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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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६४ रामायणमीमांसा तृतीय मुक्तश्चास्मि ततः पापैस्ततो दुःखविनाशनः । आह मां त्रिपुरघ्नो वै यशस्तेऽग्र्यं भविष्यति ॥” (म० भा० १३।१८।१८-१० ) वाल्मीकि ने युधिष्ठिर से कहा था कि किसी विवाद में आहिताग्नि मुनियों ने मुझसे ‘आप ब्रह्मघ्न हैं’ कह दिया । उनके ऐसा कहते ही मैं पापों से युक्त हो गया । तब मैं अमोघ, अनघ भगवान् ईशान की शरण में गया । और पापों से मुक्त हो गया । तदनन्तर दुःखविनाशन त्रिपुरघ्न शिव ने मुझसे कहा—तुम्हारा श्रेष्ठ यश होगा । इस कथा में डाका डालने या तपस्या की कोई बात नहीं है, अतः उन्हीं महर्षि के सम्बन्ध में इस स्वतन्त्र घटना का वर्णन समझना चाहिये । स्कन्दपुराण वैष्णवखण्ड वैशाख-माहात्म्य आदि की कथाओं के अनुसार किसी ने राम-नाम के जप के प्रभाव से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि अगले जन्म में तुम वल्मीक नामक ऋषि के कुल में उत्पन्न होओगे तथा वाल्मीकि नाम धारण कर महान् यशस्वी बन जाओगे । कृणु नामक तपस्वी के शरीर के चारों ओर वल्मीक बन गया था । उसका नाम वल्मीक पड़ा था । व्याध उसी के पुत्ररूप में उत्पन्न होकर वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध हुआ और दिव्य रामकथा रचने में समर्थ हुआ, आदि रूप में वाल्मीकि का इतिवृत्त ज्ञात होता है । अन्य प्रकार के इति- वृत्त भी वाल्मीकि के सम्बन्ध में प्राप्त हैं— स्कन्दपुराणीय अवन्तीखण्ड के २४ वें अध्याय में अग्निशर्मा की कथा है । वह डाकू था । किसी दिन सप्तर्षियों से उसकी भेंट हो गयी । वह उनको मार डालना चाहता था । ऋषियों ने उसे परिवार से यह पूछने भेज दिया कि क्या वे लोग तुम्हारे पापकर्मों में भी भागीदार होंगे ? पूछने पर जब परिवार के लोगों ने पाप-कर्म में भागी- दार होना अस्वीकार कर दिया तब अग्निशर्मा ऋषियों के पास लौटा और उनका उपदेश प्राप्त कर ध्यान तथा मन्त्र- जप में निरत हुआ । तेरहवें वर्ष बाद जब ऋषि लोग उसी मार्ग से लौटे तो उन्होंने उसके शरीर के चारों ओर वल्मीक बना देखा । ऋषियों ने वहाँ से निकाल कर उसका ‘वाल्मीकि’ नाम रखा और रामायण लिखने का आदेश दिया । नागरखण्ड के १२४ वें अध्याय में लोहजङ्घ की कथा है । वह माता-पिता की सेवा में सदैव तत्पर रहता था । परिवार-पालन की दृष्टि से दस्यु बन गया था । उसकी सप्तर्षियों के साथ भेंट हुई । पूर्व वृत्तान्त के समान उसको भी ऋषियों ने कोई मन्त्र बतलाया, वह उसे जपकर सिद्ध हुआ और वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध हुआ । प्रभासखण्ड के २९८ वें अध्याय में शमीमुख ब्राह्मण की कथा है । उसका पुत्र वैशाख था । वह चोरी द्वारा अपने परिवार का पालन करता था । उसकी भेंट सप्तर्षियों से हुई । धन के ही हम भागी हैं, पाप के नहीं, परिवार- वालों से यह सुनकर उसे वैराग्य हो गया । वह भी तप करते करते वल्मीक से आवृत होकर वाल्मीकि बन गया । सप्तर्षियों ने उसके लिए भविष्यवाणी की-- “स्वच्छन्दा भारती देवी जिह्वाग्रे ते भविष्यति । कृत्वा रामायणं काव्यं ततो मोक्षं गमिष्यसि ॥” तुम्हारे जिह्वाग्र में स्वच्छन्द ( बेरोकटोक ) भगवती सरस्वती देवी का निवास होगा । तुम अमर काव्य रामायण की रचना कर तदनन्तर मोक्ष की प्राप्त होओगे । उपर्युक्त सभी कथाएँ प्रामाणिक ग्रन्थों की होने से प्रामाणिक हैं, अतः ‘गुणोपसंहारन्याय’ से इन सबका समन्वय करना ही ठीक है । व्याधवाली कथा में कोई नामनिर्देश नहीं है । वह जन्मान्तर में वल्मीक ऋषि का पुत्र होने से वाल्मीकि बना । उन वाल्मीकि ऋषि को अन्य कथाओं के अनुसार भृगुवंशी मानने में भी कोई विरोध नही