रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ रामायणमीमांसा तृतीय वाल्मीकि ही भार्गव थे उत्तरकाण्ड में रामायणकार महर्षि वाल्मीकि को भार्गव कहा गया है— “संनिबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विंशत्सहस्रकम् । उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना ॥ आदिप्रभृति वै राजन् पञ्चसर्गशतानि च । काण्डानि षट् कृतानीह सोत्तराणि महात्मना ॥” (वा० रा० ७।९४।२५, २६) इससे बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड तथा रामायण के उपाख्यानों को अर्वाचीन या प्रक्षिप्त कहना सर्वथा निर्मूल सिद्ध होता है । उक्त श्लोकों में वाल्मीकि को ही भार्गव कहा गया है । नागेश भट्ट के अनुसार काव्यनिर्माण में भार्गव (उशना) के तुल्य होने से वे भार्गव कहे गये हैं । ‘कवीना- मुशना कविः’ (गी० १०।३७) के अनुसार उशना कवि सभी कवियों में श्रेष्ठ माने जाते हैं । मनुष्य-लोक में वाल्मीकि ही आदि कवि हैं । अथवा प्रचेता वरुण का नाम है । भृगु भी वरुण के ही पुत्र हैं “भृगुर्वे वारुणिः । वरुणं पितर- मुपससार” (तै० उ० ३।१), ‘तस्येदम्’ (पा० सू० ४।३।१२०) के अनुसार अण् प्रत्यय हुआ, जिससे ‘भृगोर्भ्राता भार्गवः’ भृगु के भ्राता होने से वाल्मीकि भी भार्गव हुए । मुख्य बात तो यह है कि मीमांसा-शास्त्रों एवं मिताक्षरा आदि निबन्ध-ग्रन्थों के अनुसार विभिन्न आर्ष ग्रन्थों का समन्वय ही भारतीय पद्धति है । अतः महाभारत, स्कन्दपुराण तथा अन्य पुराणों में परस्पर विरोध ढूंढने का प्रयास न कर समन्वय का ही यत्न करना चाहिए । परन्तु पाश्चात्य विद्वान् ग्रन्थों के परस्पर विरोध ही ढूंढ़ते रहते हैं । वे आर्ष पुराणादि ग्रन्थों को ईसवी सन् के भीतर लाने की ही चिन्ता में लगे रहते हैं । वस्तुतः, “श्लोकश्चायं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना । आख्याते रामचरिते नृपतिं प्रति भारत ॥” “राजानं प्रथमं विन्देत्ततो भार्यां ततो धनम् ॥” (म० भा० १२।५७।४०, ४१) के अनुसार श्रीभीष्मजी ने अत्यन्त प्राचीन भार्गव महर्षि वाल्मीकि के रामायण का श्लोक उद्धृत किया था । प्रथम राजा को प्राप्त करना चाहिये, फिर भार्या और तब धन प्राप्त करना चाहिये । राजा के बिना अराजकता में भार्या, धन कुछ भी सुरक्षित नहीं रहता और वह यह है— “अराजके धनं नास्ति नास्ति भार्याप्यराजके । इदमत्याहितं चान्यत् कुतः सत्यमराजके ॥” (वा० रा० २।६७।११) अराजकता में धन, भार्या कुछ भी सुरक्षित नहीं रहता, यह महाभीति¹ होती है फिर अराजकता में सत्य कहाँ; अतः भार्या और धन प्राप्त करने के पहले राजा को प्राप्त करना आवश्यक है । महाभारत के बहुत पहले रामायण की रचना हो चुकी थी, इस बात के ऐसे पुष्ट प्रमाणों के मिलने पर भी पश्चिमी विद्वान् रामायण को महा- भारत के बाद का सिद्ध करने की धृष्टता करने का दुःसाहस करते हैं, इससे बढ़कर उनकी हृदयहीनता का दूसरा प्रमाण क्या हो सकता है । विष्णुपुराण (३।३।१८) तथा मत्स्यपुराण (१२।५१) में जो वाल्मीकि को भार्गव कहा गया है वह वस्तुस्थिति का वर्णन है । वह असम्भव नहीं है । आर्षविज्ञान-सम्पन्न व्यास आदि महर्षियों ने अपने आर्ष ज्ञान से निरीक्षण कर च्यवन एवं वाल्मीकि का वृत्तान्त लिखा है । दोनों ही के तपःसंलग्न देह दीमकों द्वारा रचित १. अत्याहितं महाभीतिः (अमरकोष)