भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा ४१ नाना शक्तियों के आश्रय हैं। उनके श्रीअङ्ग में स्वाभाविक विचित्र सौन्दर्य ही नाना भूषण हैं ऐसी भावना करना ही उनके लिए नाना भूषणों का समर्पण है। सुन्दर मनवाले भक्तियुक्त भक्तों के विविध भावमय सौगन्ध्यों से युक्त शोभन मन का ही भगवच्चरणों में अर्पण सुमनों (पुष्पों) का अर्पण है, अथवा तुरीयवनसम्भूत नानागुणों से मनोहर अनन्तसौरभ पुष्पों का अर्पण है। भगवद्भावोद्दीप्त चिदग्नि में सर्वाभीष्ट कामों को प्रज्वलित करना ही उन्हें धूप- प्रदान है। जो आन्तर और बाह्य विविध ज्योतियों के भी ज्योति हैं, उनके अनिर्वाच्य अज्ञानमय तम का अपोहन ही उनके लिए दीपदान है। चित्तपात्र में सत् सौख्य का अनुसन्धान ही नैवेद्य-निवेदन है। परमताप-शमनहेतुभूत भगवान् के अखण्डानन्द स्वरूप का अनुसन्धान करना ही शीतल गङ्गामृत-समर्पण है। स्वीय सुरुचि सुरागादि भागों को भगवदात्मसात् कर देने की भावना ही ताम्बूल-समर्पण है। भगवान् में ही चतुर्वर्ग परिकल्पित करना फलार्पण है। सूर्य, चन्द्र, मन, बुद्धि आदि सर्वप्रकाशों के प्रकाशक स्वयंप्रकाश भगवान् ही हैं ऐसी भावना करना ही नीराजन- समर्पण करना है। अपने सर्वस्व को तथा स्वयं अपने को भगवान् के ही अर्पण कर देना दक्षिणा-समर्पण है। श्रीबुल्के की रामकथा में यह कथन कि “ऋग्वेद में 'सीता' नाम का भी एक बार उल्लेख हुआ है, लेकिन इस सीता का रामायण के उपर्युक्त अन्य ऐतिहासिक पात्रों से सम्बन्ध असंभव ही हैं, क्योंकि उसका व्यक्तित्व ऐतिहासिक न होकर सीता अर्थात् लाङ्गल-पद्धति के मानवीकरण का, परिणाम है। इस सीता का उल्लेख वैदिक काल से लेकर बराबर होता रहा है। इक्ष्वाकु, दशरथ तथा राम का ऋग्वेद में एक एक बार उल्लेख हुआ है और इनका पारस्परिक सम्बन्ध असम्भव नहीं है, परन्तु इनका कोई निर्देश नहीं मिलता। आगे चलकर इनका वैदिक साहित्य में और कहीं उल्लेख नहीं हुआ है।” (पृ० २४,२५) संगत नहीं है, क्योंकि सीतोपनिषद् तथा रामतापनीय आदि उपनिषदों में उन वैदिक पदार्थों का विस्तृत वर्णन है ही। सीता शब्द लाङ्गल-पद्धति का वाचक होता हुआ भी सर्वशक्तिमयी सर्वाधिष्ठात्री सीता की कृष्यधिष्ठात्री शक्ति के बोध में पर्यवसित होता हुआ सर्वाधिष्ठात्री महाशक्ति का भी बोधक है ही। वही चयन महायज्ञ के क्षेत्र की रेखारूप सीताओं की भी अधिष्ठात्री है। इसी दृष्टि से उसी महाशक्ति भगवती का वर्णन ब्रह्मविद्या, त्रयी तथा वार्त्ता विद्या के रूप में भी भारतीय साहित्यों में मिलता है— 'मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्तसमस्तदोषै- र्विद्यासि सा भगवती परमा हि देवी ।।' (दु० स० ४।९) सर्वदोष-रहित मोक्षार्थी मुनियों द्वारा आप ब्रह्मविद्यारूप से उपासित होती हैं। “देवी त्रयी भगवती भवभावनाय ।” (दु० स० ४।१०) भव-भावन के लिए आपकी ही त्रयी (वेदत्रयी) एवं तत्प्रोक्त यज्ञादिरूप में अभिव्यक्ति होती है। “वार्ता च सर्वजगतां परमातिहन्त्री ।” (दु० स० ४।१०) जगत् की बुभुक्षा, पिपासा, दारिद्रय आदि विपत्तियों का हनन करनेवाली आप ही वार्त्ता—कृषि, गोरक्ष्य, वाणिज्य आदि विद्या रूप में प्रकट होती हैं। यह पहले ही दिखलाया जा चुका है कि वही भगवती रक्तदन्तिका, शाकम्भरी आदिरूप से पुष्प, पल्लव, मूल और फलों से आढ्य तथा काम्य अनन्त रसों से युक्त शाकसञ्चय को धारण कर प्राणियों के क्षुधा-तृष्णा- मृत्युजनित भयों का हनन करती हैं। अतः वही महाशक्ति जैसे ऐश्वर्याधिष्ठात्री महालक्ष्मी, ब्रह्मविद्या, त्रयी, वार्त्ता आदि विद्याओं के रूप में अभिव्यक्त होती हैं वैसे ही लाङ्गल-पद्धति तथा चयन और क्षेत्र की रेखा में भी आविर्भूत होती हैं। ६