रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय कामिल बुल्के की रामकथा ४५ स्वयम्भुवा" (म० भा० १२।२३२।२५), "अत एव च नित्यत्वम्" (ब्र० सू० १।३।२९), "शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्" (ब्र० सू० १।३।२८) आदि से यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि वेद-वाणी अनादि एवं अनन्त है। उसकी उत्पत्ति और विनाश नहीं होता। हाँ, सम्प्रदाय-प्रवर्तन में उत्पत्ति और सम्प्रदाय-लोप में विनाश का व्यवहार होता है। वेदों में नदी, पर्वत, राजा आदि अनित्य अर्थ मानने पर अनित्य अर्थ से अनित्य शब्द का सम्बन्ध मानना पड़ेगा। अतः शब्द और अर्थ का औत्पत्तिक स्वाभाविक नित्य सम्बन्ध मानने में विरोध होगा। इस पूर्वपक्ष का यह समाधान किया है कि शब्द से अर्थ की सृष्टि होती है, यह बात प्रत्यक्ष अर्थात् श्रुति से और अनुमान अर्थात् स्मृति से सिद्ध है। तथा च, नित्य शब्दों से अनित्य व्यक्तियों की उत्पत्ति मानने पर कोई विरोध नहीं होगा, क्योंकि व्यक्तियों के अनित्य होने पर भी जाति नित्य है। अतः नित्य शब्द का और नित्य जाति का नित्य सम्बन्ध सिद्ध ही है। जैसे न्यायाधीश आदि पदों के वाचक तथा इन्द्र आदि शब्द व्यक्ति के वाचक नहीं क्योंकि न्यायाधीश आदि पदों पर जो भी व्यक्ति आयेंगे वहीं न्यायाधीश तथा इन्द्र आदि कहलायेंगे। अतएव वेदों की नित्यता सिद्ध है। विष्णु-सहस्रनाम के 'रामो विरामो विरतः' में राम शब्द आता है। वाल्मीकि रामायण में भी कहा गया है कि उदीर्ण रावण के वध की कामनावाले देवताओं की प्रार्थना से महातेजा विष्णु ही रामचन्द्र के रूप में प्रकट हुए— “स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः । अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ॥” (वा० रा० २।१।७) इस दृष्टि से वेदों में आया हुआ विष्णु का नाम भी राम का ही नाम है। विष्णु की सब कथाएँ राम की कथाएँ हैं, अतः वेदों में राम की विशिष्ट कथाओं का पर्याप्त वर्णन है। ऐसी स्थिति में रामकथा-सम्बन्धी सामग्री का अभाव बताना अपनी दुरभिसन्धि एवं अनभिज्ञता का ही द्योतक है। महाभारत प्रथम अथवा रामायण ? दूसरे अध्याय के आरम्भ में श्रीबुल्के ने लिखा है "राम-कथासम्बन्धी आख्यान वाल्मीकिरामायण से पूर्व भी प्रचलित थे। इसका आभास महाभारत के द्रोणपर्व तथा शान्तिपर्व के संक्षिप्त राम-चरित के निर्देशों से भी मिलता है। ये आख्यान आजकल अप्राप्य हैं। इस प्रकार वाल्मीकिरामायण राम-कथा की प्राचीनतम विस्तृत रचना सिद्ध होती है।" वस्तुतः वाल्मीकिरामायण महाभारत एवं पुराणों की अपेक्षा बहुत प्राचीन रचना है। फिर महाभारत के द्रोणपर्व या शान्तिपर्व में रामचरित का निर्देश मिलने से यह कैसे सिद्ध हो सकता है कि वाल्मीकिरामायण से भी पूर्व राम-कथा प्रचलित थी ? असभ्यता, एकपत्नीव्रत और विकासवाद वास्तव में यह सब इतिहास बिगाड़नेवाले आजकल के तथाकथित ऐतिहासिकों की दुर्बुद्धि का परिणाम है जिसके आधार पर कहा जाता है कि वाल्मीकिरामायण की अपेक्षा महाभारत प्राचीन ग्रन्थ है, क्योंकि महाभारत में असभ्य एवं जङ्गली युग का प्राधान्येन वर्णन है। तभी उसमें कुन्ती, द्रौपदी आदि का अनेक पुरुषों से सम्बन्ध वर्णित है। रामायण उसकी अपेक्षा अर्वाचीन है, क्योंकि उसमें एकपत्नीव्रत और पातिव्रत्य आदि का वर्णन है। परन्तु यह सब नितान्त अशुद्ध और मनगढन्त कल्पना है, क्योंकि पुराण-आदि के रचयिता महर्षि व्यास ने वाल्मीकि और उनकी रामायण का महत्त्व मानकर ही अपनी विशाल कृति महाभारत में रामचरित्र का वर्णन किया है, यह वाल्मीकि- रामायण-माहात्म्य के वर्णन से भली-भाँति विदित होता है।