भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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'अहं कुमार मोर लघु भ्राता' (रा० मा० ३।१६।६) यहाँ भी उनका यही तात्पर्य था, जैसे तुम (शूर्पणखा) विवाहित होने पर भी, तत्काल पति न होने से-ही, अपने को कुमारी कहती हो उसी तरह लक्ष्मण भी असंनिहितदार होने के कारण कुमार हैं । भरत का भी तो विवाह अयोध्याकाण्ड में वर्णित नहीं है, फिर क्या उन्हें भी अविवाहित मानें ? बुल्के तो भरत के भी सम्बन्ध में इसी तरह लिखते हैं—"बाल एव तु मातुल्यं भरतो नायितस्त्वया ।” (वा० रा० २।८।२८) में भरत की बाल्यावस्था कही गयी है। लेकिन बालकाण्ड में युधाजित् मिथिला पहुँचकर कहते हैं—कैकेय भरत को सस्त्रीक देखना चाहते हैं। इसके बाद चारों भाइयों के विवाह का वर्णन किया जाता है। लेकिन मिथिला में युधाजित् का और उल्लेख नहीं होता। बालकाण्ड के अन्तिम सर्ग में दशरथ भरत को युधाजित् के साथ राजगृह में भेज देते हैं और इसके बाद बहुत समय बीत जाने का उल्लेख 'बहून्नृतून्' (वा० रा० १।७७।२५) से है, फिर भी रामाभिषेक की तैयारी के समय भरत को बालक कहा गया है।” परन्तु उक्त सब बातें तात्पर्य-ज्ञान न होने से ही उठती हैं। साधारण शास्त्रज्ञ भी समझता है कि दृष्टार्था- पत्ति के समान ही श्रुतार्थापत्ति भी प्रमाण है। जिस प्रकार देवदत्त दिन को भोजन नहीं करता और मोटा दिखता है तो बिना देखे और बिना बताये ही समझा जाता है कि वह रात को भोजन करता है। उसी प्रकार देवदत्त जीवित है और घर में नहीं है इतना सुनकर ही देवदत्त का बाहर होना सिद्ध होता है। ठीक इसी न्याय से जब बालकाण्ड के ७३ वें सर्ग में स्पष्ट यह वर्णन है कि "मिथिला में जिस दिन राजा दशरथ ने गोदान किया उसी दिन केकयराज- पुत्र युधाजित् आये। महाराज से मिलकर कुशल-प्रश्न के बाद उन्होंने अपने पिता का सन्देश सुनाया और यह भी कहा कि पिताजी मेरे भगिनी-पुत्र भरत को देखना चाहते हैं। मैं अयोध्या गया था, पर सुना कि आप लोग पुत्रों के विवाहार्थ मिथिला गये हैं तो मैं यहाँ आया हूँ। दशरथ ने उनका सम्मान किया। अब मिथिला के अन्य प्रसङ्गों में युधाजित् की चर्चा न होने पर भी इससे उनका मिथिला आना तो सिद्ध ही है। फिर मिथिला में विवाहपर्यन्त उनके रहने तथा भोजन-पान करने का भी परिज्ञान हो ही जाता है। "कैकेय भरत को सस्त्रीक देखना चाहते हैं" श्रीबुल्के का यह कथन—अत्यन्त मिथ्या है। सम्भवतः, संस्कृत न समझने के कारण उन्होंने भ्रान्ति से 'स्वस्रियम्' का अर्थ 'सस्त्रीक' समझ लिया हो। यही है श्रीबुल्के के रिसर्च का नमूना। वस्तुतः 'स्वस्रियम्' का अर्थ भागिनेय या भानजा ही है। 'बाल एव तु मातुल्यं' के अनुसार, यह नहीं सिद्ध होता कि भरत विवाह के योग्य ही नहीं थे। क्योंकि दशरथ आदि वयोवृद्धों की अपेक्षा बीस वर्ष तक के लड़के बालक ही माने जाते हैं। आज भी तो २० वर्ष से नीचे के लोग नाबालिग माने जाते हैं। एम० पी० तथा एम० एल० ए० आदि के निर्वाचन के अयोग्य कहे जाते हैं। इस अवस्था में यदि कोई चुनाव जीत भी जाय तो नाबालिग प्रमाणित होने से उसका निर्वाचन अवैध माना जाता है। फिर यहाँ तो मन्थरा भेद-नीति का प्रयोग करती हुई कैकेयी को सम्बोधित कर रही है। "कैकेयी, राजतन्त्र में ज्येष्ठ पुत्र को ही राज्य मिलता है। तुम्हारा पुत्र भरत राजवंश से पृथक् हो जायगा। राम अकण्टक राज्य पाकर भरत को देशान्तर भेज देंगे अथवा लोकान्तर में ही भेज देंगे। संनिकर्ष से स्थावरों में भी सौहार्द पैदा होता है। परन्तु तुमने तो भरत को बाल्यावस्था में ही ननिहाल भेज दिया" इत्यादि। फिर जब अयोध्याकाण्ड के अनुसार राम का विवाह मन्थरा संवाद के पहले हो चुका था तो भरत के विवाह में आपत्ति ही क्या हो सकती थी ? क्योंकि प्रायः सभी रामायणों के अनुसार पुत्रेष्टि-यज्ञ में प्राप्त चरु से ही चारों भ्राताओं का, कुछ ही घड़ी-पल के अन्तर से, जन्म हुआ था। तब क्या कारण है कि राम बालक नहीं थे और भरत बालक रह गये । 'बहून् ऋतून्' का भी कोई विरोध नहीं पड़ता। विवाह से आते ही, भरत मातुल-कुल चले गये। राज्याभिषेक की बात तो कुछ ऋतुओं के ही पश्चात् नहीं अनेक वर्षों के बाद की है। फिर भरत बहुत ऋतु मातुलकुल में रहे तो क्या विरोध है ?