भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 143

६६ रामायणमीमांसा तृतीय मानस होकर मुनियों ने कहा-उठो, उठो, सन्तसमागम सफल हो गया । उन लोगों ने परस्पर विचार किया कि यद्यपि यह व्याध बड़ा ही दुर्वृत्त है, उपेक्ष्य ही है, तथापि शरणागत हुआ है; अतः इसकी रक्षा करनी चाहिये । तब उन्होंने कहा- जब हम लोग लौट कर आयें तब तक तुम यहीं 'मरा मरा' मन्त्र जपते रहो- “इत्युक्त्वा राम ते नाम व्यत्यस्ताक्षरपूर्वकम् । एकाग्रमनसा चैव मरेति जप सर्वदा ॥” आपके राम-नाम का व्यत्यस्त (उलटा) 'मरा' नाम जपने को उन्होंने कहा । यह कहकर मुनि लोग चले गये । मैं उनके कहने के अनुसार एकाग्र मन से जप करते करते बाह्य प्रपञ्च भूल गया। इस तरह बहुत काल तक सङ्गहीन एवं निश्चल होकर रहने के कारण मेरे ऊपर वल्मीक हो गया । युग- सहस्र के अन्त में ऋषि लोगों ने पुनः आकर मुझसे उस वल्मीक से निकलने के लिए कहा । फिर नीहार के बीच से निकलते हुए भास्कर के तुल्य उस वल्मीक से मैं निकला । जब मैं निकला तब मुनियों ने कहा- अब तुम मुनीश्वर वाल्मीकि हो गये हो । अब यह तुम्हारा दूसरा जन्म है । हे श्रीराम ! मैं आपके मन्त्र-जप के प्रभाव से ऐसा हो गया । इसी कथा के साथ वाल्मीकिसम्बन्धी सब कथाओं की सङ्गति लग जाती है । इस रामायण में भी वाल्मीकि ने अपने को प्रचेता का दसवां पुत्र कहा है - “सुतो तवैव दुर्धर्षों तथ्यमेतत् ब्रवीमि ते । प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो रघुकुलोद्वह !॥” (वा० रा० ७।९६।१७,१८) इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि पहले वे प्रचेता के दशम पुत्र थे । पश्चात् किसी शापवशात् पापयुक्त हो गये । वाल्मीकि-युधिष्ठिर-संवाद से शाप का भी आभास मिलता ही है । अनन्तर वे किसी भृगुवंशीय ब्राह्मण के यहाँ उत्पन्न हुए । वहाँ दस्युओं के संसर्ग से दस्यु आदि होकर मुनि-समागम के प्रभाव से क्रमेण वाल्मीकि महर्षि हुए । इस अन्तिम जन्म में वे अत्यन्त निष्पाप हो गये । उन्होंने मन से भी कभी मिथ्याभाषण नहीं किया और महती तपश्चर्या की । इसी अभिप्राय का वर्णन गोस्वामीजी ने किया है - "ऊलटा नाम जपत जग जाना। वाल्मीकि भये ब्रह्मसमाना ॥" (चतुष्पदी १८४) आनन्दरामायण का भी इसी के साथ समन्वय हो जाता है । तत्त्वसारसंग्रह की चमत्कार कथाएँ भी विरुद्ध नहीं हैं। कृत्तिवासीय रामायण में वाल्मीकि को च्यवन का पुत्र कहा गया है । सन्तान-परम्परा में होनेवाले को भी पुत्र कहा जाता है । इसी दृष्टि से, च्यवन का भार्गव-वंश में जन्म होने से, वाल्मीकि च्यवन के पुत्र कहे गये । श्वपच वाल्मीकि कोई अन्य हुए ही नहीं । विष्णुधर्मोत्तर के मूर्ति-निर्माण के प्रसङ्ग में वर्णित वाल्मीकि रामायणकार ही हैं । तपोनिष्ठ तथा शान्त वाल्मीकि का रूप गौर वर्ण बनाना चाहिये । उनका आकार जटा-मण्डल से आच्छन्न होना चाहिये और वह न कृश होना चाहिये और न स्थूल ही होना चाहिये-