भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५८ रामायणमीमांसा तृतीय से जिन नागों ने राम और लक्ष्मण आदि को नागपाश में बाँध रखा था वे सब भाग गये थे, यह निम्न निर्दिष्ट श्लोकों से स्पष्ट है— 'एतस्मिन्नन्तरे वायुर्मेघाश्चापि सविद्युतः । पर्यस्य सागरे तोयं कम्पयन्निव पर्वतान् ॥ महता पक्षवातेन सर्वद्वीपमहाद्रुमाः । निपेतुर्भग्नविटपाः सलिले लवणाम्भसि ॥ ततो मुहूर्ताद् गरुडं वैनतेयं महाबलम् । वानरा ददृशुः सर्वे ज्वलन्तमिव पावकम् ॥ तमागतमभिप्रेक्ष्य नागास्तेऽपि प्रदुद्रुवुः । यैस्तु तौ पुरुषौ बद्धौ शरभूतैर्महाबलैः ॥" (वा० रा ६।५५।३३,३४,३६,३७ ) "अहं सखा ते काकुत्स्थ प्रियः प्राणो बहिश्चरः । गरुत्मानिह सम्प्राप्तो युवयोः साह्यकारणात् ॥" (वा० रा० ६।५०।४६ ) जैसे सुग्रीव, वाली, हनुमान्, जाम्बवान् आदि भालू और वानर होते हुए भी देवताओं के अवतार होने से दिव्यशक्तिसम्पन्न थे, वैसे ही गरुड़, अनन्त आदि पक्षी और नाग होते हुए भी दिव्यशक्तिसम्पन्न भगवान् की विशिष्ट विभूति थे । यह कहना तो निःसार है कि 'सुपर्णवंश विष्णुभक्त था, किन्तु वाल्मीकि ने शिव की शरण ली थी । क्योंकि वैदिकों में शिव और विष्णु दोनों ब्रह्मरूप ही हैं, अतः विष्णुभक्त भी शिवभक्त ही होते हैं। यह तो स्पष्ट ही है कि सुपर्णरूप वाल्मीकि पक्षियों में थे, परन्तु शिव की शरण लेनेवाले वाल्मीकि तो मनुष्य थे । और वे ही शिवजी के वरदान से निर्दोष होकर आदि काव्य रामायण का निर्माण कर असीम यश के भागी हुए । फिर जब श्रीबुल्के के अनुसार ही महाभारत के द्रोणपर्व (११८।४८) तथा शान्तिपर्व (२००।४) में वाल्मीकि को स्पष्ट शब्दों में कवि माना गया है और शान्तिपर्व (५७।४) में भार्गव कवि का तथा अनुशासनपर्व (१८।८-१०) में श्रेष्ठ यशवाले वाल्मीकि का वर्णन है । आदिपर्व (५०।१४), सभापर्व (७।१४), वनपर्व (८३।१०२) तथा उद्योगपर्व (८१।२७ ) में वाल्मीकि का वर्णन है तब वाल्मीकि को ई० पूर्व तीन सौ वर्ष का मानने में अभिनिवेश क्यों ? श्रीबुल्के कहते हैं, "विशेषज्ञों के अनुसार द्रोणपर्व का वर्तमान रूप बहुत परिवर्धित है । शान्तिपर्व एवं अनुशासनपर्व निश्चितरूप से अर्वाचीन हैं । बहुत सम्भव है कि महाभारत के व्यासों ने अपेक्षाकृत अर्वाचीन काल में कवि वाल्मीकि का परिचय प्राप्त किया हो और ये बहुसंख्यक स्थल आदि कवि वाल्मीकि से भिन्न किसी अन्य वाल्मीकि ऋषि से सम्बन्ध रखते हों इत्यादि ।" परन्तु यह भी सङ्गत नहीं है । पाश्चात्यों के अनुसार कोई भी भारतीय संस्कृत का साहित्य प्रामाणिक एवं क्षेपकशून्य नहीं है । जब वे ऋग्वेद जैसे परम्परा प्राप्त वेद ग्रन्थ में भी क्षेपक होने की कल्पना करते हैं तब किसी अन्य ग्रन्थ को प्राचीन एवं शुद्ध कैसे मान सकते हैं ? यही बात श्रीतुलसीदासजी ने कही थी — "हरित भूमि तृन संकुल सूझि परहि नहि पंथ । जिमि पाखण्ड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ ॥" (रा० मा० ४।१४) अभी भी कोई धर्मभीरु व्यास या विद्वान् आर्ष ग्रन्थों में बाहर से किसी अंश को जोड़ने में पाप मानता है । जो भी कोई चीज जोड़ी जाती है वह प्रक्षिप्त रूप से ही जोड़ी जाती है । वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड तथा उत्तर- काण्ड से स्पष्ट ही विदित है कि वाल्मीकि महर्षि ही आदि कवि भी हैं और वे राम के समकाल में ही थे । ऐसी