रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 131, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्रन्थ लिखने की दृष्टि से कई ग्रन्थकारों ने ऐसा किया भी है, परन्तु उससे सम्पूर्ण चरित्र के वर्णन पर कोई प्रतिबन्ध नहीं आता । रावणवध, भट्टिकाव्य, जानकीहरण, अनर्घराघव, बालरामायण आदि का वैसा रूप होने पर भी, महाकवि कालिदास का रघुवंश वैसा नहीं है । कालिदास ने बालकाण्ड के—'मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः' की चर्चा करते हुए इसे प्रथम काव्य माना है । हर्षवर्धन ने भी वैसा ही माना है। शैली की दृष्टि से कवि किसी प्रसंग में कभी एक तरह की शैली अपनाता है तो कभी दूसरी तरह की। क्या अन्य काण्डों की शैलियों की अपेक्षा सुन्दरकाण्ड की शैली भिन्न नहीं है ? सुन्दरकाण्ड के जैसे अनुप्रासबहुल गम्भीर पाण्डित्यपूर्ण श्लोक क्या अन्यत्र हैं ? फिर क्या इतने से ही सुन्दरकाण्ड को प्रक्षिप्त मान लें ?
बालकाण्ड में उर्मिला-लक्ष्मण का विवाह होने को भी श्रीबुल्के उस काण्ड के प्रक्षिप्त होने का कारण कहते हैं। अयोध्याकाण्ड में कहीं उर्मिला का उल्लेख नहीं मिलता। अरण्यकाण्ड में लक्ष्मण को अविवाहित कहा कहा गया है—"अकृतदारः" (वा० रा० ३।१८।१), यह कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि “स्वेच्छया श्लक्ष्णया वाचा स्मितपूर्वमथाब्रवीत्” (वा० रा० ३।१८।४) से स्पष्ट विदित होता है कि श्रीराम ने शूर्पणखा से परिहास करते हुए वैसा कहा है। अतएव नागेश कहते हैं “परिहासविनोदेन” अर्थात् श्रीराम ने परिहास विनोद में ही उससे बातें की थीं, अन्यथा "अपूर्वी भार्यया चार्थी" (३।१८।४) यह असंगत होगा ? उसका अर्थ है—लक्ष्मण अपूर्वी इससे पहले वे भार्यास्पर्श-सुख से अपरिचित हैं, अतएव भार्यार्थी हैं, अतः परिहास करते हुए श्रीराम ने, धातुओं के अनेक अर्थ होने से, असंनिहितदार के अर्थ में ही 'अकृतदार' शब्द का प्रयोग किया है। नागेश आदि ने ऐसी ही व्याख्या भी की है। अतः 'अकृतदार' इस शब्द-मात्र के आधार पर लक्ष्मण के विवाह का अपलाप नहीं किया जा सकता। इससे विपरीत शास्त्रीय व्यवस्था तो यह है कि पूर्व प्रसंग के अनुसार ही उत्तर प्रसंग भी लगाया जाता है। जब बालकाण्ड में लक्ष्मण का विवाह वर्णित है तब तो उसी के अनुसार अकृतदार शब्द का 'असंनिहितदार' अर्थ ही संगत है। इस प्रकार अर्थनिर्धारण मीमांसा के उपक्रम-न्याय से किया जाता है।
“यावतोऽश्वान् प्रतिगृह्णीयात्तावतो वारुणान् चतुष्कपालान् निर्वपेत् ॥” (तै० सं० २।३।१२।१)
यह ब्राह्मणवचन है। इसका प्रतीतिक अर्थ यह है कि जितने घोड़ों का प्रतिग्रह करे उतने वारुण चतुष्क- पाल पुरोडाशों का निर्वाप करना चाहिये, परन्तु यह उपक्रम के विरुद्ध है। उपक्रम के अनुसार, यह इष्टि घोड़े लेनेवाले के लिए नहीं है, किन्तु देनेवाले के लिए है । “प्रजापतिर्वरुणायाश्वमानयत् स जलोदरेण गृहीतोऽभवत् । एतान् वारुणांश्चतुष्कपालानपश्यत्तन्निरवपत् ॥' इसके अनुसार विधिवाक्य के उपक्रम में कहा गया है कि प्रजापति ने वरुण को अश्व प्राप्त कराया (दिया) । इससे उसे जलोदर हो गया। तब प्रजापति को वारुण-चतुष्कपालों का दर्शन हुआ । उनका निर्वाप करने से प्रजापति रोगमुक्त हुए। अतः उपक्रम के अनुसार ही 'प्रतिगृह्णीयात्' का 'प्रतिग्राहयेत्' ऐसा अर्थ किया जाता है। अतः मीमांसा आदि शास्त्र न जानने और परिहास-विनोद का अभिप्राय न जानने के कारण ही श्रीबुल्के ने लक्ष्मण के अविवाहित होने की कल्पना कर ली। जब तीनों अन्य भ्राताओं का विवाह हुआ तो लक्ष्मण का विवाह क्यों नहीं हुआ। इसका भी तो कुछ कारण होना चाहिए। ठीक वाल्मीकि के अनुसार ही गोस्वामीजी ने भी बालकाण्ड में चारों भ्राताओं के विवाह का वर्णन लिखा है— जसि रघुबीर ब्याहु बिधि बरनी । सकल कुँअर ब्याहे तेहि करनी ॥ ( रा० मा० १।२३५।१ ) ऐसी स्थिति में अरण्यकाण्ड में राम ने परिहास, विनोद में ही लक्ष्मण के सम्बन्ध में कहा है। यह सहज भावसे समझ में आ सकता है ।