भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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४० रामायणमीमांसा द्वितीय समष्ट्याकारमानन्दरसप्रवाहैरलङ्कृतमभितस्तरङ्गिण्याः प्रवाहैरतिमङ्गलं ब्रह्मतेजोविशेषाकारैर- नन्तब्रह्मावर्तैरभितस्ततं नित्यमुक्तैरभिव्याप्तमनन्तचिन्मयप्रासादजालसङ्कुलत्पादविभूतिवैकुण्ठं भाति । तन्मध्ये चिदानन्दाचलो विभाति । तदुपरि ज्वलति निरतिशयानन्ददिव्यतेजोराशिः । तदभ्यन्तरे परमानन्दविमानं तदन्तश्चिन्मयासनम्, तत्पद्मकर्णिकायां निरतिशयदिव्यतेजोराश्यन्तरसमावीनं नारायणं पश्यति । ततोऽविद्याण्डं भित्त्वा विद्यापादमुलङ्घ्य विद्याविद्ययोः सन्धौ विष्वक्सेनवैकुण्ठपूरमायाति अनन्तदिव्यतेजोज्वालाजालैरमितोदनकं प्रज्वलन्तमनन्तबोधानन्दव्युहैरभितस्ततं शुद्धबोधविमानावल्भिः विराजितं परमकौतुकमाभाति । एवं बहूनि दिव्यानि धामान्यतिक्रम्य महायन्त्रं प्रज्वलति । तत्र षट्कोणचक्रे षड्दलपद्मं तत्कर्णिकायां प्रणवः, प्रणवमध्ये नारायणबीजम् ।''''दलेषु रामकृष्णषडक्षरमन्त्रौ ।" ; त्रिपादविभूतिमहानारायणोपनिषदः सप्तमाध्यायस्य सारसङ्कलनम् । उपर्युक्त त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् के प्रघट्टक के अनुसार साधक मायामय प्रपञ्च से विरक्त होकर अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के अधिष्ठान भगवान् की आराधना करता है। तमस्तोम को पारकर, मूलाविद्यापुर का अनुभव करके परमतेजोमय अनन्तानन्तसूर्यों की दिव्यद्युति से जगमगाते भगवद्धाम का दर्शन करता है । तदनन्तर एक से एक उत्तरोत्तर परम प्रकाश परमानन्द परम अचिन्त्य सारमय धर्मों का अनुभव करता हुआ वह महायन्त्र और उसमें पद्म तथा पद्म में प्रणव तथा राम, कृष्ण आदि भगवत्स्वरूपों के दिव्य मन्त्रों के दर्शन करता है। भगवान् की महामहिमा ही उनकी मूर्ति है, अथवा उनसे अभिन्न उनकी महाशक्ति ही उनकी मूर्ति है । उसमें भगवान् का सदा सन्निधान रहता है। उसी में उनका आवाहन, प्रतिष्ठापन एवं सन्निधापन, सन्निरोधन आदि सम्पादित किये जाते हैं । अज्ञान के कारण, दौर्मनस्य के कारण एवं साधन-वैकल्य के कारण पूजा में जिस अपूर्णता की सम्भावना होती है, सम्मुखीकरण द्वारा उसी का निराकरण किया जाता है । भगवान् वाणी, मन, चक्षु, श्रोत्र आदि के अविषय होने से भक्त के लिए अत्यन्त दूर होते हैं । उन्हीं अमितद्युति भगवान् का उनके तेजःपञ्जर से सर्वतोवेष्टन करना ही अवगुण्ठनी मुद्रा से उनका अवगुण्ठन है । सब देवता जिसके दर्शन की कामना करते हैं, उसी मूर्ति में उनका स्वागत किया जाता है । चित्सार, चिन्तामणिमय मन्दिर में अव्याकृत ब्रह्मात्मक महासिंहासन की भावना करना ही भगवान् के लिए आसन-समर्पण करना है। अपने में सर्वथा भगवदधीनत्व की भावना करना ही उनको नमस्कार करना है । जिनके भक्तिलेश से परमानन्द की प्राप्ति होती है उनकी स्वाभाविक पावनता का चिन्तन करना ही उनको पाद्य-समर्पण करना है। तापत्रय का हनन करनेवाले उनके परमानन्द स्वरूप की भावना ही उनको अर्घ्य- प्रदान है । सकल वेदादि सत् शास्त्रों के महातात्पर्यागोचर देवाधिदेव भगवान् की भावना अशुद्धों की भी शुद्धि का हेतु है—यही आचमन है, क्योंकि इसके स्मरणमात्र से उच्छिष्ट एवं अशुचि प्राणी भी शुद्ध हो जाता है । उनके सर्वशोधक मङ्गलमय स्वरूप का चिन्तन करना ही उन्हें आचमन-अर्पण करना है । सर्वकालातीत परिपूर्ण सुखात्मा भगवान् ही सर्वसौगन्ध्य एवं सुस्नेहसार-सर्वस्व के अधिष्ठान हैं ऐसी भावना ही उन्हें उद्वर्तन एवं अभ्यङ्ग का समर्पण करना है । दुग्ध-दधि-घृत-मधु-शर्करामय पञ्चामृतों एवं गङ्गादि तीर्थों में जो भी स्निग्धता और पावनता है, उसका भगवत्तत्त्वरूप में अनुसन्धान करना ही पञ्चामृतादि से स्नान कराना है । भगवान् के परमानन्दबोधसिन्धु में निमग्न रहने की भावना करना ही भगवान् का स्नपन है । भगवान् के मङ्गलमय श्रीविग्रह के तेजोमय परम प्रकाश से भगवान् का स्वरूप प्रावृत है ऐसी भावना करना ही भगवान् को वस्त्र-समर्पण करना है । निर्दृश्य निरावरणस्वरूप का अनुसन्धान करना ही उनके लिए चिन्मय सुवर्ण-वर्ण पीताम्बर का अर्पण है, अथवा निरावरण ब्रह्मस्वरूप को आवरण करनेवाला मायामय आवरण ही भगवान् को कनक-कपिश पिशङ्गवस्त्र का अर्पण है । त्रिवृत्कृत त्रिगुण के अधिष्ठान भगवान् ही हैं, यह भावना करना उनको यज्ञोपवीत अर्पण करना है। भगवान् सर्वगन्ध हैं, सम्पूर्ण दिशाओं में विकीर्ण यशःसौरभ से भगवान् समन्वित हैं, ऐसी भावना करना ही उन्हें गन्ध-समर्पण है । भगवान् स्वभाव से ही परम सुन्दर हैं तथा