रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 134, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंवातावरण में निर्मित पुराने आख्यान-साहित्य में और राम-सम्बन्धी प्राचीन गीतों में ढूंढ़ना चाहिए"—यह कहकर समाप्त कर दिया। यह कोई विचार है या मखौल है? किसी वस्तु का, जहाँ भी हो, साङ्गोपाङ्ग विचार करना चाहिये। एक सम्बन्ध की वस्तु के दोष कहकर अनेक स्थलों का उल्लेख करना और उसमें भी सार की कोई भी बात नहीं रखना तर्क नहीं कहलाता। जो ग्रन्थ प्रामाणिक परम्परा से प्रचलित है, उसको प्रमाण न मानकर, अप्रामाणिक अप्रसिद्ध आख्यानों एवं गीतों को आधार मानना कहाँ तक उचित है? संस्कृत में कहावत है—“उपस्थितं परित्य- ज्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात्” अर्थात् उपस्थित प्रमाण को छोड़कर अनुपस्थित अप्रसिद्ध आधार की कल्पना सर्वथा असङ्गत ही है। पाणिनि के सूत्र इतिहास ग्रन्थ तो हैं नहीं कि वे सम्पूर्ण रामायण की कथा लिखते। वे तो शब्द-साधुत्व के लिए हैं। पाणिनि के सूत्रग्रन्थ में कौशल्या, कैकेयी, शूर्पणखा आदि शब्दों के साधुत्व के लिए अपेक्षित सूत्रों का उल्लेख किया ही गया है। वे शब्द प्रामाणिक आर्ष काव्य रामायण के ही हो सकते हैं। असंस्कृत आख्यानों एवं गीतों में तो शब्द-साधुत्व पर इतना ध्यान भी नहीं होता है। इसी तरह जब गणों का उल्लेख पाणिनि-सूत्रों में हैं ही तो राम, लक्ष्मण आदि शब्दों का ही अप्रामाणिक परिवर्धन मानना हठात् कुनीयत (दुरभिप्राय) की शङ्का उत्पन्न कर देता है। भारतीय संस्कृति के संस्कृत भाषा के व्याकरण-सूत्रों में आये हुए कौशल्या, कैकेयी, राम, लक्ष्मण आदि शब्दों का आधार भारतीय संस्कृति के प्रसिद्ध ग्रन्थ रामायण को छोड़कर अन्य आधार का अन्वेषण स्पष्टतः भारतीय संस्कृति के प्रति द्वेषभावना के कारण ही हो सकता है। मैक्समूलर आदि की परम्परा से ही उक्त द्वेषभावना पाश्चा- त्यों में चली आ रही है। २८ वें अनुच्छेद में बुल्के ने कहा है “युद्धकाण्ड की फलश्रुति तथा बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड और महाभारत में वाल्मीकि को रामायण का रचयिता माना गया है। इस प्राचीन परम्परा के विरोध में कोई युक्ति सङ्गत तर्क नहीं दिया जा सकता" यहाँ तक तो ठीक है परन्तु आगे वे कहते हैं—"किन्तु यह अवश्य मानना पड़ेगा कि इस महान् कवि के जीवन-वृत्त के सम्बन्ध में प्रामाणिक सामग्री का नितान्त अभाव है" यह भी असङ्गत ही है। रामायण, महाभारत तथा पुराणों के आधार पर आदि कवि का जो भी वृत्तान्त उपलब्ध है, उसे ही उनका प्रामाणिक महत्त्व- पूर्ण वृत्त मानना चाहिये। बुल्के कहते हैं—"तैत्तिरीयप्रातिशाख्य के वैयाकरण वाल्मीकि निश्चितरूप में आदि कवि से भिन्न हैं।" परन्तु इस मत का मिथ्या आधार यही है कि प्रातिशाख्य का काल उनके अभिमत आदिकवि-काल से प्राचीन है। पर जो उन लोगों के उस मत को अशुद्ध मानते हैं उनके अनुसार जब ऋग्वेद के राम और सीता, दशरथ तथा वेदों के वसिष्ठ, दशरथ आदि अति प्राचीन हैं तो वाल्मीकि भी अर्वाचीन न होकर प्राचीन ही हैं। ऋग्वेद के कई सूत्रों के द्रष्टा वभ्री-ऋषि हैं। वभ्री और वाल्मीकि दोनों एक ही हैं। दीमक जन्तु का ही नाम वभ्री है। इन्ही वभ्रियों ने विष्णु के धनुष की प्रत्यञ्चा काट दी थी। उनके द्वारा एकत्रित मृत्तिका के विशेष उभरे हुए स्थान को वल्मीक कहा जाता है। उन्ही वभ्री जन्तुओं ने निरन्तर तपस्या कर रहे उनपर वल्मीक बना दिया था। वल्मीक से उद्भूत होने के कारण ही उनका नाम वाल्मीकि हो गया था। इत्यादि वस्तु का उपपादन नीलकण्ठ ने मन्त्ररामायण में किया है। महाभारत के सुपर्ण आदि कवि वाल्मीकि से भिन्न हो सकते हैं, क्योंकि सुपर्ण कश्यपपत्नी विनता की सन्तान हैं। वह एक पक्षि-जाति है। जैसे कश्यपपत्नी कद्रू की सन्तानें सर्प और नाग आदि हैं वैसे ही विनता की सन्तान सुपर्ण हैं। हाँ, यह ठीक है कि वे सामान्य नाग और सामान्य पक्षी नहीं थे। गरुत्मान् सुपर्ण विष्णु के प्रिय रथ और वाहन हैं। नागों में 'अनन्त' या 'शेष' विष्णु की शय्या के रूप में सेवारत हैं। वे ही गरुत्मान् या गरुड़ युद्धकाण्ड में विष्णुस्वरूप श्रीराम की सहायता के लिए आये थे। उनके आते ही मेघनाद के मन्त्र और अस्त्र-बल