भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६३ वल्मीक से प्रावृत हो गये थे। दोनों के वृत्तान्तों के मिश्रण की बात नहीं है। फिर भी 'वल्मीक' से उद्भूत होने के कारण 'वाल्मीकि' शब्द च्यवन में प्रसिद्ध न होकर रामायणकार प्राचेतस महर्षि में ही प्रसिद्ध हुआ है। 'भार्गव' शब्द वाल्मीकि में वरुणस्वरूप प्रचेता के पुत्र होने से एवं वरुण-पुत्र भृगु से संबद्ध होने से उचित ही है। अध्यात्मरामायण आदि प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर कालान्तर में शापादि के कारण उन्हीं का जन्म किसी भृगुकुलोद्भूत ब्राह्मणकुल में हुआ था, इससे भी वे भार्गव हुए। इस दृष्टि से भृगुवंशीय होने के कारण भी उन्हें औपचारिक रूप से च्यवन-पुत्र कहा गया है। सन्तान-परम्परा में उत्पन्न होने पर भी पुत्रत्व का व्यवहार होता है। श्रीभागवतादि पुराणग्रन्थों में सूर्यवंश और सोमवंश के वर्णन के प्रसङ्ग में उस वंश में होनेवाले उत्तरोत्तर के प्रधान-प्रधान पुरुष पूर्व पूर्व के प्रधान पुरुषों के पुत्ररूप में वर्णित किये गये हैं। तभी लाखों वर्षों के दीर्घ काल में वर्णित राजाओं की संख्या बहुत ही कम है। इसी दृष्टि से कृत्तिवासीय रामायण तथा अश्वघोष के बुद्धचरित में वाल्मीकि को च्यवन का पुत्र कहा गया है— "वाल्मीकिरादौ च ससर्ज पद्यं जग्रन्थ यन्न च्यवनो महर्षिः।" (बुद्ध-च० १।४३) यहाँ यही अभिप्राय विवक्षित है कि पूर्व के लोगों ने जो लोकोत्तर कार्य नहीं किया वह उत्तरोत्तर लोगों ने किया था। वाल्मीकि ने जो आदिपद्य की रचना की उसकी रचना उनके पूर्वज बड़े प्रभावशाली च्यवन भी नहीं कर सके थे। इसी तरह के और भी अनेक उदाहरण हैं। दस्यु वाल्मीकि बुल्के यह कहते हैं कि "वाल्मीकि पहले डाकू थे। वे दीर्घकालीन तपस्या के बाद रामायण की रचना में समर्थ हुए। इस कथा की प्राचीनता में सन्देह है। मुनियों के ब्रह्मघ्न कहने पर वाल्मीकि पातक से आविष्ट हो गये थे और शिवपूजा कर वे मुक्त हुए थे। अनुशासनपर्व की इस कथा का स्कन्दपुराण में विकास हुआ है।" स्कन्दपुराण भी तो बुल्के की दृष्टि में अधिक से अधिक ई० १० वीं शती की रचना है। पर यह सब असङ्गत है। क्योंकि वेद, उपनिषद् तथा पुराणों की दृष्टि से अन्य पुराणों की भाँति वह भी अनादि ही है। पुराणों का प्रतिकल्प में आविर्भाव होता रहता है। अपौरुषेय वेद में आनुपूर्वी अपरिवर्तित रहती है। इतिहास-पुराणों की आनुपूर्वी में महर्षियों द्वारा परिवर्तन होता रहता है। इसी लिए वे पौरुषेय कहे जाते हैं। वर्तमान आनुपूर्वीवाले पुराणादि द्वापर में, आज से पाँच हजार वर्षों से भी अधिक पूर्व, निर्मित हुए हैं। व्यास सर्वज्ञ-कल्प थे। अतएव उन्होंने भूत तथा भविष्यत् की भी कथाएँ लिखी हैं। अतः कथाओं के आधार पर उनका उत्पत्तिकाल निश्चित नहीं किया जा सकता। अनुशासनपर्ववाली कथा का विकास स्कन्दपुराणीय कथा के रूप में हुआ, यह कहना सर्वथा गलत है; क्योंकि उनका परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं है— "वाल्मीकिश्चाह भगवान् युधिष्ठिरमिदं वचः । विवादे साग्निमुनिभिर्ब्रह्मघ्नो वै भवानिति ॥ उक्तः क्षणेन चाविष्टस्तेनाधर्मेण भारत । सोऽहमीशानमनघममोघं शरणं गतः ॥