भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 123

४६ रामायणमीमांसा द्वितीय उत्तरकाण्ड की अर्वाचीनता आगे चलकर श्रीबुल्के ने वाल्मीकिरामायण के पाठ-भेद की चर्चा की है। उन्होंने यह बताया है कि “उत्तरकाण्ड की रचना बहुत बाद में हुई है, क्योंकि उसके तीनों पाठों में महत्त्वपूर्ण अन्तर नहीं है, जब कि शेष काण्डों में स्थान स्थान पर यथेष्ट पाठ-भेद उपलब्ध हैं। दाक्षिणात्य पाठ में सीता-त्याग का कारण यह बताया गया है कि भृगु ने अपनी पत्नी की हत्या के कारण ही विष्णु को शाप दिया था। यदि उत्तरकाण्ड प्रारम्भ से रामायण का एक अङ्ग होता तो अन्य काण्डों की तरह इस काण्ड में भी परिवर्तन उपलब्ध होते।” पर ये सब विचार असङ्गत ही हैं। दाक्षिणात्य पाठ, गौडीय पाठ एवं पश्चिमोत्तरीय पाठ सम्प्रदाय-भेद से हुए हैं। काश्मीर तथा नेपाल की प्रतियों में भी पाठ-भेद पाया जाता है। बड़ौदा के शोध-संस्थान में इन प्रतियों का उपयोग भी किया जा रहा है। प्राचीन काल में कण्ठस्थ विद्याओं का ही सर्वाधिक महत्त्व होता था। वेदों के सम्बन्ध में आज भी वही परिपाटी प्रचलित है। दुर्गासप्तशती में भी, जिसके बहुत ही अधिक अनुष्ठान आज भी गौड़, मैथिल एवं दाक्षिणात्यों में प्रचलित हैं, पाठ-भेद उपलब्ध हैं। पाठ-भेद में कमी होने से उत्तरकाण्ड की अर्वाचीनता मानना निष्प्रमाण है। “सत्यारोपे निमित्तानुसरणं न तु निमित्तमस्तीत्यारोपः” इस न्याय के अनुसार आरोप होने पर ही उसके निमित्त का अनुसरण किया जाता है, यह नहीं कि निमित्त के आधार पर आरोप किया जाय। शुक्ति में रजत का आरोप होने पर ही सादृश्यादि निमित्तों को आरोप का हेतु माना जाता है, यह नहीं कि शुक्ति एवं रजत का सादृश्य है, इसलिए शुक्ति में रजत का आरोप अवश्य ही किया जाय। इस दृष्टि से, पाठ-भेद होने पर उसके निमित्त का अन्वेषण करना चाहिये न कि पाठभेद नहीं है, इसलिए उसको वाल्मीकिकृत रामायण ही न माना जाय। वैदिक दशरथ बनाम रामायणीय दशरथ दशरथ के सम्बन्ध में बुल्के कहते हैं — “चत्वारिंशद्दशरथस्य शोणाः सहस्रस्याग्रे श्रेणि नयन्ति ।” (ऋ० सं० १।१२६।४) यानी दशरथ के भूरे रङ्ग के चालीस घोड़े एक हजार घोड़ों के दल का नेतृत्व कर रहे थे।” वस्तुतः यह सात ऋचाओं का सूक्त है। आदि से पाँच ऋचाओं के ऋषि कक्षीवान् हैं। मन्त्रों का द्रष्टा या वक्ता ऋषि होता है। मन्त्रों द्वारा जिसका निरूपण होता है, वह देवता होता है। “या तेनोच्यते” (अनु० २।५।१२५)। सूक्त के भाष्यारम्भ में ही सायण ने एक प्रसिद्ध इतिहास का वर्णन किया :— दीर्घतमा महर्षि के पुत्र कक्षीवान् ने ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते हुए वेदाध्ययन के लिए चिरकाल तक गुरुकुल में निवास किया तथा वेदों का भली भांति अध्ययन कर व्रतों का यथायोग्य परिपालन किया। अनन्तर गुरु की अनुज्ञा लेकर उन्होंने अपने घर की ओर प्रस्थान किया। रात्रि को मार्ग में ही उन्होंने विश्राम किया। वही भावयव्य का पुत्र स्वनय नाम का नृपति अपने अनुचरों के साथ सैर करता हुआ अकस्मात् कक्षीवान् के पास आया। कक्षीवान् सहसा जाग उठे। उन्होंने स्वनय को अपने सम्मुख खड़ा पाया। कक्षीवान् सहसा प्रतिबुद्ध होकर उठे ही थे कि राजा ने उनका हाथ पकड़कर उनको अपने आसन पर बैठा लिया और उनके सौन्दर्य से मुग्ध होकर उन्हें अपनी कन्याएँ प्रदान करने की इच्छा व्यक्त की। उनका नाम, गोत्र आदि पूछा। कक्षीवान् ने अपने पिता और अपना वृत्तान्त बताया। राजा ने संभाव्य (कुलीन) समझ कक्षीवान् को अपने घर ले जाकर मधुपर्क, वस्त्र, माल्य आदि से पूजन किया और रथ सहित दस कन्याएँ, दो सौ निष्क (सुवर्णमुद्राएँ), सौ घोड़े, सौ बैल और एक हजार साठ गौएँ उन्हें प्रदान कीं। पुनश्च एकादश रथ भी दिये। कक्षीवान् ने सब सामग्री लेकर अपने पिता दीर्घतमा को अर्पित कर दी।