रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६१ समाज में कोई विशेष आदर नहीं था। किन्तु इन्हीं उद्देश्यों की सिद्धि के लिए तो वे बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड को अप्रमाण और पीछे का मिलाया हुआ मानते हैं, क्योंकि दोनों काण्डों में कुश और लव श्रीराम के औरस पुत्र कहे गये हैं। उनमें कुश राम के राज्यसिंहासन के अधिकारी हुए थे। महाकवि कालिदास ने भी यही माना है। महर्षि को रामायण-निर्माण करके यह चिन्ता हुई कि इस रामायण का सभाओं में गान कौन करे ? उसी समय सीता-पुत्रों ने आकर महर्षि का चरण-ग्रहण किया। वे दोनों धर्मज्ञ थे, यशस्वी थे और राजपुत्र थे। दोनों वेद- वेदांगपारंगत, स्वरसम्पन्न तथा मेधावी थे। वेदों के उपबृंहण के लिए महर्षि ने उन्हें रामायण महाकाव्य पढ़ाया— "अगृह्णीतां मुनेः पादौ मुनिवेषौ कुशीलवौ । कुशीलवौ तु धर्मज्ञौ राजपुत्रौ यशस्विनौ । भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ ॥ स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ । वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ।। (वा० रा० १।४।४-६) कुश-लव को गणिकाध्यक्ष कहना हृदय-कालुष्यद्योतन है क्या ये गुण गणिकाध्यक्ष कुशीलवों में हो सकते हैं ? इसके अतिरिक्त यदि बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड का प्रामाण्य आपको मान्य नहीं हैं तो किसी कुशीलव ने रामायण महाकाव्य वाल्मीकि से प्राप्त किया और उसका गान किया, यह असिद्ध ही है। यदि उक्त दोनों काण्ड सप्रमाण हैं तो कुशीलव श्रीराम और सीता के पुत्र सिद्ध ही हैं। फिर उन्हें छोड़कर अनर्गल कल्पना, अर्थशास्त्र के प्रसंगान्तरीय अप्रकृत कुशीलव का प्रकृत से सम्बन्ध जोड़ना, कहाँ तक उचित है ? इसे ही प्रकृत-परित्याग और अप्रकृतप्रसंग कहा जाता है। भार्गव ने उपाख्यान समन्वित २४ हजार श्लोकों के रामायण ग्रन्थ की रचना की। उसमें उत्तरकाण्ड सहित आदि (बाल) काण्ड से लेकर युद्ध-काण्ड तक छह काण्ड हैं और पाँच सौ सर्ग हैं। नागेश के अनुसार 'कुशश्च लवश्च' इस द्वन्द्वसमास में यहाँ कुश शब्द पृषोदरादि में पठित होने से कुशी शब्द बन गया है। इस तरह 'कुशीलव' शब्द सम्पन्न हुआ है। सीता-पुत्रों का कुशीलव नाम क्यों पड़ा यह भी उत्तरकाण्ड में स्पष्टरूप से प्रतिपादित है। महर्षि ने मन्त्र-संस्कृत कुशों से जिसका मार्जन किया था उसका नाम कुश हुआ और जिसका मार्जन लवों से किया उसका नाम लव हुआ। नागेश के अनुसार काट कर दो खण्डों में विभक्त कुशमुष्टि का अग्रभाग कुश कहा जाता है एवं शेष अधोभाग लव कहा जाता है। अर्थात् कुछ कुशों को लेकर उनको बीच से दो टुकड़ों में विभक्त करके अग्रभाग से ज्येष्ठका एवं अधो भाग से कनिष्ठ का मार्जन किया गया — "यस्तयोः पूर्वजो जातः स कुशैम्र्न्त्रसंस्कृतैः। १ निर्मार्जनीयस्तु तदा कुश इत्यस्य नाम तत् ॥ यश्चावरो भवेत्ताभ्यां लवेन सुसमाहितः । निर्मार्जनीयो वृद्धाभिर्लवेति च स नामतः ॥” (वा० रा० ७।६६।७,८) इतना स्पष्ट विवरण रहने पर भी कुश और लव को कुशीलव गणिकाध्यक्ष मानना हृदय की कलुषता का ही द्योतक है। १. मन्त्रसत्कृतैः, भी पाठ है।