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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६१ समाज में कोई विशेष आदर नहीं था। किन्तु इन्हीं उद्देश्यों की सिद्धि के लिए तो वे बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड को अप्रमाण और पीछे का मिलाया हुआ मानते हैं, क्योंकि दोनों काण्डों में कुश और लव श्रीराम के औरस पुत्र कहे गये हैं। उनमें कुश राम के राज्यसिंहासन के अधिकारी हुए थे। महाकवि कालिदास ने भी यही माना है। महर्षि को रामायण-निर्माण करके यह चिन्ता हुई कि इस रामायण का सभाओं में गान कौन करे ? उसी समय सीता-पुत्रों ने आकर महर्षि का चरण-ग्रहण किया। वे दोनों धर्मज्ञ थे, यशस्वी थे और राजपुत्र थे। दोनों वेद- वेदांगपारंगत, स्वरसम्पन्न तथा मेधावी थे। वेदों के उपबृंहण के लिए महर्षि ने उन्हें रामायण महाकाव्य पढ़ाया— "अगृह्णीतां मुनेः पादौ मुनिवेषौ कुशीलवौ । कुशीलवौ तु धर्मज्ञौ राजपुत्रौ यशस्विनौ । भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ ॥ स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ । वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ।। (वा० रा० १।४।४-६) कुश-लव को गणिकाध्यक्ष कहना हृदय-कालुष्यद्योतन है क्या ये गुण गणिकाध्यक्ष कुशीलवों में हो सकते हैं ? इसके अतिरिक्त यदि बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड का प्रामाण्य आपको मान्य नहीं हैं तो किसी कुशीलव ने रामायण महाकाव्य वाल्मीकि से प्राप्त किया और उसका गान किया, यह असिद्ध ही है। यदि उक्त दोनों काण्ड सप्रमाण हैं तो कुशीलव श्रीराम और सीता के पुत्र सिद्ध ही हैं। फिर उन्हें छोड़कर अनर्गल कल्पना, अर्थशास्त्र के प्रसंगान्तरीय अप्रकृत कुशीलव का प्रकृत से सम्बन्ध जोड़ना, कहाँ तक उचित है ? इसे ही प्रकृत-परित्याग और अप्रकृतप्रसंग कहा जाता है। भार्गव ने उपाख्यान समन्वित २४ हजार श्लोकों के रामायण ग्रन्थ की रचना की। उसमें उत्तरकाण्ड सहित आदि (बाल) काण्ड से लेकर युद्ध-काण्ड तक छह काण्ड हैं और पाँच सौ सर्ग हैं। नागेश के अनुसार 'कुशश्च लवश्च' इस द्वन्द्वसमास में यहाँ कुश शब्द पृषोदरादि में पठित होने से कुशी शब्द बन गया है। इस तरह 'कुशीलव' शब्द सम्पन्न हुआ है। सीता-पुत्रों का कुशीलव नाम क्यों पड़ा यह भी उत्तरकाण्ड में स्पष्टरूप से प्रतिपादित है। महर्षि ने मन्त्र-संस्कृत कुशों से जिसका मार्जन किया था उसका नाम कुश हुआ और जिसका मार्जन लवों से किया उसका नाम लव हुआ। नागेश के अनुसार काट कर दो खण्डों में विभक्त कुशमुष्टि का अग्रभाग कुश कहा जाता है एवं शेष अधोभाग लव कहा जाता है। अर्थात् कुछ कुशों को लेकर उनको बीच से दो टुकड़ों में विभक्त करके अग्रभाग से ज्येष्ठका एवं अधो भाग से कनिष्ठ का मार्जन किया गया — "यस्तयोः पूर्वजो जातः स कुशैम्र्न्त्रसंस्कृतैः। १ निर्मार्जनीयस्तु तदा कुश इत्यस्य नाम तत् ॥ यश्चावरो भवेत्ताभ्यां लवेन सुसमाहितः । निर्मार्जनीयो वृद्धाभिर्लवेति च स नामतः ॥” (वा० रा० ७।६६।७,८) इतना स्पष्ट विवरण रहने पर भी कुश और लव को कुशीलव गणिकाध्यक्ष मानना हृदय की कलुषता का ही द्योतक है। १. मन्त्रसत्कृतैः, भी पाठ है।

६२ रामायणमीमांसा तृतीय वाल्मीकि ही भार्गव थे उत्तरकाण्ड में रामायणकार महर्षि वाल्मीकि को भार्गव कहा गया है— “संनिबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विंशत्सहस्रकम् । उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना ॥ आदिप्रभृति वै राजन् पञ्चसर्गशतानि च । काण्डानि षट् कृतानीह सोत्तराणि महात्मना ॥” (वा० रा० ७।९४।२५, २६) इससे बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड तथा रामायण के उपाख्यानों को अर्वाचीन या प्रक्षिप्त कहना सर्वथा निर्मूल सिद्ध होता है । उक्त श्लोकों में वाल्मीकि को ही भार्गव कहा गया है । नागेश भट्ट के अनुसार काव्यनिर्माण में भार्गव (उशना) के तुल्य होने से वे भार्गव कहे गये हैं । ‘कवीना- मुशना कविः’ (गी० १०।३७) के अनुसार उशना कवि सभी कवियों में श्रेष्ठ माने जाते हैं । मनुष्य-लोक में वाल्मीकि ही आदि कवि हैं । अथवा प्रचेता वरुण का नाम है । भृगु भी वरुण के ही पुत्र हैं “भृगुर्वे वारुणिः । वरुणं पितर- मुपससार” (तै० उ० ३।१), ‘तस्येदम्’ (पा० सू० ४।३।१२०) के अनुसार अण् प्रत्यय हुआ, जिससे ‘भृगोर्भ्राता भार्गवः’ भृगु के भ्राता होने से वाल्मीकि भी भार्गव हुए । मुख्य बात तो यह है कि मीमांसा-शास्त्रों एवं मिताक्षरा आदि निबन्ध-ग्रन्थों के अनुसार विभिन्न आर्ष ग्रन्थों का समन्वय ही भारतीय पद्धति है । अतः महाभारत, स्कन्दपुराण तथा अन्य पुराणों में परस्पर विरोध ढूंढने का प्रयास न कर समन्वय का ही यत्न करना चाहिए । परन्तु पाश्चात्य विद्वान् ग्रन्थों के परस्पर विरोध ही ढूंढ़ते रहते हैं । वे आर्ष पुराणादि ग्रन्थों को ईसवी सन् के भीतर लाने की ही चिन्ता में लगे रहते हैं । वस्तुतः, “श्लोकश्चायं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना । आख्याते रामचरिते नृपतिं प्रति भारत ॥” “राजानं प्रथमं विन्देत्ततो भार्यां ततो धनम् ॥” (म० भा० १२।५७।४०, ४१) के अनुसार श्रीभीष्मजी ने अत्यन्त प्राचीन भार्गव महर्षि वाल्मीकि के रामायण का श्लोक उद्धृत किया था । प्रथम राजा को प्राप्त करना चाहिये, फिर भार्या और तब धन प्राप्त करना चाहिये । राजा के बिना अराजकता में भार्या, धन कुछ भी सुरक्षित नहीं रहता और वह यह है— “अराजके धनं नास्ति नास्ति भार्याप्यराजके । इदमत्याहितं चान्यत् कुतः सत्यमराजके ॥” (वा० रा० २।६७।११) अराजकता में धन, भार्या कुछ भी सुरक्षित नहीं रहता, यह महाभीति¹ होती है फिर अराजकता में सत्य कहाँ; अतः भार्या और धन प्राप्त करने के पहले राजा को प्राप्त करना आवश्यक है । महाभारत के बहुत पहले रामायण की रचना हो चुकी थी, इस बात के ऐसे पुष्ट प्रमाणों के मिलने पर भी पश्चिमी विद्वान् रामायण को महा- भारत के बाद का सिद्ध करने की धृष्टता करने का दुःसाहस करते हैं, इससे बढ़कर उनकी हृदयहीनता का दूसरा प्रमाण क्या हो सकता है । विष्णुपुराण (३।३।१८) तथा मत्स्यपुराण (१२।५१) में जो वाल्मीकि को भार्गव कहा गया है वह वस्तुस्थिति का वर्णन है । वह असम्भव नहीं है । आर्षविज्ञान-सम्पन्न व्यास आदि महर्षियों ने अपने आर्ष ज्ञान से निरीक्षण कर च्यवन एवं वाल्मीकि का वृत्तान्त लिखा है । दोनों ही के तपःसंलग्न देह दीमकों द्वारा रचित १. अत्याहितं महाभीतिः (अमरकोष)

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६३ वल्मीक से प्रावृत हो गये थे। दोनों के वृत्तान्तों के मिश्रण की बात नहीं है। फिर भी 'वल्मीक' से उद्भूत होने के कारण 'वाल्मीकि' शब्द च्यवन में प्रसिद्ध न होकर रामायणकार प्राचेतस महर्षि में ही प्रसिद्ध हुआ है। 'भार्गव' शब्द वाल्मीकि में वरुणस्वरूप प्रचेता के पुत्र होने से एवं वरुण-पुत्र भृगु से संबद्ध होने से उचित ही है। अध्यात्मरामायण आदि प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर कालान्तर में शापादि के कारण उन्हीं का जन्म किसी भृगुकुलोद्भूत ब्राह्मणकुल में हुआ था, इससे भी वे भार्गव हुए। इस दृष्टि से भृगुवंशीय होने के कारण भी उन्हें औपचारिक रूप से च्यवन-पुत्र कहा गया है। सन्तान-परम्परा में उत्पन्न होने पर भी पुत्रत्व का व्यवहार होता है। श्रीभागवतादि पुराणग्रन्थों में सूर्यवंश और सोमवंश के वर्णन के प्रसङ्ग में उस वंश में होनेवाले उत्तरोत्तर के प्रधान-प्रधान पुरुष पूर्व पूर्व के प्रधान पुरुषों के पुत्ररूप में वर्णित किये गये हैं। तभी लाखों वर्षों के दीर्घ काल में वर्णित राजाओं की संख्या बहुत ही कम है। इसी दृष्टि से कृत्तिवासीय रामायण तथा अश्वघोष के बुद्धचरित में वाल्मीकि को च्यवन का पुत्र कहा गया है— "वाल्मीकिरादौ च ससर्ज पद्यं जग्रन्थ यन्न च्यवनो महर्षिः।" (बुद्ध-च० १।४३) यहाँ यही अभिप्राय विवक्षित है कि पूर्व के लोगों ने जो लोकोत्तर कार्य नहीं किया वह उत्तरोत्तर लोगों ने किया था। वाल्मीकि ने जो आदिपद्य की रचना की उसकी रचना उनके पूर्वज बड़े प्रभावशाली च्यवन भी नहीं कर सके थे। इसी तरह के और भी अनेक उदाहरण हैं। दस्यु वाल्मीकि बुल्के यह कहते हैं कि "वाल्मीकि पहले डाकू थे। वे दीर्घकालीन तपस्या के बाद रामायण की रचना में समर्थ हुए। इस कथा की प्राचीनता में सन्देह है। मुनियों के ब्रह्मघ्न कहने पर वाल्मीकि पातक से आविष्ट हो गये थे और शिवपूजा कर वे मुक्त हुए थे। अनुशासनपर्व की इस कथा का स्कन्दपुराण में विकास हुआ है।" स्कन्दपुराण भी तो बुल्के की दृष्टि में अधिक से अधिक ई० १० वीं शती की रचना है। पर यह सब असङ्गत है। क्योंकि वेद, उपनिषद् तथा पुराणों की दृष्टि से अन्य पुराणों की भाँति वह भी अनादि ही है। पुराणों का प्रतिकल्प में आविर्भाव होता रहता है। अपौरुषेय वेद में आनुपूर्वी अपरिवर्तित रहती है। इतिहास-पुराणों की आनुपूर्वी में महर्षियों द्वारा परिवर्तन होता रहता है। इसी लिए वे पौरुषेय कहे जाते हैं। वर्तमान आनुपूर्वीवाले पुराणादि द्वापर में, आज से पाँच हजार वर्षों से भी अधिक पूर्व, निर्मित हुए हैं। व्यास सर्वज्ञ-कल्प थे। अतएव उन्होंने भूत तथा भविष्यत् की भी कथाएँ लिखी हैं। अतः कथाओं के आधार पर उनका उत्पत्तिकाल निश्चित नहीं किया जा सकता। अनुशासनपर्ववाली कथा का विकास स्कन्दपुराणीय कथा के रूप में हुआ, यह कहना सर्वथा गलत है; क्योंकि उनका परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं है— "वाल्मीकिश्चाह भगवान् युधिष्ठिरमिदं वचः । विवादे साग्निमुनिभिर्ब्रह्मघ्नो वै भवानिति ॥ उक्तः क्षणेन चाविष्टस्तेनाधर्मेण भारत । सोऽहमीशानमनघममोघं शरणं गतः ॥

६४ रामायणमीमांसा तृतीय मुक्तश्चास्मि ततः पापैस्ततो दुःखविनाशनः । आह मां त्रिपुरघ्नो वै यशस्तेऽग्र्यं भविष्यति ॥” (म० भा० १३।१८।१८-१० ) वाल्मीकि ने युधिष्ठिर से कहा था कि किसी विवाद में आहिताग्नि मुनियों ने मुझसे ‘आप ब्रह्मघ्न हैं’ कह दिया । उनके ऐसा कहते ही मैं पापों से युक्त हो गया । तब मैं अमोघ, अनघ भगवान् ईशान की शरण में गया । और पापों से मुक्त हो गया । तदनन्तर दुःखविनाशन त्रिपुरघ्न शिव ने मुझसे कहा—तुम्हारा श्रेष्ठ यश होगा । इस कथा में डाका डालने या तपस्या की कोई बात नहीं है, अतः उन्हीं महर्षि के सम्बन्ध में इस स्वतन्त्र घटना का वर्णन समझना चाहिये । स्कन्दपुराण वैष्णवखण्ड वैशाख-माहात्म्य आदि की कथाओं के अनुसार किसी ने राम-नाम के जप के प्रभाव से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि अगले जन्म में तुम वल्मीक नामक ऋषि के कुल में उत्पन्न होओगे तथा वाल्मीकि नाम धारण कर महान् यशस्वी बन जाओगे । कृणु नामक तपस्वी के शरीर के चारों ओर वल्मीक बन गया था । उसका नाम वल्मीक पड़ा था । व्याध उसी के पुत्ररूप में उत्पन्न होकर वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध हुआ और दिव्य रामकथा रचने में समर्थ हुआ, आदि रूप में वाल्मीकि का इतिवृत्त ज्ञात होता है । अन्य प्रकार के इति- वृत्त भी वाल्मीकि के सम्बन्ध में प्राप्त हैं— स्कन्दपुराणीय अवन्तीखण्ड के २४ वें अध्याय में अग्निशर्मा की कथा है । वह डाकू था । किसी दिन सप्तर्षियों से उसकी भेंट हो गयी । वह उनको मार डालना चाहता था । ऋषियों ने उसे परिवार से यह पूछने भेज दिया कि क्या वे लोग तुम्हारे पापकर्मों में भी भागीदार होंगे ? पूछने पर जब परिवार के लोगों ने पाप-कर्म में भागी- दार होना अस्वीकार कर दिया तब अग्निशर्मा ऋषियों के पास लौटा और उनका उपदेश प्राप्त कर ध्यान तथा मन्त्र- जप में निरत हुआ । तेरहवें वर्ष बाद जब ऋषि लोग उसी मार्ग से लौटे तो उन्होंने उसके शरीर के चारों ओर वल्मीक बना देखा । ऋषियों ने वहाँ से निकाल कर उसका ‘वाल्मीकि’ नाम रखा और रामायण लिखने का आदेश दिया । नागरखण्ड के १२४ वें अध्याय में लोहजङ्घ की कथा है । वह माता-पिता की सेवा में सदैव तत्पर रहता था । परिवार-पालन की दृष्टि से दस्यु बन गया था । उसकी सप्तर्षियों के साथ भेंट हुई । पूर्व वृत्तान्त के समान उसको भी ऋषियों ने कोई मन्त्र बतलाया, वह उसे जपकर सिद्ध हुआ और वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध हुआ । प्रभासखण्ड के २९८ वें अध्याय में शमीमुख ब्राह्मण की कथा है । उसका पुत्र वैशाख था । वह चोरी द्वारा अपने परिवार का पालन करता था । उसकी भेंट सप्तर्षियों से हुई । धन के ही हम भागी हैं, पाप के नहीं, परिवार- वालों से यह सुनकर उसे वैराग्य हो गया । वह भी तप करते करते वल्मीक से आवृत होकर वाल्मीकि बन गया । सप्तर्षियों ने उसके लिए भविष्यवाणी की-- “स्वच्छन्दा भारती देवी जिह्वाग्रे ते भविष्यति । कृत्वा रामायणं काव्यं ततो मोक्षं गमिष्यसि ॥” तुम्हारे जिह्वाग्र में स्वच्छन्द ( बेरोकटोक ) भगवती सरस्वती देवी का निवास होगा । तुम अमर काव्य रामायण की रचना कर तदनन्तर मोक्ष की प्राप्त होओगे । उपर्युक्त सभी कथाएँ प्रामाणिक ग्रन्थों की होने से प्रामाणिक हैं, अतः ‘गुणोपसंहारन्याय’ से इन सबका समन्वय करना ही ठीक है । व्याधवाली कथा में कोई नामनिर्देश नहीं है । वह जन्मान्तर में वल्मीक ऋषि का पुत्र होने से वाल्मीकि बना । उन वाल्मीकि ऋषि को अन्य कथाओं के अनुसार भृगुवंशी मानने में भी कोई विरोध नही

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६५ हैं । अन्य कथाओं में तो केवल नाममात्र का भेद है । एक ही व्यक्ति के कई नाम हो सकते हैं, अथवा देश-भेद से उनके नाम-भेद उपपन्न हो जाते हैं । अन्य कथाओं में भी उन्हें भृगुवंशीय मानने में कोई बाधा नहीं है, क्योंकि किसी भी कथा में उसके विपरीत वर्णन नहीं है । अध्यात्मरामायण में स्वयं वाल्मीकि द्वारा ही इ'वृत्त वर्णित है । अतः उसी के साथ सबका समन्वय होना ठीक है । जैसे छान्दोग्योपनिषद् में तेज, अप् और अन्न पूर्विका सृष्टि का वर्णन है और प्रश्नोपनिषद् में भिन्न क्रम है— 'तत्तेजो असृजत' (छा० उ० ६।२।३), “स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियम् ॥” ( प्र० उ० ६।४ ) मुण्डक में और भिन्न है— “ एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥” ( मु० उ० २।१।३ ) तथा तैत्तिरीय में अन्य है—“तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः” ( तै० उ० २।१ ) इस प्रकार प्रश्न, मुण्डक आदि में क्रमरहित सृष्टि का वर्णन है । तैत्तिरीयोपनिषद् में आकाश, वायु, तेज, और पृथिवी के क्रम से सृष्टि का वर्णन है । उत्तरमीमांसा में तैत्तिरीयश्रुति के अनुसार अन्य श्रुतियों का समन्वय किया गया है। इसी तरह छान्दोग्य तथा बृहदारण्यक उपनिषदों की पञ्चाग्निविद्या का समन्वय है— “असौ वाव लोको गौतमाग्निः” ( छा० उ० ५।४।१ ), “अथैनमग्नये हरन्ति तस्याग्निरेवाग्निर्भवति समित् समित् ॥ ( बृ० उ० ६।२।१४) पञ्चाग्नि-विद्या छान्दोग्य और बृहदारण्यक दोनों उपनिषदों में हैं । वहाँ छान्दोग्य उ० में द्यु, पर्जन्य, पृथिवी, पुरुष, योषित् इन पाँच अग्नियों का वर्णन है । परन्तु बृहदारण्यक उ० में षष्ठ लौकिक अग्नि का भी वर्णन है; पर दोनों शाखाओं की पञ्चाग्निविद्या एक ही हैं, अतः जैसे बृ० उ० के अनुसार ही छा० उ० की सङ्गति लगा ली जाती है वैसे ही अध्यात्मरामायण की कथा के साथ ही वाल्मीकिसम्बन्धी अन्य कथाओं का भी समन्वय समझना चाहिये । उसमें कहा है— “अहं पुरा किरातेषु किरातैः सह वर्धितः । जन्ममात्रं द्विजत्वं मे शूद्राचाररतः सदा ॥ “शूद्रायां बहवः पुत्रा उत्पन्ना मेऽजितात्मनः । तत्तच्चौरैश्च संगम्य चोरोऽहमभवं पुरा ॥” ( अ० रा० २।६।६४,८७ ) कथा यों वर्णित है—वाल्मीकि ने कहा, मैं प्राचीनकाल में किरातों के मध्य में रहकर किरातप्राय हो गया था । केवल जन्ममात्र से मैं द्विज ( ब्राह्मण ) था, परन्तु आचरण सब मेरे शूद्रों के से थे, शूद्रा पत्नी में मेरे बहुत से पुत्र भी उत्पन्न हुए । चोरों के साथ रहते रहते मैं भी चोर हो गया । एक बार मैंने वन में अग्नि एवं सूर्य के समान दिव्य प्रकाशवाले मुनियों को देखा । उनके वस्त्रादि लेने के लिए मैं उन्हें पकड़ने दौड़ा । मुनियों ने मुझे देखकर पूछा—क्या करना चाहते हो ? मैंने कहा, मेरे बहुत से बुभुक्षित पुत्र, स्त्री आदि हैं । उनके रक्षणार्थ में जङ्गल में लोगों को मारकर धन-हरण करता हूँ ? उन्होंने कहा— तुम कुटुम्ब के लोगों से जाकर पूछो कि जो मैं तुम लोगों के लिए प्रतिदिन पाप करता हूँ उसमें तुम लोग भी भागी- दार हो कि नहीं ? मैंने जाकर पूछा तो कुटुम्बवालों ने कहा—हम लोग तो धनादि फल के ही भागी हैं, पाप के नहीं । यह सुनकर मेरे मन में निर्वेद, वैराग्य एवं ग्लानि उत्पन्न हो गयी । मैं मुनियों की शरण में गया । करुणापूर्ण ९

६६ रामायणमीमांसा तृतीय मानस होकर मुनियों ने कहा-उठो, उठो, सन्तसमागम सफल हो गया । उन लोगों ने परस्पर विचार किया कि यद्यपि यह व्याध बड़ा ही दुर्वृत्त है, उपेक्ष्य ही है, तथापि शरणागत हुआ है; अतः इसकी रक्षा करनी चाहिये । तब उन्होंने कहा- जब हम लोग लौट कर आयें तब तक तुम यहीं 'मरा मरा' मन्त्र जपते रहो- “इत्युक्त्वा राम ते नाम व्यत्यस्ताक्षरपूर्वकम् । एकाग्रमनसा चैव मरेति जप सर्वदा ॥” आपके राम-नाम का व्यत्यस्त (उलटा) 'मरा' नाम जपने को उन्होंने कहा । यह कहकर मुनि लोग चले गये । मैं उनके कहने के अनुसार एकाग्र मन से जप करते करते बाह्य प्रपञ्च भूल गया। इस तरह बहुत काल तक सङ्गहीन एवं निश्चल होकर रहने के कारण मेरे ऊपर वल्मीक हो गया । युग- सहस्र के अन्त में ऋषि लोगों ने पुनः आकर मुझसे उस वल्मीक से निकलने के लिए कहा । फिर नीहार के बीच से निकलते हुए भास्कर के तुल्य उस वल्मीक से मैं निकला । जब मैं निकला तब मुनियों ने कहा- अब तुम मुनीश्वर वाल्मीकि हो गये हो । अब यह तुम्हारा दूसरा जन्म है । हे श्रीराम ! मैं आपके मन्त्र-जप के प्रभाव से ऐसा हो गया । इसी कथा के साथ वाल्मीकिसम्बन्धी सब कथाओं की सङ्गति लग जाती है । इस रामायण में भी वाल्मीकि ने अपने को प्रचेता का दसवां पुत्र कहा है - “सुतो तवैव दुर्धर्षों तथ्यमेतत् ब्रवीमि ते । प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो रघुकुलोद्वह !॥” (वा० रा० ७।९६।१७,१८) इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि पहले वे प्रचेता के दशम पुत्र थे । पश्चात् किसी शापवशात् पापयुक्त हो गये । वाल्मीकि-युधिष्ठिर-संवाद से शाप का भी आभास मिलता ही है । अनन्तर वे किसी भृगुवंशीय ब्राह्मण के यहाँ उत्पन्न हुए । वहाँ दस्युओं के संसर्ग से दस्यु आदि होकर मुनि-समागम के प्रभाव से क्रमेण वाल्मीकि महर्षि हुए । इस अन्तिम जन्म में वे अत्यन्त निष्पाप हो गये । उन्होंने मन से भी कभी मिथ्याभाषण नहीं किया और महती तपश्चर्या की । इसी अभिप्राय का वर्णन गोस्वामीजी ने किया है - "ऊलटा नाम जपत जग जाना। वाल्मीकि भये ब्रह्मसमाना ॥" (चतुष्पदी १८४) आनन्दरामायण का भी इसी के साथ समन्वय हो जाता है । तत्त्वसारसंग्रह की चमत्कार कथाएँ भी विरुद्ध नहीं हैं। कृत्तिवासीय रामायण में वाल्मीकि को च्यवन का पुत्र कहा गया है । सन्तान-परम्परा में होनेवाले को भी पुत्र कहा जाता है । इसी दृष्टि से, च्यवन का भार्गव-वंश में जन्म होने से, वाल्मीकि च्यवन के पुत्र कहे गये । श्वपच वाल्मीकि कोई अन्य हुए ही नहीं । विष्णुधर्मोत्तर के मूर्ति-निर्माण के प्रसङ्ग में वर्णित वाल्मीकि रामायणकार ही हैं । तपोनिष्ठ तथा शान्त वाल्मीकि का रूप गौर वर्ण बनाना चाहिये । उनका आकार जटा-मण्डल से आच्छन्न होना चाहिये और वह न कृश होना चाहिये और न स्थूल ही होना चाहिये-

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६७ “गौरस्तु कार्यो वाल्मीकिर्जटामण्डलदुर्दृशः । तपस्यभिरतः शान्तो न कृशो न च पीवरः ।।” ( विष्णुध० पु० ३।८५ ) जैसे सीताराम के गुणग्रामरूपी पुण्यारण्य में विहार करनेवाले कपीश्वर की पूजा होती है वैसे ही विशुद्ध विज्ञानवाले कवीश्वर वाल्मीकि की भी पूजा उचित ही है। मन्त्ररामायण के प्रसङ्ग में वाल्मीकि को ब्रह्मा का अंश कहा गया है। ब्रह्मा और विष्णु का अभेद होने से विष्णुरूपता भी उनमें अनुपपन्न नहीं है। विष्णुधर्मोत्तरपुराण ( ७४।३८ ) के अनुसार उनका विष्णु का अंश होना भी ठीक ही है। विष्णुधर्मोत्तर को पाँचवीं शती की रचना कहना भी निष्प्रमाण ही है। पौर्वापर्य-विरोध का समाधान वाल्मीकि की कथाओं का कल्पभेद से भी समाधान होता है, क्योंकि भिन्न-भिन्न कल्प के देवों और ऋषियों के सुकृत भिन्न भिन्न होने से उनकी उत्पत्ति एवं कर्मों में भेद हो सकता है। शौनकादि मुनियों ने सूत से प्रश्न किया था—पुराणों में कहीं कहीं पौर्वापर्य-विरोध प्रतीत होता है। कहीं क्षेत्रभेद है तो कहीं भक्तोद्धार की विधि में भेद है, कहीं ब्रह्मा की सृष्टि में ही भेद दिखायी देता है। तीर्थों की उत्पत्ति में भी भेद है। विभिन्न पुराणों में भिन्न भिन्न कथाएँ भी मिलती हैं। पुराणों के आप ही वक्ता हैं। आप बताने की कृपा करें कि इन भेदों का कारण क्या है ? ( काशीकेदारमाहात्म्य २७।७५।७२ ) सूतजी ने इन प्रश्नों का निम्नोक्त उत्तर दिया—विभिन्न कल्पों में भगवान् शिव की विचित्र विभिन्न लीलाएँ होती हैं। ब्रह्मादि स्थावरान्त प्राणियों के विभिन्न कर्मों के अनुसार कर्म-फल भी विभिन्न होते हैं; अतः पुराणों की कथाओं में भी भेद आ जाता है। शास्त्र सब सत्य हैं। उनमें कृतियों का भेद है, परन्तु तात्पर्य सभी का शिवभक्ति में ही है। शिवजी की अतुलित महिमा सर्वत्र एकरूप है। यही मेरे गुरुदेव व्यासदेव ने कहा है ! जो लोग भक्तिबोधक शिवधामदायिनी विचित्र कथाओं का सार जानते हैं, वे अवश्य ही शिव को प्राप्त होते हैं— “कल्पे कल्पे क्षपासु क्षणिकमभिमता दिव्यलीला विचित्राः । या याः पूर्वं बभूवुः श्रवणसुखकरास्ताः पुनस्त्वन्यकल्पे ।। ब्रह्माद्याः स्थावरान्ताः स्वकृतसुकृतसत्कर्मपाकेन भिन्नाः । पौराण्येस्ताः कथाश्च पृथगिव प्रतिभान्त्यर्थतस्तास्त्वभिन्नाः ।। सर्वं सत्यं च शास्त्रं विविधकृतिभिदा भेदितञ्चापि शम्भोः । तात्पर्यं चैकरूपं विमलसुमतिभिर्ग्राह्यमाद्यन्तदृष्ट्या ।। यावद् वेदेन जातोऽप्यतुलितमहिमा चैकरूपः प्रणेतुः । तत्सारं ग्राह्यमीशे विनिहितमतिभिः प्राह चैवं गुरुर्माम् ।।” —काशीकेदारमाहात्म्य महाभारत और रामायण भारतीय शास्त्रों एवं परम्पराओं से अपरिचित पाश्चात्यों का अन्धानुकरण करते हुए बुल्के साहब भी भारत और महाभारत में आदिरामायण और प्रचलित रामायण के समान भेद मानते हैं। वे भारत और महाभारत का मध्यकाल ही रामायण का काल मानते हैं, पर यह अत्यन्त असंगत है। पाश्चात्यों को यह विश्वास ही नहीं होता कि लाखों वर्ष पहले भी वैदिक सभ्यता थी। ईसाई-भावनाओंसे अभिभूत पाश्चात्य विद्वान् एवं उनके अनुयायी कुछ भारतीय भी अनादि और अनन्त 'वेदों' को भी ईसा से कुछ सहस्र वर्ष

पूर्व की ही रचना मानते हैं। प्रकृत में इतना उनको भी कहना पड़ता है कि महाभारत में रामायण के पात्रों और वाल्मीकिरामायण का भी वर्णन है; परन्तु रामायण में महाभारत के पात्रों का वर्णन नहीं है। कहा जाता है कि पाणिनि-सूत्रों में भारत के विषयों का निर्देश मिलता है परन्तु रामायण के विषयों का नहीं मिलता। पर यह सर्वथा अशुद्ध है। पाणिनि-सूत्रों में कौशल्या, कैकेयी, शूर्पणखा आदि का निर्देश मिलता है यह पीछे कहा जा चुका है। इसी तरह भारत का पश्चिम में, रामायण का पूर्व में निर्माण मानना भी निर्मूल है। इसी आधार पर कुछ लोग रामायण की कथावस्तु को भी भारत के बाद की मानते हैं जो सर्वथा श्रुति, स्मृति, पुराण तथा इतिहास के विरुद्ध है। पुराणों के अनुसार वैवस्वत मन्वन्तर के २४ वें त्रेता में श्रीराम का जन्म हुआ है। श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर आदि का जन्म अट्ठाइसवें द्वापर में हुआ, अतः भारतीय शास्त्रों एवं विद्वानों के अनुसार रामायण से बहुत काल के पश्चात् भारत या महाभारत का निर्माण हुआ। महाभारत के ही एक अंश गीता में भगवान् कृष्ण कहते हैं, शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ— "रामः शस्त्रभृतामहम्" (गी० १०।३१) इसी तरह आरण्यकपर्व में भीम कहते हैं, बुद्धि, सत्त्व और बल से सम्पन्न, गुणश्लाघ्य शूर मेरे भ्राता वानरपुंगव हनुमान् रामायण में प्रसिद्ध हैं— "भ्राता मम गुणश्लाघ्यो बुद्धिसत्त्वबलान्वितः । रामायणोऽतिविख्यातः शूरो वानरपुङ्गवः ॥" (म० भा० ३।१४७।११) इसी प्रकार हरिवंशोक्त भारत-श्रवण की विधि में कहा है— "वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ । आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥" (म० भा० १८।६।२३) इस तरह भारत में वेद के समान ही रामायण का उल्लेख है। महाभारत में अनेक स्थलों पर वाल्मीकि का तपस्वी महर्षि के रूप में उल्लेख है। इतना ही नहीं वाल्मीकिरामायण का श्लोक भी महाभारत में उद्धृत है— "अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि । पीडाकरममित्राणां यत्स्यात् कर्तव्यमेव तत् ॥ न हन्तव्याः स्त्रिय इति यद् ब्रवीषि प्लवङ्गम । सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा ॥" (म० भा० ७।११८।४८) अर्थात् वाल्मीकि ने यह श्लोक गाया है कि अमित्रों को जो भी अप्रिय हो वह करना ही चाहिये । शान्तिपर्व में गोविन्द की महिमा गानेवालों में असित, देवल और मार्कण्डेय के साथ वाल्मीकि का भी उल्लेख है। नलोपाख्यान के सुदेव का स्वागतभाषण (म० भा० ३।६८।८-२६) रामायण से उद्धृत है। इससे स्पष्ट होता है कि रामायण महाभारत से प्राचीन है। भारत तथा महाभारत की कल्पना निर्मूल बुल्के कहते हैं—"परन्तु महाभारत के प्राचीनतम पर्वों में रामायण एवं वाल्मीकि का उल्लेख नहीं है। उनमें राम-कथा के पात्रों का उल्लेख है। इससे प्रतीत होता है भारत के कवि राम-कथा और उसके प्रधान पात्रों से परिचित थे।" यह भी भारतीय शास्त्रों एवं विद्वानों की दृष्टि में अत्यन्त असंगत है।

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६९ महाभारत के अनुसार भगवान् व्यास ही भारत या महाभारत के रचयिता हैं। वे भला राम के समकालिक रामायण और उसके कवि से कैसे अपरिचित रह सकते हैं। जैसे पाश्चात्यों की रामायण और आदि- रामायण की कल्पना निर्मूल है वैसे ही भारत एवं महाभारत की कल्पना भी निर्मूल है। संस्कृत भाषा सर्वप्राचीन भाषा है तथापि संस्कृत, जेन्द, लैटिन, ग्रीक आदि भाषाओं का साम्य देखकर पाश्चात्यों ने उनकी जननी किसी नयी भाषा की कल्पना कर डाली, जिसके अस्तित्व में कोई प्रमाण नहीं है। वैसे ही उन्होंने महाभारत से भिन्न एक भारत की भी जो निर्मूल कल्पना कर डाली है वह निरी दुरभिसन्धि ही है। जिन पर्वों में रामकथाएँ कम हैं उन्हें प्राचीन और जिनमें अधिक हैं उन्हें नवीन तथा जिनमें रामकथा का अभाव है एवं उसके पात्रों का अस्तित्व है वह मूल भारत है यह कल्पना भी अन्योन्याश्रयदोष से ग्रस्त है। रामायण की अर्वाचीनता सिद्ध होने पर ही उसके उल्लेख से पर्वों की अर्वाचीनता सिद्ध होगी। इसी प्रकार पर्वों की अर्वाचीनता सिद्ध होने से ही रामायण की अर्वाचीनता सिद्ध होगी । पर जब रामायण की प्राचीनता रामायण महाभारत दोनों से ही सिद्ध है, तब इस आधार पर किन्हीं पर्वों की अर्वाचीनता कैसे सिद्ध हो सकेगी ? इसी लिए कौन सा पर्व प्रामाणिक है एवं कौन-सा अप्रामाणिक इसकी कोई कसौटी पाश्चात्यों के पास नहीं है। बुल्के के अनुसार "युद्धसम्बन्धी पर्वों में द्रोणपर्व सबसे अर्वाचीन है। उसमें रामकथा का चौदह बार उल्लेख है। भीष्म, कर्ण और शल्य पर्वों में पाँच बार उल्लेख आता है। आरण्यक-पर्व में रामकथा का दो बार वर्णन है। इसके अतिरिक्त भी उसमें रामकथाओं का पन्द्रह बार सङ्केत मिलता है। यह पर्व अपेक्षाकृत अर्वाचीन है। यह कथाओं तथा उपाख्यानों का भण्डार है। इस पर्व में राम का अवतार होने का भी उल्लेख है। इससे स्पष्ट है कि पर्वों की अर्वाचीनता का मूल अधिकाधिक रामकथा उल्लेख ही है ?” परन्तु यह मूल नहीं सर्वथा ही अमूल है। आरण्यकपर्व में भीम और हनुमान् की कथा एवं संक्षेप में रामकथा का प्रसंगानुसार वर्णन ठीक ही है। संक्षिप्तकथन में कुछ सामग्रियों का छूट जाना भी असंगत नहीं है। इसी तरह द्रोणपर्व की कथा में भी बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड की सामग्री का न होना असंगत नहीं, क्योंकि वहाँ तो षोडशराजोपाख्यान का उद्देश्य प्रभावशाली राजाओं के भी परलोक-गमन का वर्णन कर शोक-निवारणमात्र है, अतः सबका वर्णन इष्ट नहीं है। शान्तिपर्व में युधिष्ठिर की शोक-निवृत्ति ही इष्ट है। महाभारतवनपर्व में हनुमान्-संवाद में हनुमान् ने कहा है— “अथ दाशरथिर्वीरो रामो नाम महाबलः। विष्णुर्मानुषरूपेण चचार वसुधातborderलम् ॥” (म० भा० ३।१४७।३१) अर्थात् विष्णु ने ही मानुषरूप में दाशरथि राम होकर वसुधा को उपकृत किया था। रामोपाख्यान में ब्रह्मा ने कहा कि मेरे अनुरोध से चतुर्भुज विष्णु रावण-वधार्थ हुए हैं, वे रावण-वध करेंगे। धौम्य ने कहा है — “विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य वै। दशग्रीवो हतश्छन्नं संयुगे भीमकर्मणा ॥” (म० भा० ३।३१५।२०) “यमस्य नेता नमुचेश्च हन्ता ।” (म० भा० ३।२५।१०) “असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः। मार्कण्डेयश्च गोविन्दे कथयन्त्यद्भुतं महत् ॥” ( म० भा० १२।२०७।४ )

७० रामायणमीमांसा तृतीय “सन्ध्यांशे समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च । अहं दाशरथी रामो भविष्यामि जगत्पतिः ॥” (म० भा० १२।३३९।८५) “वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ । आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥ (म० भा० १८।६।२३) शान्तिपर्व में शम्बूक का भी उल्लेख है— “श्रूयते शम्बूके शूद्रे हते ब्राह्मणदारकः । जीवितो धर्ममासाद्य रामात् सत्यपराक्रमात् ॥' (म० भा० १२।१५३।६७ ) ऊपर के उद्धरणों से राम का अवतार होना एवं रामायण तथा वाल्मीकि महर्षि का अति प्राचीन होना सिद्ध है, फिर भी बुल्के इन्हीं उद्धरणों के आधार पर यह सिद्ध करना चाहते हैं कि ये सब अंश बहुत पीछे के हैं, क्योंकि उक्त सब अंश प्रचलित रामायण के हैं जो कि आदिरामायण की अपेक्षा बहुत अर्वाचीन है । परन्तु यह उनकी केवल दुरभिसन्धि है । हम पहले लिख आये हैं कि उक्त सभी अंश प्रामाणिक हैं एवं वाल्मीकिनिर्मित हैं। महाभारत से अतिप्राचीन होने के कारण महाभारत में इनका उद्धरण उचित है । विष्णुपुराण के अनुसार ऋक्ष नामक भार्गव वाल्मीकि हुए हैं। “ऋक्षोऽभूद्‌भार्गवस्तस्माद् वाल्मीकिर्योऽभिधीयते ॥” वाल्मीकिरामायण में भी— “सन्निबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विंशत्सहस्रकम् । उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना ॥” (वा० रा० ७।९४।२५) इत्यादि वचनों में वाल्मीकि को भार्गव कहा गया है । वाल्मीकिरामायण में ही वाल्मीकि को प्रचेता का दसवां पुत्र कहा गया है । ‘वेदः प्राचेतसादासीत्’ इस लव-कुश के मंगलाचरण पुराणवचन में भी वाल्मीकि को प्राचे- तस कहा गया है । इन सब वचनों के अनुसार विदित होता है कि पृथु के प्रपौत्र प्राचीनबहीं राजर्षि ही प्रचेता हुए हैं । उनके ही दस प्रचेतस पुत्र हुए हैं। उन्हीं में अन्तिम वाल्मीकि थे, अथवा पूर्व के प्राचेतस मुनि ही शापवशात् विप्र होकर पुनः वाल्मीकि हुए हैं अथवा भृगु मुनि का ही प्रचेता भी नाम था । उनके दस पुत्रों में अन्तिम वाल्मीकि थे । वही निश्चल होकर तप में संलग्न हुए थे । उनपर वल्मीक बन गया था, पुनः उस वल्मीक से प्रादुर्भूत होने के कारण वे वाल्मीकि कहलाये । ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार लोक-पितामह ब्रह्मा ने वल्मीकप्रभूत होने से उन्हीं को 'वाल्मीकि' नाम प्रदान किया है— “अथाब्रवीन्महातेजा ब्रह्मा लोकपितामहः । वल्मीकप्रभवो यस्मात्तस्माद् वाल्मीकिरित्यसौ ॥” मातृगर्भ के समान वल्मीक में रहने के कारण वही महात्मा वाल्मीकि कहलाये । ब्रह्मवैवर्तपुराण २२ वें अध्याय में कहा गया है— “कति कल्पान्तरेऽतीते स्रष्टुः सृष्टिविधौ पुनः । यः पुत्रश्चेतसो धातुः बभूव मुनिपुङ्गवः ॥ तेन प्रचेता इति च नाम चक्रे पितामहः ।”

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ७१ अर्थात् कल्पान्तरों के बीतने पर स्रष्टा के नवीन सृष्टि-विधान में ब्रह्मा के चेतस् से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसे ही, ब्रह्मा के प्रकृष्ट चित्त से आविर्भूत होने के कारण, प्रचेता कहा गया है । तथा च ब्रह्मा के मानस पुत्र ही प्रचेता हुए हैं । ब्रह्मा के दस पुत्र मनु आदि स्मृतियों में प्रसिद्ध हैं- "अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् । पतीन् प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश ॥" (मनु० १।३४) ब्रह्मा कहते हैं- 'मैंने प्रजा-सृष्टि की इच्छा से सुदुश्चर तप करके दस प्रजापति महर्षियों की सृष्टि की । वे थे मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद- "मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च ॥" (मनु० १।३५) महाभारत के सम्भवपर्व में ७५ अध्याय के चौथे श्लोक में कहा गया है प्रचेता के दस पुण्यजन पुत्र हुए हैं- "दश प्रचेतसः पुत्राः सन्तः पुण्यजनाः स्मृताः ।" प्राचेतस मुनि ही वाल्मीकि हैं, यह मार्कण्डेयपुराण से सिद्ध है- "उवाच प्रणतो वाक्यं वाल्मीकिं च तपोधनम् । प्राचेतस महाभाग श्रीरामस्य कथां शुभाम् ॥ कथयस्व महाबुद्धे रामस्य परमात्मनः ।" ब्रह्मा के इन दस पुत्रों में नौ प्रजा-सृष्टिकर्ता हुए हैं । दशम पुत्र ने शतकोटिप्रविस्तर रामायण रचकर ब्रह्मा से सृष्ट प्रजा को ज्ञान-प्रदान किया था । सृष्टिकर्ता न होने से ही नौ प्रजापतियों में उनकी गणना नहीं है । तथा च शिवरामायण में कहा है- "पुरा स्वायम्भुवो ह्यासीत् प्राचेतस महाद्युतिः । ब्रह्मात्मजस्तु ब्रह्मर्षिः तेन रामायणं कृतम् ॥ शतकोटिप्रविस्तीर्णं नानाकल्पसमुद्भवम् । स कदाचिद् ब्रह्मलोके धातारञ्चाप्यनिन्दत् ॥ स्वसुताग्रहणात्तेन शप्त आप निषादताम् । चमत्कारपुरे भूत्वा भार्गवान्वयसम्भवः ॥ लोहजङ्घो द्विजो ह्यासीद् ऋक्षनामान्तरो हि सः । मातापित्रोः सेवया स कञ्चित्कालं गृहे वसन् ॥ भार्यां पतिव्रतां साध्वीं तां परित्यज्य स द्विजः ॥ ब्राह्मीं वृत्तिं परित्यज्य चोरकर्म समाचरत् । नारदेनोपदिष्टस्तु तपोनिष्ठां समाश्रितः ॥ वल्मीकमभवत्तस्य शरीरे नारदाज्ञया । वल्मीकनिर्गमाद् ब्रह्मा वाल्मीकिरिति चाब्रवीत् ॥" अर्थात् प्राचीनकाल में स्वायंभव प्राचेतस महामुनि ब्रह्मा के पुत्र हुए थे । उन्होंने ही शतकोटि श्लोकों का सुविस्तृत रामायण ग्रन्थ रचा है । वह राम के विभिन्न कल्पों के चरित्रों का सङ्कलन था । उन्होंने ब्रह्मलोक में ब्रह्मा की, स्वसुता का ग्रहण करने के कारण, निन्दा की थी । इसलिए वे ब्रह्मा के शाप से निषाद हो गये । उसके

पहले वे चमत्कार-पुर में भार्गव-वंश में लोहजङ्घ नामक ब्राह्मण हुए थे। उन्हीं का अन्य नाम ऋक्ष भी था। कुछ समय तक वे माता-पिता की सेवा करते हुए गृह में रहे। पश्चात् साध्वी पतिव्रता भार्या को त्याग कर, ब्राह्म-वृत्ति को छोड़कर चौर्य-कर्म करने लगे। अनन्तर नारद के उपदेश से वे तपस्या में लग गये और उनके शरीर पर वल्मीक जम गया। बहुत काल के पश्चात् नारद की ही आज्ञा से वे वल्मीक से निकल कर वाल्मीकि महर्षि हो गये। समन्वय की दृष्टि से कहा जा सकता है कि किसी कल्प में प्रचेता प्राचीनबर्ही के दसवें पुत्र थे, अतएव प्राचे- तस कहलाये। किसी कल्प में प्रचेता वरुण के दसवें पुत्र हुए थे। उसमें वे भृगु के भ्राता होने से भृगुसम्बन्धित होकर भार्गव कहलाये। वर्तमान कल्प में तो प्रकृष्ट चित्तवाले प्रचेता ब्रह्मा के मरीचि आदि दस पुत्रों में दशम होने के कारण प्रचेता कहलाये। स्वार्थ में अण् प्रत्यय होने के कारण प्रचेता ही प्राचेतस शब्द से भी कहे गये हैं। वे ही शापवश भार्गव वंश में ऋक्ष या लोहजङ्घ नाम से उत्पन्न हुए, अतः भार्गव कहलाये थे। चौर्यादि कर्म करते हुए वही किरात या निषाद हो गये थे। सप्तर्षियों या नारद के सम्पर्क से वही तपोनिष्ठ होकर महर्षि वाल्मीकि हुए थे। स्कन्दपुराण आदि की अन्य कथाओं से भी इस कथा का समन्वय कर लेना उचित है। अन्य लोगों ने भी वाल्मीकि की ऐतिहा- सिकता पर पाश्चात्य लोगों द्वारा प्रदर्शित मार्ग का ही अनुसरण किया है। वे लोग इतिहास और पुराण की वाल्मीकि सम्बन्धित कथाओं को परस्पर असम्बद्ध एवं विशृङ्खलित मानते हैं। कहीं उन्हें सुविज्ञ तपस्वी बताया गया है तो कहीं प्रचण्ड दस्यु। कहीं उन्हें राजा राम से अनेकों वर्ष पूर्व उत्पन्न कहा गया है तो कहीं उनके समकालीन कहा गया है; पर आधुनिक तो उन्हें ईसा से कुछ ही शती पूर्व का मानते हैं। भारतीय दृष्टिकोण से तो महर्षि वाल्मीकि को राम से अनेक वर्ष पूर्व उत्पन्न मानने में कोई आपत्ति नहीं है। वे दीर्घजीवी होने के कारण राम के समकालीन भी थे। पहले उन्होंने शतकोटि श्लोकों का सुविस्तृत रामायण काव्य लिखा था। राम के समय में सीताचरित्रशुद्धि तथा कुशी-लव के अधीत वेदों के उपबृंहणार्थ चौबीस सहस्र श्लोकों में गायत्री के चतुर्विंशति अक्षरों का अनुसरण करते हुए चतुर्विंशतिसहस्रसंहितारूप रामायण ग्रन्थ लिखा। जब वाल्मीकि के अनुसार राम की ग्यारह सहस्र वर्ष की आयु थी तो वाल्मीकि महर्षि की उससे भी अधिक आयु होना आश्चर्यपूर्ण तथा असम्भावित नहीं कहा जा सकता। ई० श० के कुछ ही शती पूर्व उनका जन्मकाल मानना तो सर्वथा निराधार ही है। तैत्तिरीयप्रातिशाख्य के तीन सूत्रों से सूचित वाल्मीकि को आदि कवि से पृथक् मानने में कोई समुचित तर्क नहीं है। ‘पकारपूर्वश्च वाल्मीकेः’ वाल्मीकिशाखी के मतानुसार पकारपूर्व पकार को छत्वापत्ति नहीं होती। यहाँ ‘च’ शब्द का ‘प्रतिषेध’ अर्थ है। ‘कपवर्गपरश्चाग्निवेश्यवाल्मीक्ययोः’ अग्निवेश्य और वाल्मीकि शाखा-वाले आचार्यों के मत में कवर्ग एवं पवर्ग पर विसर्जनीय स स्थान ऊष्मा नहीं बनता है। यहाँ भी ‘च’ का निषेध ही अर्थ है। ‘उदात्तो वाल्मीकेः’ वाल्मीकिशाखी के मतानुसार प्रणव का उदात्त स्वर होता है। कहा जाता है—इन वैयाकरण वाल्मीकि की आदि कवि वाल्मीकि के साथ एकता नहीं कही जा सकती; क्योंकि व्याकरणाचार्य के रूप से उनकी प्रशस्ति कहीं नहीं मिलती है। याकोबी इन दोनों व्यक्तियों को पृथक् ही मानते हैं, परन्तु उक्त कथन का कोई आधार नहीं है। रामायण सरीखे महाकाव्य का निर्माता महान् संस्कृतज्ञ व्याकरण का आचार्य नहीं था, यह कहना अत्यन्त उपहासास्पद ही है। वाल्मीकि ने हनुमान् की व्याकरणज्ञता का चित्रण किया है। श्रीराम कहते हैं— “नानुग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः । नासामवेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितुम् ॥” (वा० रा० ४।३।२८)

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ७३ जो ऋग्वेद में प्रातिशाख्यज्ञानपूर्वक शिक्षित नहीं है, जो यजुर्वेद को धारण नहीं करता एवं जो सामवेद नहीं जानता, वह ऐसा भाषण नहीं कर सकता । "नूनं व्याकरणं कृत्स्नं अनेन बहुधा श्रुतम् । बहु व्याहरताऽनेन न किञ्चिदपशब्दितम् ॥" (वा० रा० ४।३।२९) निश्चय ही इसने सम्पूर्ण व्याकरण का खूब श्रवण (अध्ययन) किया है, तभी तो बहुत बोलते हुए भी इसने कहीं भी अपशब्द का प्रयोग नहीं किया । "न मुखे नेत्रयोश्चापि ललाटे च भ्रुवोस्तथा । अन्येष्वपि च सर्वेषु दोषः संविदितः क्वचित् ॥" (वा० रा० ४।३।३०) बोलते समय इसके नेत्र, ललाट, भ्रू तथा अन्य सभी अङ्गों में किसी प्रकार की विक्रिया परिलक्षित नहीं होती । "अविस्तरमसन्दिग्धमविलम्बितमव्यथम् । उरस्थं कण्ठगं वाक्यं वर्तते मध्यमस्वरम् ॥" (वा० रा० ४।३।३१) मध्यमारूप से उरस्थ, वैखरीरूप से कण्ठ में रहनेवाला न अत्यन्त उच्च और न अत्यन्त नीच, मध्यम स्वर का इसके द्वारा उच्चारित वाक्य अविस्तर, असन्दिग्ध, अविलम्बित और अव्यथ (श्रोता के कानों को व्यथित न करनेवाला) अर्थात् श्रुतिकटुदोष से रहित है । "संस्कारक्रमसम्पन्नामद्रुतामविलम्बिताम् । उच्चारयति कल्याणीं वाचं हृदयहारिणीम् ॥" (वा० रा० ४।३।३२) यह ऐसी हृदय को आह्लादित करनेवाली कल्याणी वाणी का उच्चारण करता है जो कि संस्कारक्रम- विशिष्ट है, अर्थात् विशिष्ट आनुपूर्वीरूप से पद, वाक्य आदि के ग्रहणार्थ अन्तःकरण में क्रमविशिष्ट वर्णाकार संस्कार उत्पन्न करनेवाली है; क्योंकि क्रमविशिष्ट वर्णों में ही पदत्व और वाक्यत्व सम्पन्न होता है, तभी वाक्यार्थ-बोध हो सकता है । क्रमहीन या विपरीत क्रम से वर्णों के संस्कारों से अभीष्ट वाक्यार्थ-बोध नहीं हो सकता । साथ ही यह वाणी अद्भुत और अविलम्बित अर्थात् मध्यमस्वरवाली है । "अनया चित्रया वाचा त्रिस्थानव्यञ्जनस्थया । कस्य नाराध्यते चित्तं उद्यतासेररेरपि ॥" (वा० रा० ४।३।३३) यह वाणी उर, कण्ठ, सिर इन तीन स्थानों में व्यक्त होकर श्रोताओं के श्रोत्रों से ग्राह्य होनेवाली है । ऐसी चित्र वाणी सुनकर ऐसा शत्रु भी कौन होगा जिसका चित्त भी अनुकूल न बन जायेगा । क्या ऐसा चित्रण कोई ऋक्, साम, यजु तथा शिक्षा, प्रातिशाख्य आदि से अपरिचित कवि कर सकता है ? इसी तरह श्रीहनुमान् के अध्ययन की चर्चा करते हुए कहा गया है— "असौ पुनर्व्याकरणं ग्रहीष्यन् सूर्योन्मुखः प्रष्टुमनाः कपीन्द्रः । उद्यद्गिरेरस्तगिरि जगाम ग्रन्थं महद् धारयनप्रमेयः ॥ १०

७४ रामायणमीमांसा तृतीय ससूत्रवृत्त्यर्थपदं महार्थं ससंग्रहं सिद्ध्यति वै कपीन्द्रः । नह्यस्य कश्चित् सदृशोऽस्ति शास्त्रे वैशारदे छन्दगतौ तथैव ॥ सर्वासु विद्यासु तपोविधाने प्रस्पर्धतेऽयं हि गुरुं सुराणाम् ।” (वा० रा० ७।३६।४४-४६) उदयाचल से वे सूर्य के सम्मुख होकर उनसे प्रश्न करते हुए सूर्य से व्याकरण-वृत्ति, भाष्य, वातिक, संग्रह आदि के स्वरूपतः तथा अर्थतः महान् ग्रन्थों को धारण करते हुए रथ के सामने आकाश में अस्ताचल तक उलटे चलते रहे । पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा आदि द्वारा वेदार्थ के निर्णय एवं पाण्डित्य में हनुमान् से बढ़कर कोई भी नहीं है । हनुमान् सभी विद्याओं तथा तपोविधानों में बृहस्पति से स्पर्धा करते हैं । अतः आर्षज्ञानसम्पन्न महर्षि वाल्मीकि व्याकरण के आचार्य नहीं हो सकते, ऐसी कल्पना करना सर्वथा निर्मूल है । याकोबी आदि पाश्चात्य विद्वान् तो भारतीय संस्कारशून्य, आर्षज्ञान पर विश्वास न करनेवाले तथा दुरभिसन्धियुक्त हैं । वे वाल्मीकिरामायण की अर्वाचीनता और राम की अनीश्वरता सिद्ध करने में ही प्रयत्नशील रहते हैं । यद्यपि वेद, वेदान्त, मीमांसा, छन्द, अलङ्कार के आचार्यरूप में उनकी प्रशस्ति नहीं है, तो भी उनकी कृति ही उनके अगाध ज्ञान की गरिमा का परिचय दे रही है । रामायण के जिन अंशों में उनके महत्त्व का वर्णन है, दुर्भाग्यवश, उनको आधुनिक लोग क्षेपक सिद्ध करने में जुटे हुए हैं । उन्हीं लोगों ने बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त कहने का साहस किया है, जो सर्वथा उपेक्षणीय है । पुराणों की सामग्रियों से भी महर्षि के चरित्र में कोई विषमता नहीं सिद्ध होती है । एक प्रचण्ड दस्यु भी सत्सङ्ग से एक सुविज्ञ तपस्वी ही नहीं, किन्तु आर्षज्ञानसम्पन्न महर्षि भी हो ही सकता है— “सठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परस कुधातु सुहाई ।” (रा० मा० १।२।५) “वालमीकि नारद घटजोनी । निज निज मुखनि कही निज होनी ॥” (रा० मा० १।२।२) स्कन्दपुराण आदि अर्वाचीन सामग्री नहीं हैं और न ही उनका प्राचीन सामग्रियों के साथ कोई विरोध है । स्कन्दपुराण वैष्णव-खण्ड वैशाखमाहात्म्य के अनुसार एक व्याध ने शङ्ख नामक द्विज को बाँधकर उसके कुण्डल, छत्र, उपानद् आदि छीनकर छोड़ दिया । गरमी से शङ्ख के पैर जलते देख उसके मन में दया आयी, तो उसने अपना जीर्ण उपानद् उतार कर दे दिया । इसपर द्विज ने व्याध को आशीर्वाद दिया । शङ्ख ने उसे राम नाम का भी उपदेश दिया और आशीर्वाद में कहा कि तुम वाल्मीकि नाम से पृथ्वी पर विख्यात होगे । उसी सरोवर पर कृणु नाम का विप्र तप करता था । अधिक तप करने के कारण उसके ऊपर वल्मीक (दीमकों का बनाया मिट्टी का टीला) बन गया । लोग उसे वल्मीक कहते थे । किसी स्त्री के स्मरण से वीर्य-स्खलन हुआ । उसे किसी शैलूषी ने ग्रहण कर लिया । उसी से वाल्मीकि उत्पन्न हुए । दूसरी कथा आवन्त्यखण्ड के अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य में है । वहाँ वाल्मीकेश्वरमाहात्म्य का वर्णन है । सनत्कुमार के कथनानुसार भृगुवंशीय कोई सुमति नामक विप्र था । उसकी कौशिकी पत्नी से अग्निशर्मा उत्पन्न हुआ । वह वेदाध्ययन आदि से विमुख होकर दस्युओं में रहता था और दस्यु ही हो गया । एक बार तीर्थयात्रा के प्रसङ्ग से आये हुए सप्तर्षियों से उसका समागम हुआ । वह उनके भी छत्र, उपानद् आदि छीनने लगा । उन्होंने कहा, हम लोग

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ७५ तीर्थयात्रार्थ आये हैं, तुम यह पाप क्यों कमाते हो ? उसने कहा, माता-पिता, भार्या, पुत्र आदि के भरणपोषणार्थ मैं ऐसा करता हूँ । उन्होंने कहा—उनसे पूछ लो, वे सब क्या तुम्हारे पाप में भी भागीदार होंगे । जब उसने जाकर पूछा तो सभी ने कहा कि तुम जो करते हो उसका फल तुम्हें ही भोगना पड़ेगा । हम उसके भागी नहीं हैं । यह सुनकर अग्निशर्मा निर्विण्ण होकर सप्तर्षियों की शरण में आ गया । उनके आदेशानुसार अग्नि का ध्यान और महामन्त्र का जप करता हुआ अविचल हो गया । उसके ऊपर वल्मीक बन गया । जब तीर्थयात्रा से वे मुनि उसी मार्ग से लौटे तो उन्होंने वल्मीक में से ध्वनि सुनी, खनन किया तो अग्निशर्मा निकला । उसी ने कुशस्थली में जाकर महेश्वर की आराधना की । उससे सिद्धि-लाभ कर रामायण महाकाव्य का निर्माण किया । तीसरी कथा नागरखण्ड में है । मुखार नामक उत्तम तीर्थ है, जहाँ उन श्रेष्ठ मुनियों की चोर से भेंट हुई जिनके प्रभाव से उस चोर ने सिद्धि प्राप्त की और रामायणकर्ता वाल्मीकि नाम से प्रख्यात हुआ । पूर्वकाल में चमत्कारपुर में माण्डव्यवंशोद्भव लोहजङ्घ नामक माता-पिता का भक्त द्विज रहता था । परिस्थितिवश चोर हो गया । ऋषिगणों की सङ्गति से उसे वैराग्य हुआ । पुलह नामक हास्यशील ऋषि ने उसे जाटघोटा नामक सिद्धिप्रद मन्त्र प्रदान किया । उसीसे उसको सिद्धि प्राप्त हुई । कहा है— “मन्त्रे तीर्थे द्विजे दैवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ । यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी ॥” मन्त्र, तीर्थ, द्विज, दैवज्ञ, भेषज तथा गुरु में जिसका जैसा विश्वास होता है उसको वैसी सिद्धि मिलती है । चौथी कथा प्रभासखण्ड देविकामाहात्म्य के मूलस्थान-माहात्म्य में है । पार्वती के प्रश्न पर शङ्कर ने बताया कि प्राचीनकाल में शमीमुख नामक द्विज को वैशाख नामक पुत्र हुआ । उसे माता-पिता की सेवा के अतिरिक्त कोई इच्छा नहीं थी । वह मनुष्यों को लूट कर माता-पिता तथा पत्नी का पालन करता था । एक बार उसे मार्ग में तीर्थ- यात्रापरायण सप्तर्षि मिले । इस कथा में अङ्गिरा ऋषि से उसका वार्तालाप हुआ । उस तस्कर के माता-पिता ने कहा जब तुम बालक थे, असमर्थ थे, तब हम दोनों ने तुम्हारा लालन-पालन किया था । अब हमारी वृद्धावस्था में तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम हमारी देखभाल करो । हम तुम्हारे पापकर्म के फलभागी नहीं हैं । इससे उसे वैराग्य हुआ । ऋषि ने उसे मन्त्र जपने को कहा । तदनन्तर उस गुरभुक्त की देविका के शुभ तट पर समाधि लग गयी । सहस्र वर्ष बाद ऋषियों ने उसे वल्मीक से निकाला । इस कथा के अनुसार ब्राह्मणों ने वैशाख के सुप्त शरीर पर योगसम्भव भेषजों का मर्दन किया । ऋषियों के आशीर्वाद से वह वाल्मीकि महर्षि हुआ । उसकी जिह्वा पर स्वच्छन्द सरस्वती विचरण करने लगी और उसने रामायण की रचना की । अध्यात्मरामायण के अनुसार महर्षि वाल्मीकि ने अपने आश्रम में आये हुए श्रीराम का पूजन और स्तवन करके अपनी कथा सुनाई थी—मैं पहले किरातों में उत्पन्न होकर उन्हीं में पला और बड़ा हुआ । केवल जन्म से ही मैं द्विज था । शूद्रा के सम्पर्क से मेरे बहुत से पुत्र उत्पन्न हुए । मैं चोर हो गया । एक बार विराट् वन में मैंने सप्तर्षियों को देखा । मैं उनके वस्त्रादि लूटने के लिए उनके पीछे दौड़ा । मुनियों ने कहा—द्विजाधम, क्यों दुःखी हो रहा है । मैंने कहा—कुछ लेने के लिए, क्योंकि मेरे स्त्री-पुत्र आदि भूखे हैं । ऋषियों ने कहा—जाओ उनसे पूछ आओ कि वे तुम्हारे पापसञ्चय में भी भागी होंगे क्या ? मैंने जाकर उनसे पूछा तो उत्तर मिला कि पाप के भागी तुम्हीं होओगे। इसपर मुझे निर्वेद हुआ । मुनियों के दर्शन से मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया था । मुनियों ने कहा— भद्र ! उठो, तुम्हारा सत्समागम सफल हो गया । तुम 'मरा' शब्द को तब तक जपो जब तक हम पुनः यहाँ न आ जायें । मैंने वैसा ही किया । मैं बाह्य जगत् भूल गया । निश्चलरूप से खड़ा रहने के कारण मुझपर वल्मीक हो गया ।

सहस्रों युगों के बाद ऋषि पुनः आये ओर मुझसे बोले--बाहर निकलो । मैं नीहार से भास्कर की भाँति वल्मीक से बाहर निकला । मुनियों ने कहा--अब तुम वाल्मीकि मुनीश्वर हो गये हो । यह कह कर वे दिव्यगति ऋषि चले गये । हे राघव ! यह सब आपके नाम का प्रभाव है । तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार देवों के साथ भास्कर और विष्णु उन्हें रामायणकार होने का आशीर्वाद देते हैं । शेष कथा अध्यात्मरामायण के तुल्य ही है । आनन्दरामायण के अनुसार स्तम्भ नामक श्रीवत्सगोत्री ब्राह्मण महापापी तथा शूद्राचरणरत था । वह वेश्यारत भी था । किसी दिन उसके यहाँ एक ब्राह्मण का सत्कार हुआ । उसी से उसका उद्धार हुआ । वह जन्मान्तर में व्याध हुआ । उसने पम्पातीर पर शङ्ख का सब कुछ छीन लिया । शेष कथा स्कन्दपुराण की प्रथम कथा जैसी ही है । कृत्तिवासीय रामायण में उस व्याध का नाम रत्नाकर तथा उसके पिता का नाम च्यवन था । यहाँ सप्तर्षियों के स्थान पर उसे ब्रह्मा और नारद मिलते हैं । ब्रह्मा के आदेशानुसार वह नदी में स्नान के लिए जाता है । उसके देखनेमात्र से नदी सूख जाती है । ब्रह्मा उसे राम नाम का उपदेश करते हैं । किन्तु वह उसका उच्चारण न कर सकने के कारण 'मरा' नाम जपता है । मत्स्यपुराण तथा पद्मपुराण में इक्ष्वाकुवंशीय नृपतियों के प्रसङ्ग में जहाँ रामचरित वर्णित है, वहाँ कहा गया है कि भार्गवश्रेष्ठ वाल्मीकि ने रामचरित को निबद्ध किया है । विष्णुपुराण के अनुसार भृगुवंशी ऋक्ष व्यास हुए हैं जो वाल्मीकि कहलाते हैं । वायुपुराण के अनुसार माहेश्वरावतारयोगवर्णन के अन्तर्गत ऋक्ष के विषय में उल्लेख है कि वह चौबीसवें द्वापर में व्यास बनेगा । कूर्मपुराण के अनुसार तेईसवें व्यास तृणबिन्दु के पश्चात् वाल्मीकि का वर्णन है । महाभारत में वाल्मीकि का परिचय बहुलता से मिलता है । आदिपर्व में आस्तीक जनमेजय की प्रशंसा करते हुए कहता है—राजन् ! तुम वाल्मीकि के समान गम्भीर एवं धैर्यशाली हो, वसिष्ठ के समान जितक्रोध हो, इन्द्र के समान ऐश्वर्यशाली हो एवं कान्ति में नारायण के तुल्य हो । सभापर्व में शत्रु की दिव्य सभा का वर्णन करते हुए वहाँ उपस्थित जिन व्यक्तियों का नामोल्लेख है उनमें एक नाम वाल्मीकि का भी है । आरण्यकपर्व में जो ऋषि प्रतीक्षा कर रहे थे उनमें वाल्मीकि ऋषि का नाम प्रथम आता है । ( १ ) “वाल्मीकिर्यस्य चरितं चक्रे भार्गवसत्तमः ।।” (पद्मपु० ५।८।१५५; मत्स्यपु० १२।५१ ) ( २ ) “ऋक्षोऽभूद् भार्गवस्तस्माद् वाल्मीकिर्योऽभिधीयते ।।” (वि० पु० ३।३।१८) ( ३ ) “परिवर्त्ते चतुर्विंशे ऋक्षो व्यासो भविष्यति ।।” (वायुपु० ३३।१६४) ( ४ ) “तृणबिन्दुस्त्रयोविंशे वाल्मीकिस्तु ततः परम् ।” (कूर्मपु० ) ( ५ ) “वाल्मीकिवत्ते निभृतं स्ववीर्यं वसिष्ठवत्ते नियतश्च कोपः । प्रभुत्वमिन्द्रेण समं मतं मे द्युतिश्च नारायणवद् विभाति ।।” ( म० भा० १।५५।१४ ) ( ६ ) “सहदेवः सुनीथश्च वाल्मीकिश्च महातपाः । समीकः सत्यवाक् चैव प्रचेताः सत्यसंगरः ।।” (म० भा० २।७।१६ ) ( ७ ) “ऋषिमुख्याः सदा यत्र वाल्मीकिस्त्वथ काश्यपः । आत्रेयः कुण्डजठरो विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥ एते ऋषिवराः सर्वे त्वत्प्रतीक्षास्तपोधनाः ।” ( म० भा० ३।८५।११९-१२२

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ७७ इसी तरह उद्योगपर्व के भगवद्यानपर्व में कौरवों के सदन जाने से पूर्व जिन महर्षियों ने कृष्ण की पूजा की थी उनमें भी वाल्मीकि का नाम है— "वसिष्ठो वामदेवश्च भूरिद्युम्नो गयः क्रथः । शुक्रनारदवाल्मीका मरुतः कुशिको भृगुः ।। एवमेतैर्महाभागैर्महर्षिगणसार्थिभिः । पूजितः प्रययौ कृष्णः कुरूणां सदनं प्रति ।।" ( म० भा० ५।८३।२७-२९ ) द्रोणपर्व के अन्तर्गत जयद्रथवधपर्व में वाल्मीकि का श्लोक भी उद्धृत है । “अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि । पीडाकरममित्राणां यत् स्यात् कर्तव्यमेव तत् ॥” ( म० भा० ७।१४३।६८ ) शान्तिपर्व के राजधर्मपर्व में कहा गया है--हे भारत ! रामचरित वर्णन में महात्मा भार्गव ने यह श्लोक कहा है । पहले राजा को प्राप्त करना चाहिये और फिर भार्या और फिर धन को प्राप्त करना चाहिये । क्योंकि राजा के न होने पर भार्या और धन कैसे रह सकेंगे ? "श्लोकश्चायं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना । आख्याते रामचरिते नृपति प्रति भारत ।। राजानं प्रथमं विन्देत्ततो भार्यां ततो धनम् । राजन्यसति लोकस्य कुतो भार्या कुतो धनम् ।।” ( म० भा० १२।५७।४०-४१ ) इसी शान्तिपर्व में युधिष्ठिर के प्रश्न पर भीष्म ने कहा है— असित, देवल, महातपा वाल्मीकि और मार्कण्डेय नारायण का अद्भुत वृत्तान्त कहते हैं : “असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः । मार्कण्डेयश्च गोविन्दे कथयन्त्यद्भुतं महत् ।।” ( म० भा० १२।२०७।४ ) कुछ लोग कहते हैं कि "स्कन्दपुराण तथा अध्यात्मरामायण जैसी अर्वाचीन कृतियों में वाल्मीकि की जो कथाएँ मिलती हैं, जिनमें उन्हें दस्यु बताया गया है; उनका मत्स्यपुराण, वायुपुराण, विष्णुपुराण, महाभारत आदि में संकेत भी नहीं है। रामायण एवं प्राचीन पुराण तथा भारत उनके पूर्वजीवन के सम्बन्ध में मौन हैं। उसके अनुसार वाल्मीकि के सम्बन्ध में इस प्रकार की कथा रचने के दो कारण हैं— १. वाल्मीकि नाम की व्युत्पत्ति अपेक्षित थी । पुराणकार किसी व्यक्ति का नाम समझाने के लिए कथा गढ़ लेते थे । जैसे जनक-पुत्री सीता के नाम को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने वैदिक सीता ( हलकृष्ट भूमि ) से सम्बन्ध जोड़कर उसका जन्म ही भूमि से करा दिया । यही बात इक्ष्वाकु, भरद्वाज, सगर आदि के बारे में भी है । इसी तरह वाल्मीकि का अभिधान समझाने के लिए भी किया गया । २. किसी महापुरुष के जीवन का लोगों पर पूर्णरूप से प्रभाव डालने की प्रवृत्ति पुराणों की रही । उसे अधिक कौतूहलपूर्ण और प्रभावशाली बनाने के लिए यह भी परिपाटी थी कि जो जिस बात के लिए प्रसिद्ध था, प्रारम्भ में उसको विपरीत बताया जाता था । सम्राट् अशोक भारत के इतिहास में धर्मात्मा तथा दयालु नरेश के रूप में विख्यात रहा है । इसी कारण उसे प्रारम्भिक जीवन में क्रूर या निर्दय चित्रित किया गया है । कालिदास

रामायणमीमांसा तृतीय

संस्कृत-साहित्य के विद्वान् कवि हो चुके हैं, बाल्यावस्था में उन्हें मूर्ख बताया गया है, क्योंकि विद्वान् का विपरीत मूर्ख ही होता है। तुलसीदास तथा सूरदास त्यागी, तपस्वी एवं महान् ग्रन्थों के प्रणेता थे। उन्हें पूर्वजीवन में विलासी बताया गया है। ऐसे ही ऋषि वाल्मीकि को भी प्रारम्भ में दस्यु माना गया है, क्योंकि ऋषि का वैपरीत्य दस्यु ही हो सकता है। राजाओं की परम्परा का भाट-चारणों को स्मरण रखना पड़ता था, परन्तु ऋषियों के निमित्त ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। जो ख्यातिप्राप्त होते हैं उन्हीं का नाम सुरक्षित रहता है।” यद्यपि उक्त बातें आपातरमणीय हैं; किन्तु प्रमाण-शून्य तथा वेद, पुराण, भारत आदि शास्त्रों से सर्वथा विरुद्ध हैं। वस्तुतः अतीत घटनाओं के सम्बन्ध में प्रामाणिक इतिहास ही प्रमाण होता है। अटकलबाजी से तो विपरीत दिशा में भी पहुँचा जा सकता है। भारतीय साहित्य में वेद, पुराण, महाभारत, रामायण आदि का धर्म, ब्रह्म तथा परम्परा, सदाचार आदि के सम्बन्ध में परम प्रामाण्य है। आधुनिक इतिहास में भ्रान्ति भी हो सकती है, परन्तु वाल्मीकि, वसिष्ठ, पराशर, व्यास आदि ऋषियों के द्वारा निर्मित ग्रन्थों में अप्रामाण्य की कल्पना ही निराधार है। प्रत्यक्षादि सभी प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः होता है। यदि प्रमाणों का प्रामाण्य परतः होगा तब तो उस प्रमाण का भी प्रामाण्य परतः होगा, ऐसी स्थिति में अनवस्था दोष होगा। यदि अन्त में किसी प्रमाण का स्वतःप्रामाण्य मानना ही है तो प्रथम का ही स्वतःप्रामाण्य क्यों न मान लिया जाय ? अप्रामाण्य परतः विषयबाध या कारण-दोष- ज्ञान से होता है। जैसे चक्षुरूप कारण में पित्त-दोष के ज्ञान से “पीतः शङ्खः” इस ज्ञान का अप्रामाण्य निश्चित होता है। “नेदं रजतम्” इस बाध-ज्ञान से “इदं रजतम्” इस ज्ञान का अप्रामाण्य निश्चित होता है। जिसमें उक्त अप्रामाण्य का कारण नहीं हो उसका प्रामाण्य स्वतः ही होता है। यही स्थिति अनुमान तथा आगमों के सम्बन्ध में भी है। वाक्यों में अर्थबोधकता स्वाभाविक होती है। वक्ता के भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव आदि दोषों के ज्ञान तथा विषयबाध से यहाँ भी अप्रामाण्य होता है। वेद अनादि और अपौरुषेय हैं। पुरुषनिर्मित न होने से उनमें पुरुषाश्रित भ्रम, प्रमाद आदि दूषणों से दूषित होने की सम्भावना ही नहीं है। उनका विषय अलौकिक होने से लौकिक प्रमाणों के द्वारा उनके विषय में बाध-ज्ञान भी सम्भव नहीं है; अतः वे स्वतःप्रमाण हैं। पौरुषेय रामायण, महाभारत, पुराण आदि में भी इतर प्रमाणों के समान प्रामाण्य स्वतः है। पौरुषेय होनेसे पुरुषाश्रित दोषों से दूषित होने की सम्भावना से अप्रामाण्य प्रसक्त होने पर उनके निर्माताओं के आप्तत्व और उनमें श्रुति-मूलकत्व का ज्ञान होने से अप्रामाण्य निरस्त हो जाता है। स्वतःप्रामाण्य ही स्थिर रह जाता है। जहाँ प्रत्यक्ष में श्रुतिमूलत्व उपलब्ध नहीं होता है वहाँ मूलभूत श्रुति का अनुमान किया जाता है। अनुमानप्रकार निम्नोक्त है— “इयं स्मृतिः श्रुतिमूलिका, स्मृतित्वाद्, मन्वादिस्मृतिवत् ।” विवादास्पद स्मृति भी श्रुतिमूलिका है, स्मृति होने से, मन्वादि स्मृति के समान। इस दृष्टि से सर्वज्ञकल्प, आप्त, आर्षविज्ञानसम्पन्न, श्रुतिनिष्ठ वाल्मीकि, व्यास आदि महर्षियों की कृतियों में भ्रम, प्रमाद आदि की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जहाँ पौरुषेय स्मृत्यादि वचनों के विरुद्ध कोई श्रुति-वचन मिलता है वहाँ श्रुतिविरुद्ध स्मृति वचनों का प्रत्यक्ष श्रुतिवचनों के अविरुद्ध ही अर्थ लगाना उचित है। यह सब बात “विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्” जै० सू० में स्पष्ट है। इसी लिए “औदुम्बरीं स्पृष्ट्वा उद्गायति” इस श्रुति के विरुद्ध होने से ही “औदुम्बरी सर्वां वेष्टयितव्या” यह कल्पसूत्र-वचन बाधित हो जाता है। स्कन्दपुराण भी व्यास निर्मित पुराण है। उसे अर्वाचीन मानना निराधार है। स्कन्दपुराण अष्टादश पुराणों में एक है। श्रीमद्भागवत आदि अन्य पुराणों में उसका उल्लेख है। साथ ही आनन्दरामायणादि प्रोक्त वाल्मीकि-कथा का मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, महाभारत आदि के वचनों से कोई विरोध भी नहीं है !

आप भी मानते हैं कि “महाभारत एवं मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण आदि उनके पूर्व जीवन के सम्बन्ध में मौन हैं ।” भारतीय साहित्य में सद्ग्रन्थों का समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है । मिताक्षरा, व्यवहारमयूख, पराशरमाधव, हेमाद्रि आदि निबन्धों की यही पद्धति है । पूर्वमीमांसा तथा उत्तरमीमांसा का भी यही दृष्टिकोण है । आधुनिक संविधानों ( Constitutions ) में विभिन्न धाराएँ टकराती हैं तो उनका समन्वय करना पड़ता है । सामान्य, विशेष या उत्सर्ग, अपवाद को ध्यान में रख कर ही बाध्य-बाधक भाव भी मानना पड़ता है । जिस विषय में महाभारत, वायुपुराण, विष्णुपुराण आदि मौन हैं उसके सम्बन्ध में स्कन्दपुराणादि की बात मानने में कोई दोष नहीं है । जो कालान्तर में दस्यु होता है वही कालान्तर में महर्षि भी हो सकता है । इससे यही सिद्ध होता है कि आत्मा स्वतः सच्चिदानन्दरूप है । देह, इन्द्रिय आदि उपाधियों के अनियन्त्रित होने से अशुद्ध-सा हो जाता है । उनके नियन्त्रण से शुद्ध हो जाता है। अतः किसी को निराश नहीं होना चाहिये । सच्छास्त्र के अभ्यास और सत्पुरुष के संग से पूर्ण उन्नति हो सकती है । स्कन्दपुराण आदि की कथाओं में भी विरोध नहीं है । तत् तत् तीर्थों तथा वैशाख मास आदि काल और पर्वों के माहात्म्य-वर्णन के प्रसङ्ग में कुछ भेद वर्णन असङ्गत नहीं है । व्यवहार में एक पुरुष आत्मकल्याणार्थ अनेक जन्मों में अनेक प्रकार के व्रत, जप, तप, तीर्थयात्रा आदि करता ही है । स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्ड के वैशाख-माहात्म्य में एक व्याध के वृत्तान्त में रामनाम-जप के फलस्वरूप तथा वरदान के अनुसार वह व्याध वल्मीक नामक ऋषि से उत्पन्न होकर वाल्मीकि बन कर यशस्वी होता है । कृणु नामक तपस्वी के शरीर के चारों ओर वल्मीक ( दीमकों द्वारा एकत्रित मिट्टी का अम्बार ) बन जाने से उसका वल्मीक नाम पड़ा था । व्याध उसी के पुत्ररूप में प्रकट होकर वाल्मीकि महर्षि बनकर आदि काव्य रामायण का रचयिता हुआ है । पुराणान्तरों के साथ एकवाक्यता कर उसी वल्मीक को भृगुवंशीय तथा प्रचेता ( वरुण ) का अवतार भी माना जा सकता है । स्कन्दपुराण के अवन्तीखण्ड के अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य (अ० २४) में अग्निशर्मा डाकू सप्तर्षियों को मार कर उनके वस्त्र आदि छीनने को उद्यत हुआ । ऋषियों ने परिवार से यह पूछने के लिये उसे घर भेजा कि क्या तुम लोग मेरे पापों के भी फलभागी होने को तैयार हो । परिवार के लोगों के अस्वीकार करने पर अग्निशर्मा को निर्वेद हुआ और ऋषियों के उपदेशानुसार वह ध्यान तथा जप करने लगा । उसके चारों ओर वल्मीक हो गया । बारह वर्ष के बाद ऋषियों ने उसे निकाला, उसका वाल्मीकि नाम रखा और रामायण-निर्माण का आदेश दिया । इस कथा को भी उसके साथ मिलाने से यह समझना चाहिए कि कृणु के पुत्र का नाम अग्निशर्मा था और वह दुःसङ्ग से डाकू हो गया था । वही ऋषियों के सम्पर्क से तपस्या एवं ध्यान में मग्न होने पर वल्मीक से प्रावृत्त होकर वाल्मीकि हुआ । नागरखण्ड के लोहजङ्घ की कथा के साथ भी एकवाक्यता कर देने से कृणु-पुत्र का ही लोहजङ्घ भी नाम रहा होगा । शेष कथा पूर्ववत् ही है । प्रभासखण्डीय कथा के अनुसार कृणु का ही नाम शमीमुख भी रहा होगा । उसके पुत्र अग्निशर्मा का वैशाख नाम भी रहा होगा । अध्यात्मरामायण की कथा भी पूर्वोक्त कथाओं से समन्वित हो सकती । वही किरातों की संगति से जन्मना ब्राह्मण होने पर भी किरातप्राय होकर डाकू हो गया था । मुख्य कथा समान होने पर किञ्चित् परिवर्तन अकिञ्चित्कर है । व्यास के समान ही विभिन्न कल्पों में वाल्मीकि भी विभिन्न होते हैं, अतः कल्पभेद से भी कुछ कथाभेद संभव है ।

८० रामायणमीमांसा तृतीय अश्वघोष के अनुसार च्यवन महर्षि वाल्मीकि के पूर्वज थे। च्यवन भृगुवंशीय थे, अतः वाल्मीकि का भी भार्गव होना स्वाभाविक है । 'वाल्मीकि शब्द की व्युत्पत्ति के लिये वाल्मीकि के पूर्व जीवन की कथा की कल्पना की गयी है', श्रीबुल्के का यह कहना सर्वथा असङ्गत है; क्योंकि सत्यनिष्ठ पुराणकार महर्षि मिथ्याभाषण से सदा ही घृणा करते थे । भरद्वाज, सगर आदि संज्ञाएँ भी अन्वर्थ ही थीं । पुराणोक्त आख्यायिकाओं को कल्पनामात्र कहना आतप्रामाण्य को ठुकराना है । 'कठेन प्रोक्तं काठकम्' आदि समाख्याएँ जैसे अन्वर्थ हैं, वैसे ही 'वाल्मीकि' आदि समाख्याओं को भी समझना चाहिए । जहाँ वास्तविकता नहीं होती वहाँ आख्यायिका भी नहीं होती । किसी वृक्ष की अश्वकर्ण समाख्या हो तो वह अन्वर्थ नहीं, क्योंकि वृक्ष से अश्व के कान का कोई सम्बन्ध नहीं है । वेद, पुराण आदि की आख्यायिकाओं के सम्बन्ध में यह नियम है कि यदि आख्यायिका किसी ऐसे अर्थ का प्रतिपादन करती हो जो प्रमाणान्तर से विरुद्ध है तो वह गुणवादिनी आख्यायिका अपने मुख्य अर्थ का प्रतिपादन न कर गौण अर्थ का ही प्रतिपादन करती है । जैसे—"आदित्यो यूपः" यह वचन आदित्य एवं यूप का अभेद बोधित करता है, पर वह प्रत्यक्ष से विरुद्ध है; अतः आदित्यसदृश यूप है यह गौण अर्थ ही उसका अर्थ समझना चाहिए । यदि आख्यायिका प्रमाणान्तरसिद्ध अर्थ को बोधित करती है—जैसे 'अग्निर्हिमस्य भेषजम्' (मा० सं० २३।१०) अग्नि जाड़े की ओषधि है, यह बात प्रत्यक्षसिद्ध ही है, तो यह वाक्य केवल अनुवादक है उसका स्वार्थ में प्रामाण्य नहीं है । परन्तु जो आख्यायिका या वाक्य प्रमाणान्तर से असिद्ध एवं अविरुद्ध अर्थ का बोधक होता है, उसका महातात्पर्य स्तुत्यादि में होने पर भी अवान्तरतात्पर्यगोचर स्वार्थ में भी प्रामाण्य होता है । इस दृष्टि से वाल्मीकि के पूर्वजीवनवृत्तान्त से किसी प्रमाण का विरोध नहीं है; क्योंकि उस सम्बन्ध में वे मौन हैं । प्रमाणान्तरों से उसकी सिद्धि भी नहीं है, अतः प्रमाणान्तरासिद्ध एवं प्रमाणान्तराविरुद्ध अर्थ में इन आख्यानों का प्रामाण्य सर्वथा मान्य है । अतएव मिथ्या आख्यान के द्वारा किसी नाम की व्युत्पत्ति प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती । भरद्वाज, सगर आदि नामों से सम्बन्धित आख्यािकाएँ भी मिथ्या नहीं हैं । लोक तथा वेद में ऐसी कोई व्युत्पत्ति नहीं है, जो मिथ्या कथा पर आधारित हो, प्रत्युत निरुक्त आदि में इन्द्र, अग्नि आदि नामों की अन्वर्थ ही व्युत्पत्तियाँ कही गयी हैं । बृहदारण्यक में प्राण का 'दूर्नाम' कहा गया है । उसका यथार्थ में ही यह अर्थ है कि आसङ्गरूप पाप्मा उससे दूर रहता है— सा वा एषा देवता दूर्नाम दूरं ह्यस्मान्मृत्युर्द्दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति य एवं वेद" (बृ० उ० १।३।९) सीता का नाम भी अन्वर्थ ही है । कृषि की अधिष्ठात्री देवी का अवतार होने तथा हलाग्र से प्रकट होने के कारण ही जनक-पुत्री का सीता नाम हुआ । वाल्मीकि का पूर्व जीवन दस्युजीवन होने पर भी जप, तप आदि से जो उनका पुनर्जीवन हुआ था उस नव जीवन के ही सम्बन्ध में वे कहते हैं कि मन, वचन तथा कर्म से कोई भी किल्बिष मैंने नहीं किया— "मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्वं न किल्बिषम् ॥” (वा० रा० ७।९६।२०) इसी तरह 'कौतूहल और प्रभावशाली बनाने के लिये वाल्मीकि के प्रसिद्ध ऋषिजिवन के विपरीत प्रारम्भिक दस्युजीवन बतलाया गया है' यह कथन भी सङ्गत नहीं हैं, क्योंकि मिथ्या-वर्णन से ऋषि का महत्त्व घट जाता है, बढ़ता नहीं । सूर और तुलसी के पूर्व जीवन का वर्णन भी यदि मिथ्या वर्णन है तो उससे उनमें प्रभाव