रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय कामिल बुल्के की रामकथा ४७ एक सौ पचीसवें (१२५) सूक्त में दान की स्तुति है, अतः दान ही उसका देवता है। उपर्युक्त विषय ही उस सूक्त के मन्त्रों में वर्णित है - “प्राता रत्नं प्रातरित्वा दधाति तं चिकित्त्वान् प्रतिगृह्या नि धत्ते । तेन प्रजां वर्धयमान आयू रायस्पोषेण सचते सुवीरः ॥” (ऋ० सं० १।१२५।१) अर्थात् स्वनय नाम के राजा ने प्रातःकाल ही मेरे समीप आकर रत्न—रमणीय रत्नादिक मेरे सामने रखे। उन स्थापित समस्त वस्तुओं को मैंने निर्दुष्ट जाना और स्वीकार कर उन्हें अपने पिता को समर्पित कर दिया । “उस निष्क आदि से पुत्र, भृत्य आदिरूप प्रजा का पोषण एवं जीवन-संवर्धन करते हुए शोभन वीरों से युक्त धनों के पुनः पुनर्वर्धन से वह राजा संगत या समुपयुक्त हो ।” राजा के लिए ऋषि का यह आशीर्वाद है। एक सौ छब्बीसवें (१२६) सूक्त की पाँच ऋचाओं के भी वही कक्षीवान् ऋषि हैं। उनमें भी भावयव्या- त्मज राजा स्वनय के दान की ही स्तुति है। तीसरे मन्त्र में कहा गया है कि राजा स्वनय के दिये हुए श्यामवर्ण के घोड़ों से युक्त ऐसे दस रथ मेरे समीप उपस्थित हुए जिनमें सुन्दरी नवोढ़ा वधुएँ बैठी हुई थीं। स्वनय के दिये हुए एक हजार साठ गायों का समूह भी मेरे पास आया। अपना परोक्षरूप से निर्देश करते हुए ऋषि कहते हैं—उन सबको स्वीकार कर कक्षीवान् ने सन्निहित दिनों में ही पिता को अर्पित कर दिया । 'अभिपित्व' और 'प्रपित्व' शब्द सन्निहित-काल के बोधक हैं । “उप मा श्यावाः स्वनयेन दत्ता वधूमन्तो दश रथासो अस्थुः । षष्टिः सहस्रमन्व गव्यमागात् सनत् कक्षीवां अभिपित्वे अह्नाम् ॥” (ऋ० सं० १।१२६।३) चतुर्थ मन्त्र में उसी दस रथवाले कक्षीवान् का ही वर्णन है । "चत्वारिंशद्दशरथस्य शोणाः सहस्रस्याग्रे श्रेणिं नयन्ति । मदच्युतः कृशनावतो अत्यान् कक्षीवन्त उद्मृक्षन्त पज्रा ॥” (ऋ० सं० १।१२६।४) दस रथवाले सहस्रसंख्यक अनुचरों या सहस्रसंख्यावाले गो-यूथों से युक्त कक्षीवान् के आगे-आगे लाल वर्ण के चालीस घोड़े श्रेणीबद्ध होकर रथों को अभिमत प्रदेश में ले जाते हैं। अथवा चालीस घोड़े अश्व-नियुक्त रथों को श्रेणीबद्ध बनाते हैं। कक्षीवान् के अनुचर उन घोड़ों के मार्गश्रमजनित स्वेद का अपनोदन करने (हटाने) के लिए उत्तम रूप से मार्जन करते हैं। कक्षी अश्वबन्धनी रज्जु का नाम है। उस रज्जु को रखनेवाले कक्षीवान् ऋषि के अनुचर भी कक्षीवान् हुए । वृद्ध राजा कलिङ्ग ने अपनी रानी में पुत्रोत्पादन के लिए दीर्घतमा ऋषि से प्रार्थना की, परन्तु लज्जाव- शात् रानी ने स्वयं उनके पास न जाकर अपने ही भूषण-वस्त्रों से अलङ्कृत कर उशिक नामवाली अपनी दासी को भेज दिया। महर्षि ने योगबल से सब जान लिया और मन्त्रपूत जल के द्वारा उसे ऋषि-पुत्री बना लिया और उसमें गर्भाधान किया। उसीसे कक्षीवान् ऋषि की उत्पत्ति हुई। श्रीसायण ने १२५ वें सूक्त के आरम्भ में यह भी कहा है कि अश्वबन्धनी रज्जु के सम्-बन्ध से क्षत्रिय-सम्बन्ध सूचनार्थ ही ऋषि का कक्षीवान् नाम भी हुआ था । अस्तु, कक्षीवान् ऋषि के, अश्व-बन्धनी रज्जु से युक्त अनुचर, घास आदि तथा अन्न आदि से युक्त होकर उन घोड़ों की मार्जनादि परिचर्या करते हैं। वे घोड़े भी मद-स्रावी हैं अर्थात् मत्त या अत्यन्त प्रबल हैं अथवा शत्रुओं का मद चूर्ण करनेवाले हैं और कृशनावान् अर्थात् सुवर्णमय भूषणों से युक्त हैं और अत्य अर्थात् निरन्तर चलनेवाले हैं।