रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ५९ स्थिति में, द्वापर में बननेवाले महाभारत में उनका नाम आना सुतरां उचित है। उत्तरकाण्ड के अनुसार सीता वनवास-काल में महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में ही रही थीं। "राज्ञो दशरथस्यैव पितुर्मे मुनिपुङ्गवः । सखा परमको विप्रो वाल्मीकिः सुमहाद्यशाः ॥” (वा० रा० ७।४७।१६,१७) लक्ष्मण ने सीता से कहा था कि मेरे पिता दशरथ के परम सखा विप्र मुनिपुङ्गव वाल्मीकि यहाँ रहते हैं। आप उन्हीं की पादच्छाया का आश्रयण करके समय व्यतीत करें। इसी तरह— “प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन । न स्मराम्यनृतं वाक्यमिमौ तु तव पुत्रकौ ॥ बहुवर्षसहस्राणि तपश्चर्या मया कृता। मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्व न किल्बिषम् ॥” (वा० रा० ७।९६।१८-२०) वाल्मीकि ने कुश, लव और सीता को लेकर श्रीराम के सामने यह कहा था—मैं प्रचेता का दसवां पुत्र हूँ। मैंने हजारों वर्ष तपश्चर्या की है। मैंने कभी भी असत्य भाषण नहीं किया है। मन, वचन और कर्म से कोई पाप मुझसे नहीं हुआ। इन प्रमाणों से भी वाल्मीकि राम के समसामयिक ही सिद्ध होते हैं। वाल्मीकि के आश्रम के सम्बन्ध में बुल्के कहते हैं—"बालकाण्ड (सर्ग २ श्लोक ३) के अनुसार वाल्मीकि का आश्रम तमसा और गङ्गा के समीप था। सर्ग ४५,४६ के अनुसार तमसा से भिन्न गङ्गा की कोई उपनदी है। उत्तरकाण्ड के प्रसंगों से पता चलता है वह नदी गंगा के दक्षिण में थी, क्योंकि लक्ष्मण और सीता आयो- ध्या से आकर गंगा पार करने के बाद ही वाल्मीकि के आश्रम में पहुँचे थे (सर्ग ४७) । शत्रुघ्न के विषय में कहा गया है कि वाल्मीकि के आश्रम से पश्चिम की ओर जाते हुए वह यमुनातीर पर उतरे (वा० रा० ७।६६।१५) । बाद में अन्य परम्परा प्रचलित होने लगी। जिसके अनुसार वाल्मीकि का आश्रम गंगा के उत्तर माना गया है। रामायण के टीकाकार कतक तथा गोविन्दराज उपर्युक्त 'यमुनातीरम्' के स्थान में 'गङ्गातीरम्' को शुद्ध मानते हैं। रामायण के दाक्षिणात्य पाठ के एक प्रक्षेप के अनुसार, जो अन्य पाठों में नहीं मिलता, चित्रकूट के पास वाल्मीकि के आश्रम पर राम, लक्ष्मण और सीता पहुँचते हैं— “इति सीता च रामश्च लक्ष्मणश्च कृताञ्जलिः । अभिगम्याश्रमं सर्वे वाल्मीकिमभ्यवादयन् ॥” अयोध्याकाण्ड (सर्ग ५६), अध्यात्मरामायण (२।६), आनन्दरामायण (१।६) तथा रामचरितमानस (२।१२४) में वाल्मीकि का आश्रम यमुना के पार चित्रकूट पर स्थित माना गया है। वस्तुतः बालकाण्ड का वाल्मीकि आश्रम प्रसिद्ध तमसा के तीर ही मानना चाहिये । 'जगाम तमसातीरं जाह्नव्यास्त्वविदूरतः ।" (वा० रा० २।१।३) यहाँ अविदूरतः का समीप अर्थ नहीं है, किन्तु जाह्नवी से अधिक दूर भी नहीं अर्थात् कुछ दूर तो जाह्नवी से तमसा नदी है ही। यों भी दूरत्व और सामीप्य साक्षेप होते हैं। अयोध्याकाण्ड (सर्ग ४५) की भी तमसा वही है, अन्य कोई गंगा की उपनदी नहीं। इसी लिए तमसा से चलने के पश्चात् श्रीराम आदि को वेदश्रुति, गोमती और उसके पश्चात् गंगा मिली थी। “ततो वेदश्रुतिं नाम शिववारिवहां नदीम् ।” "गोमतीं गोयुतानूपामतरत् सागरङ्गमाम् ॥”