भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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६० रामायणमीमांसा तृतीय “गोमतीं चाप्यतिक्रम्य राघवः शीघ्रगैर्हयैः । मयूरहंसाभिरुतां ततार स्यन्दिकां नदीम् ॥” (वा० रा० २।४९।९,१०,११) इन प्रमाणों के आधार पर अविदूरतः का अर्थ समीप नहीं; किन्तु अधिक दूर नहीं है। तमसा नाम की गंगा की कोई भी उपनदी प्रसिद्ध है ही नहीं और न वह अयोध्या ओर प्रयाग के मध्य में मिलती है। उत्तरकाण्ड (सर्ग ४७) में तमसा का वर्णन ही नहीं है। वहाँ तो वाल्मीकि आश्रम का वर्णन है। महर्षि का एक आश्रम वहाँ भी रहा होगा। इतना ही क्यों, चित्रकूट से कुछ ही दूर पर अब भी एक वाल्मीकि नाम का पर्वत है, उसे भी वाल्मीकि का आश्रम माना जाता है। आज भी महात्माओं के अनेक आश्रम होते ही हैं। गंगा के तीर पर वाल्मीकि-आश्रम कानपुर से पश्चिम बिठूर के पास है। वहीं सीता को लक्ष्मण ने पहुँचाया था। वहाँ से पश्चिम मथुरा के मार्ग में यमुना भी पड़ती है, अतः शत्रुघ्न का भी उसी आश्रम से पश्चिम की ओर जाना संगत है। वहाँ भी तमसा की चर्चा नहीं है। उत्तरकाण्ड के (सर्ग ६६) में भी तमसा का नाम नहीं है। शत्रुघ्न ने वाल्मीकि के उसी आश्रम में रात्रि में निवास किया था। सीता-पुत्रों का जन्म सुनकर, अभिनन्दन कर तथा प्रातःकालीन कृत्य करके वहाँ से व पश्चिम दिशा की ओर चल पड़े थे और तब यमुना के मार्ग में महर्षियों के आश्रमों में रुकते हुए सात रात्रियों के अनन्तर यमुना के तीर पर पहुँचे थे। “स गत्वा यमुनातीरं समरात्रोषितः पथि ।” (वा० रा० ७।६६।१५) इस दृष्टि से विचार करने पर वाल्मीकिरामायण के विभिन्न काण्डों तथा अन्य रामायणों में विरोध दिखाने की चेष्टा निरर्थक ही है। इसी प्रकार भार्गव वाल्मीकि के सम्बन्ध की शङ्काएँ भी निःसार हैं, क्योंकि भार्गव शब्द उपाधि नहीं है, किन्तु भृगुवंश में उद्भूत होनेवाले को भार्गव कहा जाता है। च्यवन तथा परशुराम आदि भी उसी वंश में उद्भूत होने के कारण भार्गव कहे जाते हैं। यह भी आवश्यक नहीं कि जहाँ भार्गव का नाम आये वहाँ दूसरे भार्गवों का भी नाम आये । दस प्रचेतस प्राचीनबर्ही राजा के पुत्र थे। समानरूप से धर्म तथा व्रतों में स्नात होने के कारण उनके समान ही नाम थे— “प्राचीनबर्हिषः पुत्राः शतद्रुत्यां दशाभवन् । तुल्यनामव्रताः सर्वे धर्मस्नाताः प्रचेतसः ॥” (भा० ४।२४।१३) परन्तु ‘प्रचेतस’ के अनुसार वाल्मीकिरामायण के निर्माता वाल्मीकि ऋषि से सम्बन्ध रखनेवाले प्रचेता वरुण हैं। “प्रचेता वरुणः पाशी” (अमर १।१।६१) के अनुसार वरुण का प्रचेता नाम है। वरुण के अंश से जैसे अगस्त्य आदि का जन्म हुआ है वैसे ही वाल्मीकि का जन्म है। अन्यत्र उन्हें ब्रह्मा का अवतार भी माना गया है। जैसे नारद ब्रह्मपुत्र होते हुए शापादि के कारण दासीपुत्र हो गये थे उसी तरह कभी उनका भृगुवंशीय ब्राह्मणों के कुल में जन्म हुआ था। वाल्मीकि संगवश दस्यु हो गये थे ओर सप्तर्षियों के सम्बन्ध और उपदेश से राम का उलटा नाम ‘मरा’ जपने में तल्लीन हो गये। उनके ऊपर दीमकों द्वारा वल्मीक बन गया। उससे निकलने के बाद उनका ‘वाल्मीकि’ नाम अन्वर्थक हो गया था। उस नवीन जन्म मिलने के बाद उन्होंने महती तपस्या की और सर्वथा निष्किल्बिष रहे। उत्तरकाण्ड का ‘मनसा वाचा कर्मणा’ यह वचन भी सार्थक हुआ। उन महर्षि ने स्पष्टरूप से कहा है कि कुश और लव जानकी के दो यम-जात (जुड़वे) पुत्र हैं। एतावता बुल्के का यह कहना दुष्टतापूर्ण है कि कुश तथा लव का अर्थ अर्थशास्त्र के अनुसार गणिकाध्यक्ष होता है। उनका