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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५६ रामायणमीमांसा तृतीय श्रीबुल्के कहते हैं "१ म और ७ म काण्ड कम से कम दूसरी शती के हैं।" पर पूर्वोक्त युक्तियों से यह कथन निःसार ही सिद्ध होता है। एच० याकोबी के अनुसार "प्रचलित रामायण का काल पहली या दूसरी शती है। एम० विण्टरनित्स इसे ईसा की दूसरी शती से अधिक प्राचीन समझते हैं। सी० चिन्तामणि वैद्य इसका काल दूसरी ई० शती पूर्व मानते हैं। परन्तु कालिदास के समय रामायण ने अपना पूर्ण रूप ले लिया था। महाभारत के आरण्यकपर्व के रचना-काल में बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की कुछ सामग्री प्रचलित हो गयी थी। अतः अधिक सङ्गत है कि प्रचलित रामायण का रूप दूसरी शती ई० के बाद का नहीं है।" परन्तु यह सब अटकलमात्र है। किसी के पास रामायण के काल का निर्णय करने के लिए ठोस प्रमाण नहीं है। इन अटकलबाजियों का कोई भी आधार नहीं है। रघुवंश के महाकवि कालिदास विक्रम के समय के ही हैं; अतः विक्रमीय प्रथम शती की अपेक्षा भी रामायण का साङ्गोपाङ्ग पूर्ण रूप सुतरां उनसे बहुत पूर्व का है। महाभारत भी व्यास भगवान् की कृति है। उनका काल विक्रम से तीन हजार वर्ष से भी पुराना है। अतः आरण्यकपर्व की रामकथा से भी प्रचलित रूप की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। संक्षिप्त संकलन के कारण आधुनिकों को उससे कुछ सामग्री का ही प्रचलन प्रतीत होता है। आदिरामायण के सम्बन्ध में श्रीबुल्के कहते हैं कि "आदिरामायण से प्रचलित रामायण का रूप इतना भिन्न है कि इस महत्त्वपूर्ण विकास के लिए कई शतियों की आवश्यकता प्रतीत होती है; अतः वाल्मीकिकृत रचना कम से कम तीसरी शती ई० पूर्व की होगी। कई विद्वान् वाल्मीकि का काल और प्राचीन मानते हैं।" पर यह भी निरर्थक उदारता-प्रदर्शन है। पहले तो आदिरामायण कौन है ? इसका स्पष्ट उत्तर यही है कि जहाँ रामायण का जन्म हुआ और प्रचार हुआ, जहाँ करोड़ों मनुष्य उसके अनुसार राम की उपासना करते हैं, जहाँ लाखों व्यक्ति रामायण का पाठ, अनुष्ठान करते हैं एवं जहाँ वाल्मीकिरामायण के आधार पर सहस्रों पुस्तक-पुस्तिकाएँ निर्मित हुईं, वहाँ प्रचलित वाल्मीकिरामायण से भिन्न कोई तथाकथित आदिरामायण नहीं है। श्रीबुल्के कहते हैं कि "प्रामाणिक वाल्मीकिकृत रामायण से बौद्ध-धर्म की ओर निर्देश नहीं मिलता, अतः इसकी रचना बुद्ध के पूर्व ही अथवा पांचवीं शती ई० पूर्व में हुई होगी। यह एम० मानियर विलियम्स आदि का प्रधान तर्क है। लेकिन बौद्धसाहित्य जातकों की सामग्री के विश्लेषणसे स्पष्ट है कि त्रिपिटक के रचना-काल में रामकथासम्बन्धी स्फुट आख्यानकाव्य प्रचलित हो चुका था। लेकिन रामायण की रचना नहीं हो पायी थी। डॉ० याकोबी रामायण का रचनाकाल ई० पूर्व छठी और आठवीं शती के बीच में समझते हैं। अतः अधिक सम्भव प्रतीत होता है कि वाल्मीकि ने लगभग ३०० ई० पू० अपनी अमर रचना की सृष्टि की हो। इसकी पुष्टि इससे भी होती है कि पाणिनि-सूत्रों में रामायण अथवा वाल्मीकि का उल्लेख नहीं है, लेकिन उनके समय में रामकथा प्रचलित हो गयी होगी; क्योंकि सूत्रों में कैकेयी (पा० सू० ७।३।२), कौशल्या (पा० सू० ४।१।१५५) तथा शूर्पणखा (पा० सू० ६।२।१२१) की ओर संकेत मिलते हैं। गणपाठ में परिवर्धन होता रहा है। अतः उनके उल्लेखों पर तर्क आधारित नहीं किया जा सकता। इसमें रामकथा के पात्रों राम, लक्ष्मण, भरत, रावण आदि आये हैं।" श्रीबुल्के आदि के उपर्युक्त तर्क निरर्थक ही नहीं दुष्टतापूर्ण भी हैं। त्रिपिटक में रामकथा-सम्बन्धी स्फुट आख्यान काव्य प्रचलित हो चुका था, यह ठीक है, पर इससे यह कैसे विदित हुआ कि रामायण की रचना नहीं हो पायी थी। अपनी पुस्तक के ८२ वें अनुच्छेद में आप कहते हैं— "दशरथ-जातक में जो वृत्तान्त प्रस्तुत हुआ है वह तो वाल्मीकिरामकथा का विकृत रूप है ही, किन्तु इस जातक की गाथाओं का भी मूल स्रोत बौद्ध नहीं हैं फिर भी इनका आधार वाल्मीकिरामायण भी नहीं हो सकता। अतः ये गाथायें पुराने आख्यानों पर निर्भर होंगी।" परन्तु इसमें भी क्या प्रमाण है कि वह रामायण पर आधारित न होकर अन्य आख्यानों पर निर्भर है? ७२ वें अनुच्छेद में भी कोई प्रमाण नहीं दिया, किन्तु "ब्राह्मण-धर्म के