वारा वेदार्थ का उपबृंहण या स्पष्टीकरण करना कहा गया है । ऐसी स्थिति में यह भली-भाँति सिद्ध हो जाता है कि वैदिक सीता से रामायण की सीता का वृत्तान्त प्रभावित नहीं, किन्तु स्पष्टतः वैदिक सीता का ही रामायण में स्पष्टीकरण हुआ है। वैदिक महर्षि वाल्मीकि के शब्दों में भी हलाग्र से सीता का आविर्भाव पहले बताया ही जा चुका है । श्रीबुल्के के अनुसार "भार्गवेय राम, औतपस्विनि राम तथा क्रातुजातेय राम इन तीनों रामों का परिचय ब्राह्मण ग्रन्थों से मिलता है । हो सकता है कि ये ऐतिहासिक भी हों, किन्तु रामायण के राम से इनका सम्बन्ध सम्भव प्रतीत नहीं होता ।" किन्तु उनका यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि रामायण के निर्विशेषण राम के ही किसी गुण के संयोग से किन्हीं अन्य लोगों में भी 'राम' शब्द का प्रयोग सम्भव हो सकता है, यह सच है । जैसे तैत्तिरीयारण्यक में 'राम' शब्द रमणीय पुत्र के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है— "संवत्सरं न मांसमश्नीयात् । न रामामूपेयात् । न मृण्मयेन पिबेत् । नास्य राम उच्छिष्टं पिबेत् । तेज एव तत् संश्यति ।" (तै० आ० ५।८।१३) वह एक वर्ष तक मांस का भक्षण न करे । स्त्री का भी संग न करे । मिट्टी के पात्र से पानी न पीये । उसका पुत्र उच्छिष्ट न पीये । इस प्रकार उस यजमान का तेज पुञ्जीभूत होता है । फिर भी केवल 'पुत्र' राम शब्द का अर्थ नहीं होता । रमणीय पुत्र या राम जैसा महत्त्वपूर्ण पितृभक्त धर्मनिष्ठ पुत्र ही 'राम' शब्द से यहाँ विवक्षित है । जैसे गौणी वृत्ति से सिंह-भिन्न देवदत्तादि मनुष्य में भी 'सिंह' शब्द का प्रयोग होता है उसी तरह रमणीयता गुण के सम्बन्ध से या राम के अन्यान्य उत्तम गुणों के योग से पुत्र में भी 'राम' शब्द का प्रयोग होता है । राजाओं को भी आनन्दरामायण के अनुसार राम ने अपना नाम प्रदान किया है । पाठसम्बन्धी विवेचना "प्र तद्दुःशीमे पृथवाने वेने प्र रामे वोचमसुरे मघवत्सु । ये युक्तवाय पञ्च शतास्मयु पथा विश्राव्येषाम् ॥" (ऋ० सं० १०।९३।१४) मैंने दुःशीम पृथवान, वेन और राम के लिए यह सूक्त गाया है। इन्होंने पाँच सौ घोड़े अथवा रथ जुतवाये जिससे मुझपर उनका अनुग्रह चारों ओर फैल गया ।