रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६७ “गौरस्तु कार्यो वाल्मीकिर्जटामण्डलदुर्दृशः । तपस्यभिरतः शान्तो न कृशो न च पीवरः ।।” ( विष्णुध० पु० ३।८५ ) जैसे सीताराम के गुणग्रामरूपी पुण्यारण्य में विहार करनेवाले कपीश्वर की पूजा होती है वैसे ही विशुद्ध विज्ञानवाले कवीश्वर वाल्मीकि की भी पूजा उचित ही है। मन्त्ररामायण के प्रसङ्ग में वाल्मीकि को ब्रह्मा का अंश कहा गया है। ब्रह्मा और विष्णु का अभेद होने से विष्णुरूपता भी उनमें अनुपपन्न नहीं है। विष्णुधर्मोत्तरपुराण ( ७४।३८ ) के अनुसार उनका विष्णु का अंश होना भी ठीक ही है। विष्णुधर्मोत्तर को पाँचवीं शती की रचना कहना भी निष्प्रमाण ही है। पौर्वापर्य-विरोध का समाधान वाल्मीकि की कथाओं का कल्पभेद से भी समाधान होता है, क्योंकि भिन्न-भिन्न कल्प के देवों और ऋषियों के सुकृत भिन्न भिन्न होने से उनकी उत्पत्ति एवं कर्मों में भेद हो सकता है। शौनकादि मुनियों ने सूत से प्रश्न किया था—पुराणों में कहीं कहीं पौर्वापर्य-विरोध प्रतीत होता है। कहीं क्षेत्रभेद है तो कहीं भक्तोद्धार की विधि में भेद है, कहीं ब्रह्मा की सृष्टि में ही भेद दिखायी देता है। तीर्थों की उत्पत्ति में भी भेद है। विभिन्न पुराणों में भिन्न भिन्न कथाएँ भी मिलती हैं। पुराणों के आप ही वक्ता हैं। आप बताने की कृपा करें कि इन भेदों का कारण क्या है ? ( काशीकेदारमाहात्म्य २७।७५।७२ ) सूतजी ने इन प्रश्नों का निम्नोक्त उत्तर दिया—विभिन्न कल्पों में भगवान् शिव की विचित्र विभिन्न लीलाएँ होती हैं। ब्रह्मादि स्थावरान्त प्राणियों के विभिन्न कर्मों के अनुसार कर्म-फल भी विभिन्न होते हैं; अतः पुराणों की कथाओं में भी भेद आ जाता है। शास्त्र सब सत्य हैं। उनमें कृतियों का भेद है, परन्तु तात्पर्य सभी का शिवभक्ति में ही है। शिवजी की अतुलित महिमा सर्वत्र एकरूप है। यही मेरे गुरुदेव व्यासदेव ने कहा है ! जो लोग भक्तिबोधक शिवधामदायिनी विचित्र कथाओं का सार जानते हैं, वे अवश्य ही शिव को प्राप्त होते हैं— “कल्पे कल्पे क्षपासु क्षणिकमभिमता दिव्यलीला विचित्राः । या याः पूर्वं बभूवुः श्रवणसुखकरास्ताः पुनस्त्वन्यकल्पे ।। ब्रह्माद्याः स्थावरान्ताः स्वकृतसुकृतसत्कर्मपाकेन भिन्नाः । पौराण्येस्ताः कथाश्च पृथगिव प्रतिभान्त्यर्थतस्तास्त्वभिन्नाः ।। सर्वं सत्यं च शास्त्रं विविधकृतिभिदा भेदितञ्चापि शम्भोः । तात्पर्यं चैकरूपं विमलसुमतिभिर्ग्राह्यमाद्यन्तदृष्ट्या ।। यावद् वेदेन जातोऽप्यतुलितमहिमा चैकरूपः प्रणेतुः । तत्सारं ग्राह्यमीशे विनिहितमतिभिः प्राह चैवं गुरुर्माम् ।।” —काशीकेदारमाहात्म्य महाभारत और रामायण भारतीय शास्त्रों एवं परम्पराओं से अपरिचित पाश्चात्यों का अन्धानुकरण करते हुए बुल्के साहब भी भारत और महाभारत में आदिरामायण और प्रचलित रामायण के समान भेद मानते हैं। वे भारत और महाभारत का मध्यकाल ही रामायण का काल मानते हैं, पर यह अत्यन्त असंगत है। पाश्चात्यों को यह विश्वास ही नहीं होता कि लाखों वर्ष पहले भी वैदिक सभ्यता थी। ईसाई-भावनाओंसे अभिभूत पाश्चात्य विद्वान् एवं उनके अनुयायी कुछ भारतीय भी अनादि और अनन्त 'वेदों' को भी ईसा से कुछ सहस्र वर्ष