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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६७ “गौरस्तु कार्यो वाल्मीकिर्जटामण्डलदुर्दृशः । तपस्यभिरतः शान्तो न कृशो न च पीवरः ।।” ( विष्णुध० पु० ३।८५ ) जैसे सीताराम के गुणग्रामरूपी पुण्यारण्य में विहार करनेवाले कपीश्वर की पूजा होती है वैसे ही विशुद्ध विज्ञानवाले कवीश्वर वाल्मीकि की भी पूजा उचित ही है। मन्त्ररामायण के प्रसङ्ग में वाल्मीकि को ब्रह्मा का अंश कहा गया है। ब्रह्मा और विष्णु का अभेद होने से विष्णुरूपता भी उनमें अनुपपन्न नहीं है। विष्णुधर्मोत्तरपुराण ( ७४।३८ ) के अनुसार उनका विष्णु का अंश होना भी ठीक ही है। विष्णुधर्मोत्तर को पाँचवीं शती की रचना कहना भी निष्प्रमाण ही है। पौर्वापर्य-विरोध का समाधान वाल्मीकि की कथाओं का कल्पभेद से भी समाधान होता है, क्योंकि भिन्न-भिन्न कल्प के देवों और ऋषियों के सुकृत भिन्न भिन्न होने से उनकी उत्पत्ति एवं कर्मों में भेद हो सकता है। शौनकादि मुनियों ने सूत से प्रश्न किया था—पुराणों में कहीं कहीं पौर्वापर्य-विरोध प्रतीत होता है। कहीं क्षेत्रभेद है तो कहीं भक्तोद्धार की विधि में भेद है, कहीं ब्रह्मा की सृष्टि में ही भेद दिखायी देता है। तीर्थों की उत्पत्ति में भी भेद है। विभिन्न पुराणों में भिन्न भिन्न कथाएँ भी मिलती हैं। पुराणों के आप ही वक्ता हैं। आप बताने की कृपा करें कि इन भेदों का कारण क्या है ? ( काशीकेदारमाहात्म्य २७।७५।७२ ) सूतजी ने इन प्रश्नों का निम्नोक्त उत्तर दिया—विभिन्न कल्पों में भगवान् शिव की विचित्र विभिन्न लीलाएँ होती हैं। ब्रह्मादि स्थावरान्त प्राणियों के विभिन्न कर्मों के अनुसार कर्म-फल भी विभिन्न होते हैं; अतः पुराणों की कथाओं में भी भेद आ जाता है। शास्त्र सब सत्य हैं। उनमें कृतियों का भेद है, परन्तु तात्पर्य सभी का शिवभक्ति में ही है। शिवजी की अतुलित महिमा सर्वत्र एकरूप है। यही मेरे गुरुदेव व्यासदेव ने कहा है ! जो लोग भक्तिबोधक शिवधामदायिनी विचित्र कथाओं का सार जानते हैं, वे अवश्य ही शिव को प्राप्त होते हैं— “कल्पे कल्पे क्षपासु क्षणिकमभिमता दिव्यलीला विचित्राः । या याः पूर्वं बभूवुः श्रवणसुखकरास्ताः पुनस्त्वन्यकल्पे ।। ब्रह्माद्याः स्थावरान्ताः स्वकृतसुकृतसत्कर्मपाकेन भिन्नाः । पौराण्येस्ताः कथाश्च पृथगिव प्रतिभान्त्यर्थतस्तास्त्वभिन्नाः ।। सर्वं सत्यं च शास्त्रं विविधकृतिभिदा भेदितञ्चापि शम्भोः । तात्पर्यं चैकरूपं विमलसुमतिभिर्ग्राह्यमाद्यन्तदृष्ट्या ।। यावद् वेदेन जातोऽप्यतुलितमहिमा चैकरूपः प्रणेतुः । तत्सारं ग्राह्यमीशे विनिहितमतिभिः प्राह चैवं गुरुर्माम् ।।” —काशीकेदारमाहात्म्य महाभारत और रामायण भारतीय शास्त्रों एवं परम्पराओं से अपरिचित पाश्चात्यों का अन्धानुकरण करते हुए बुल्के साहब भी भारत और महाभारत में आदिरामायण और प्रचलित रामायण के समान भेद मानते हैं। वे भारत और महाभारत का मध्यकाल ही रामायण का काल मानते हैं, पर यह अत्यन्त असंगत है। पाश्चात्यों को यह विश्वास ही नहीं होता कि लाखों वर्ष पहले भी वैदिक सभ्यता थी। ईसाई-भावनाओंसे अभिभूत पाश्चात्य विद्वान् एवं उनके अनुयायी कुछ भारतीय भी अनादि और अनन्त 'वेदों' को भी ईसा से कुछ सहस्र वर्ष

पूर्व की ही रचना मानते हैं। प्रकृत में इतना उनको भी कहना पड़ता है कि महाभारत में रामायण के पात्रों और वाल्मीकिरामायण का भी वर्णन है; परन्तु रामायण में महाभारत के पात्रों का वर्णन नहीं है। कहा जाता है कि पाणिनि-सूत्रों में भारत के विषयों का निर्देश मिलता है परन्तु रामायण के विषयों का नहीं मिलता। पर यह सर्वथा अशुद्ध है। पाणिनि-सूत्रों में कौशल्या, कैकेयी, शूर्पणखा आदि का निर्देश मिलता है यह पीछे कहा जा चुका है। इसी तरह भारत का पश्चिम में, रामायण का पूर्व में निर्माण मानना भी निर्मूल है। इसी आधार पर कुछ लोग रामायण की कथावस्तु को भी भारत के बाद की मानते हैं जो सर्वथा श्रुति, स्मृति, पुराण तथा इतिहास के विरुद्ध है। पुराणों के अनुसार वैवस्वत मन्वन्तर के २४ वें त्रेता में श्रीराम का जन्म हुआ है। श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर आदि का जन्म अट्ठाइसवें द्वापर में हुआ, अतः भारतीय शास्त्रों एवं विद्वानों के अनुसार रामायण से बहुत काल के पश्चात् भारत या महाभारत का निर्माण हुआ। महाभारत के ही एक अंश गीता में भगवान् कृष्ण कहते हैं, शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ— "रामः शस्त्रभृतामहम्" (गी० १०।३१) इसी तरह आरण्यकपर्व में भीम कहते हैं, बुद्धि, सत्त्व और बल से सम्पन्न, गुणश्लाघ्य शूर मेरे भ्राता वानरपुंगव हनुमान् रामायण में प्रसिद्ध हैं— "भ्राता मम गुणश्लाघ्यो बुद्धिसत्त्वबलान्वितः । रामायणोऽतिविख्यातः शूरो वानरपुङ्गवः ॥" (म० भा० ३।१४७।११) इसी प्रकार हरिवंशोक्त भारत-श्रवण की विधि में कहा है— "वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ । आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥" (म० भा० १८।६।२३) इस तरह भारत में वेद के समान ही रामायण का उल्लेख है। महाभारत में अनेक स्थलों पर वाल्मीकि का तपस्वी महर्षि के रूप में उल्लेख है। इतना ही नहीं वाल्मीकिरामायण का श्लोक भी महाभारत में उद्धृत है— "अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि । पीडाकरममित्राणां यत्स्यात् कर्तव्यमेव तत् ॥ न हन्तव्याः स्त्रिय इति यद् ब्रवीषि प्लवङ्गम । सर्वकालं मनुष्येण व्यवसायवता सदा ॥" (म० भा० ७।११८।४८) अर्थात् वाल्मीकि ने यह श्लोक गाया है कि अमित्रों को जो भी अप्रिय हो वह करना ही चाहिये । शान्तिपर्व में गोविन्द की महिमा गानेवालों में असित, देवल और मार्कण्डेय के साथ वाल्मीकि का भी उल्लेख है। नलोपाख्यान के सुदेव का स्वागतभाषण (म० भा० ३।६८।८-२६) रामायण से उद्धृत है। इससे स्पष्ट होता है कि रामायण महाभारत से प्राचीन है। भारत तथा महाभारत की कल्पना निर्मूल बुल्के कहते हैं—"परन्तु महाभारत के प्राचीनतम पर्वों में रामायण एवं वाल्मीकि का उल्लेख नहीं है। उनमें राम-कथा के पात्रों का उल्लेख है। इससे प्रतीत होता है भारत के कवि राम-कथा और उसके प्रधान पात्रों से परिचित थे।" यह भी भारतीय शास्त्रों एवं विद्वानों की दृष्टि में अत्यन्त असंगत है।

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६९ महाभारत के अनुसार भगवान् व्यास ही भारत या महाभारत के रचयिता हैं। वे भला राम के समकालिक रामायण और उसके कवि से कैसे अपरिचित रह सकते हैं। जैसे पाश्चात्यों की रामायण और आदि- रामायण की कल्पना निर्मूल है वैसे ही भारत एवं महाभारत की कल्पना भी निर्मूल है। संस्कृत भाषा सर्वप्राचीन भाषा है तथापि संस्कृत, जेन्द, लैटिन, ग्रीक आदि भाषाओं का साम्य देखकर पाश्चात्यों ने उनकी जननी किसी नयी भाषा की कल्पना कर डाली, जिसके अस्तित्व में कोई प्रमाण नहीं है। वैसे ही उन्होंने महाभारत से भिन्न एक भारत की भी जो निर्मूल कल्पना कर डाली है वह निरी दुरभिसन्धि ही है। जिन पर्वों में रामकथाएँ कम हैं उन्हें प्राचीन और जिनमें अधिक हैं उन्हें नवीन तथा जिनमें रामकथा का अभाव है एवं उसके पात्रों का अस्तित्व है वह मूल भारत है यह कल्पना भी अन्योन्याश्रयदोष से ग्रस्त है। रामायण की अर्वाचीनता सिद्ध होने पर ही उसके उल्लेख से पर्वों की अर्वाचीनता सिद्ध होगी। इसी प्रकार पर्वों की अर्वाचीनता सिद्ध होने से ही रामायण की अर्वाचीनता सिद्ध होगी । पर जब रामायण की प्राचीनता रामायण महाभारत दोनों से ही सिद्ध है, तब इस आधार पर किन्हीं पर्वों की अर्वाचीनता कैसे सिद्ध हो सकेगी ? इसी लिए कौन सा पर्व प्रामाणिक है एवं कौन-सा अप्रामाणिक इसकी कोई कसौटी पाश्चात्यों के पास नहीं है। बुल्के के अनुसार "युद्धसम्बन्धी पर्वों में द्रोणपर्व सबसे अर्वाचीन है। उसमें रामकथा का चौदह बार उल्लेख है। भीष्म, कर्ण और शल्य पर्वों में पाँच बार उल्लेख आता है। आरण्यक-पर्व में रामकथा का दो बार वर्णन है। इसके अतिरिक्त भी उसमें रामकथाओं का पन्द्रह बार सङ्केत मिलता है। यह पर्व अपेक्षाकृत अर्वाचीन है। यह कथाओं तथा उपाख्यानों का भण्डार है। इस पर्व में राम का अवतार होने का भी उल्लेख है। इससे स्पष्ट है कि पर्वों की अर्वाचीनता का मूल अधिकाधिक रामकथा उल्लेख ही है ?” परन्तु यह मूल नहीं सर्वथा ही अमूल है। आरण्यकपर्व में भीम और हनुमान् की कथा एवं संक्षेप में रामकथा का प्रसंगानुसार वर्णन ठीक ही है। संक्षिप्तकथन में कुछ सामग्रियों का छूट जाना भी असंगत नहीं है। इसी तरह द्रोणपर्व की कथा में भी बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड की सामग्री का न होना असंगत नहीं, क्योंकि वहाँ तो षोडशराजोपाख्यान का उद्देश्य प्रभावशाली राजाओं के भी परलोक-गमन का वर्णन कर शोक-निवारणमात्र है, अतः सबका वर्णन इष्ट नहीं है। शान्तिपर्व में युधिष्ठिर की शोक-निवृत्ति ही इष्ट है। महाभारतवनपर्व में हनुमान्-संवाद में हनुमान् ने कहा है— “अथ दाशरथिर्वीरो रामो नाम महाबलः। विष्णुर्मानुषरूपेण चचार वसुधातborderलम् ॥” (म० भा० ३।१४७।३१) अर्थात् विष्णु ने ही मानुषरूप में दाशरथि राम होकर वसुधा को उपकृत किया था। रामोपाख्यान में ब्रह्मा ने कहा कि मेरे अनुरोध से चतुर्भुज विष्णु रावण-वधार्थ हुए हैं, वे रावण-वध करेंगे। धौम्य ने कहा है — “विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य वै। दशग्रीवो हतश्छन्नं संयुगे भीमकर्मणा ॥” (म० भा० ३।३१५।२०) “यमस्य नेता नमुचेश्च हन्ता ।” (म० भा० ३।२५।१०) “असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः। मार्कण्डेयश्च गोविन्दे कथयन्त्यद्भुतं महत् ॥” ( म० भा० १२।२०७।४ )

७० रामायणमीमांसा तृतीय “सन्ध्यांशे समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च । अहं दाशरथी रामो भविष्यामि जगत्पतिः ॥” (म० भा० १२।३३९।८५) “वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ । आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥ (म० भा० १८।६।२३) शान्तिपर्व में शम्बूक का भी उल्लेख है— “श्रूयते शम्बूके शूद्रे हते ब्राह्मणदारकः । जीवितो धर्ममासाद्य रामात् सत्यपराक्रमात् ॥' (म० भा० १२।१५३।६७ ) ऊपर के उद्धरणों से राम का अवतार होना एवं रामायण तथा वाल्मीकि महर्षि का अति प्राचीन होना सिद्ध है, फिर भी बुल्के इन्हीं उद्धरणों के आधार पर यह सिद्ध करना चाहते हैं कि ये सब अंश बहुत पीछे के हैं, क्योंकि उक्त सब अंश प्रचलित रामायण के हैं जो कि आदिरामायण की अपेक्षा बहुत अर्वाचीन है । परन्तु यह उनकी केवल दुरभिसन्धि है । हम पहले लिख आये हैं कि उक्त सभी अंश प्रामाणिक हैं एवं वाल्मीकिनिर्मित हैं। महाभारत से अतिप्राचीन होने के कारण महाभारत में इनका उद्धरण उचित है । विष्णुपुराण के अनुसार ऋक्ष नामक भार्गव वाल्मीकि हुए हैं। “ऋक्षोऽभूद्‌भार्गवस्तस्माद् वाल्मीकिर्योऽभिधीयते ॥” वाल्मीकिरामायण में भी— “सन्निबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विंशत्सहस्रकम् । उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना ॥” (वा० रा० ७।९४।२५) इत्यादि वचनों में वाल्मीकि को भार्गव कहा गया है । वाल्मीकिरामायण में ही वाल्मीकि को प्रचेता का दसवां पुत्र कहा गया है । ‘वेदः प्राचेतसादासीत्’ इस लव-कुश के मंगलाचरण पुराणवचन में भी वाल्मीकि को प्राचे- तस कहा गया है । इन सब वचनों के अनुसार विदित होता है कि पृथु के प्रपौत्र प्राचीनबहीं राजर्षि ही प्रचेता हुए हैं । उनके ही दस प्रचेतस पुत्र हुए हैं। उन्हीं में अन्तिम वाल्मीकि थे, अथवा पूर्व के प्राचेतस मुनि ही शापवशात् विप्र होकर पुनः वाल्मीकि हुए हैं अथवा भृगु मुनि का ही प्रचेता भी नाम था । उनके दस पुत्रों में अन्तिम वाल्मीकि थे । वही निश्चल होकर तप में संलग्न हुए थे । उनपर वल्मीक बन गया था, पुनः उस वल्मीक से प्रादुर्भूत होने के कारण वे वाल्मीकि कहलाये । ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार लोक-पितामह ब्रह्मा ने वल्मीकप्रभूत होने से उन्हीं को 'वाल्मीकि' नाम प्रदान किया है— “अथाब्रवीन्महातेजा ब्रह्मा लोकपितामहः । वल्मीकप्रभवो यस्मात्तस्माद् वाल्मीकिरित्यसौ ॥” मातृगर्भ के समान वल्मीक में रहने के कारण वही महात्मा वाल्मीकि कहलाये । ब्रह्मवैवर्तपुराण २२ वें अध्याय में कहा गया है— “कति कल्पान्तरेऽतीते स्रष्टुः सृष्टिविधौ पुनः । यः पुत्रश्चेतसो धातुः बभूव मुनिपुङ्गवः ॥ तेन प्रचेता इति च नाम चक्रे पितामहः ।”

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ७१ अर्थात् कल्पान्तरों के बीतने पर स्रष्टा के नवीन सृष्टि-विधान में ब्रह्मा के चेतस् से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसे ही, ब्रह्मा के प्रकृष्ट चित्त से आविर्भूत होने के कारण, प्रचेता कहा गया है । तथा च ब्रह्मा के मानस पुत्र ही प्रचेता हुए हैं । ब्रह्मा के दस पुत्र मनु आदि स्मृतियों में प्रसिद्ध हैं- "अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् । पतीन् प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश ॥" (मनु० १।३४) ब्रह्मा कहते हैं- 'मैंने प्रजा-सृष्टि की इच्छा से सुदुश्चर तप करके दस प्रजापति महर्षियों की सृष्टि की । वे थे मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद- "मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च ॥" (मनु० १।३५) महाभारत के सम्भवपर्व में ७५ अध्याय के चौथे श्लोक में कहा गया है प्रचेता के दस पुण्यजन पुत्र हुए हैं- "दश प्रचेतसः पुत्राः सन्तः पुण्यजनाः स्मृताः ।" प्राचेतस मुनि ही वाल्मीकि हैं, यह मार्कण्डेयपुराण से सिद्ध है- "उवाच प्रणतो वाक्यं वाल्मीकिं च तपोधनम् । प्राचेतस महाभाग श्रीरामस्य कथां शुभाम् ॥ कथयस्व महाबुद्धे रामस्य परमात्मनः ।" ब्रह्मा के इन दस पुत्रों में नौ प्रजा-सृष्टिकर्ता हुए हैं । दशम पुत्र ने शतकोटिप्रविस्तर रामायण रचकर ब्रह्मा से सृष्ट प्रजा को ज्ञान-प्रदान किया था । सृष्टिकर्ता न होने से ही नौ प्रजापतियों में उनकी गणना नहीं है । तथा च शिवरामायण में कहा है- "पुरा स्वायम्भुवो ह्यासीत् प्राचेतस महाद्युतिः । ब्रह्मात्मजस्तु ब्रह्मर्षिः तेन रामायणं कृतम् ॥ शतकोटिप्रविस्तीर्णं नानाकल्पसमुद्भवम् । स कदाचिद् ब्रह्मलोके धातारञ्चाप्यनिन्दत् ॥ स्वसुताग्रहणात्तेन शप्त आप निषादताम् । चमत्कारपुरे भूत्वा भार्गवान्वयसम्भवः ॥ लोहजङ्घो द्विजो ह्यासीद् ऋक्षनामान्तरो हि सः । मातापित्रोः सेवया स कञ्चित्कालं गृहे वसन् ॥ भार्यां पतिव्रतां साध्वीं तां परित्यज्य स द्विजः ॥ ब्राह्मीं वृत्तिं परित्यज्य चोरकर्म समाचरत् । नारदेनोपदिष्टस्तु तपोनिष्ठां समाश्रितः ॥ वल्मीकमभवत्तस्य शरीरे नारदाज्ञया । वल्मीकनिर्गमाद् ब्रह्मा वाल्मीकिरिति चाब्रवीत् ॥" अर्थात् प्राचीनकाल में स्वायंभव प्राचेतस महामुनि ब्रह्मा के पुत्र हुए थे । उन्होंने ही शतकोटि श्लोकों का सुविस्तृत रामायण ग्रन्थ रचा है । वह राम के विभिन्न कल्पों के चरित्रों का सङ्कलन था । उन्होंने ब्रह्मलोक में ब्रह्मा की, स्वसुता का ग्रहण करने के कारण, निन्दा की थी । इसलिए वे ब्रह्मा के शाप से निषाद हो गये । उसके

पहले वे चमत्कार-पुर में भार्गव-वंश में लोहजङ्घ नामक ब्राह्मण हुए थे। उन्हीं का अन्य नाम ऋक्ष भी था। कुछ समय तक वे माता-पिता की सेवा करते हुए गृह में रहे। पश्चात् साध्वी पतिव्रता भार्या को त्याग कर, ब्राह्म-वृत्ति को छोड़कर चौर्य-कर्म करने लगे। अनन्तर नारद के उपदेश से वे तपस्या में लग गये और उनके शरीर पर वल्मीक जम गया। बहुत काल के पश्चात् नारद की ही आज्ञा से वे वल्मीक से निकल कर वाल्मीकि महर्षि हो गये। समन्वय की दृष्टि से कहा जा सकता है कि किसी कल्प में प्रचेता प्राचीनबर्ही के दसवें पुत्र थे, अतएव प्राचे- तस कहलाये। किसी कल्प में प्रचेता वरुण के दसवें पुत्र हुए थे। उसमें वे भृगु के भ्राता होने से भृगुसम्बन्धित होकर भार्गव कहलाये। वर्तमान कल्प में तो प्रकृष्ट चित्तवाले प्रचेता ब्रह्मा के मरीचि आदि दस पुत्रों में दशम होने के कारण प्रचेता कहलाये। स्वार्थ में अण् प्रत्यय होने के कारण प्रचेता ही प्राचेतस शब्द से भी कहे गये हैं। वे ही शापवश भार्गव वंश में ऋक्ष या लोहजङ्घ नाम से उत्पन्न हुए, अतः भार्गव कहलाये थे। चौर्यादि कर्म करते हुए वही किरात या निषाद हो गये थे। सप्तर्षियों या नारद के सम्पर्क से वही तपोनिष्ठ होकर महर्षि वाल्मीकि हुए थे। स्कन्दपुराण आदि की अन्य कथाओं से भी इस कथा का समन्वय कर लेना उचित है। अन्य लोगों ने भी वाल्मीकि की ऐतिहा- सिकता पर पाश्चात्य लोगों द्वारा प्रदर्शित मार्ग का ही अनुसरण किया है। वे लोग इतिहास और पुराण की वाल्मीकि सम्बन्धित कथाओं को परस्पर असम्बद्ध एवं विशृङ्खलित मानते हैं। कहीं उन्हें सुविज्ञ तपस्वी बताया गया है तो कहीं प्रचण्ड दस्यु। कहीं उन्हें राजा राम से अनेकों वर्ष पूर्व उत्पन्न कहा गया है तो कहीं उनके समकालीन कहा गया है; पर आधुनिक तो उन्हें ईसा से कुछ ही शती पूर्व का मानते हैं। भारतीय दृष्टिकोण से तो महर्षि वाल्मीकि को राम से अनेक वर्ष पूर्व उत्पन्न मानने में कोई आपत्ति नहीं है। वे दीर्घजीवी होने के कारण राम के समकालीन भी थे। पहले उन्होंने शतकोटि श्लोकों का सुविस्तृत रामायण काव्य लिखा था। राम के समय में सीताचरित्रशुद्धि तथा कुशी-लव के अधीत वेदों के उपबृंहणार्थ चौबीस सहस्र श्लोकों में गायत्री के चतुर्विंशति अक्षरों का अनुसरण करते हुए चतुर्विंशतिसहस्रसंहितारूप रामायण ग्रन्थ लिखा। जब वाल्मीकि के अनुसार राम की ग्यारह सहस्र वर्ष की आयु थी तो वाल्मीकि महर्षि की उससे भी अधिक आयु होना आश्चर्यपूर्ण तथा असम्भावित नहीं कहा जा सकता। ई० श० के कुछ ही शती पूर्व उनका जन्मकाल मानना तो सर्वथा निराधार ही है। तैत्तिरीयप्रातिशाख्य के तीन सूत्रों से सूचित वाल्मीकि को आदि कवि से पृथक् मानने में कोई समुचित तर्क नहीं है। ‘पकारपूर्वश्च वाल्मीकेः’ वाल्मीकिशाखी के मतानुसार पकारपूर्व पकार को छत्वापत्ति नहीं होती। यहाँ ‘च’ शब्द का ‘प्रतिषेध’ अर्थ है। ‘कपवर्गपरश्चाग्निवेश्यवाल्मीक्ययोः’ अग्निवेश्य और वाल्मीकि शाखा-वाले आचार्यों के मत में कवर्ग एवं पवर्ग पर विसर्जनीय स स्थान ऊष्मा नहीं बनता है। यहाँ भी ‘च’ का निषेध ही अर्थ है। ‘उदात्तो वाल्मीकेः’ वाल्मीकिशाखी के मतानुसार प्रणव का उदात्त स्वर होता है। कहा जाता है—इन वैयाकरण वाल्मीकि की आदि कवि वाल्मीकि के साथ एकता नहीं कही जा सकती; क्योंकि व्याकरणाचार्य के रूप से उनकी प्रशस्ति कहीं नहीं मिलती है। याकोबी इन दोनों व्यक्तियों को पृथक् ही मानते हैं, परन्तु उक्त कथन का कोई आधार नहीं है। रामायण सरीखे महाकाव्य का निर्माता महान् संस्कृतज्ञ व्याकरण का आचार्य नहीं था, यह कहना अत्यन्त उपहासास्पद ही है। वाल्मीकि ने हनुमान् की व्याकरणज्ञता का चित्रण किया है। श्रीराम कहते हैं— “नानुग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः । नासामवेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितुम् ॥” (वा० रा० ४।३।२८)

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ७३ जो ऋग्वेद में प्रातिशाख्यज्ञानपूर्वक शिक्षित नहीं है, जो यजुर्वेद को धारण नहीं करता एवं जो सामवेद नहीं जानता, वह ऐसा भाषण नहीं कर सकता । "नूनं व्याकरणं कृत्स्नं अनेन बहुधा श्रुतम् । बहु व्याहरताऽनेन न किञ्चिदपशब्दितम् ॥" (वा० रा० ४।३।२९) निश्चय ही इसने सम्पूर्ण व्याकरण का खूब श्रवण (अध्ययन) किया है, तभी तो बहुत बोलते हुए भी इसने कहीं भी अपशब्द का प्रयोग नहीं किया । "न मुखे नेत्रयोश्चापि ललाटे च भ्रुवोस्तथा । अन्येष्वपि च सर्वेषु दोषः संविदितः क्वचित् ॥" (वा० रा० ४।३।३०) बोलते समय इसके नेत्र, ललाट, भ्रू तथा अन्य सभी अङ्गों में किसी प्रकार की विक्रिया परिलक्षित नहीं होती । "अविस्तरमसन्दिग्धमविलम्बितमव्यथम् । उरस्थं कण्ठगं वाक्यं वर्तते मध्यमस्वरम् ॥" (वा० रा० ४।३।३१) मध्यमारूप से उरस्थ, वैखरीरूप से कण्ठ में रहनेवाला न अत्यन्त उच्च और न अत्यन्त नीच, मध्यम स्वर का इसके द्वारा उच्चारित वाक्य अविस्तर, असन्दिग्ध, अविलम्बित और अव्यथ (श्रोता के कानों को व्यथित न करनेवाला) अर्थात् श्रुतिकटुदोष से रहित है । "संस्कारक्रमसम्पन्नामद्रुतामविलम्बिताम् । उच्चारयति कल्याणीं वाचं हृदयहारिणीम् ॥" (वा० रा० ४।३।३२) यह ऐसी हृदय को आह्लादित करनेवाली कल्याणी वाणी का उच्चारण करता है जो कि संस्कारक्रम- विशिष्ट है, अर्थात् विशिष्ट आनुपूर्वीरूप से पद, वाक्य आदि के ग्रहणार्थ अन्तःकरण में क्रमविशिष्ट वर्णाकार संस्कार उत्पन्न करनेवाली है; क्योंकि क्रमविशिष्ट वर्णों में ही पदत्व और वाक्यत्व सम्पन्न होता है, तभी वाक्यार्थ-बोध हो सकता है । क्रमहीन या विपरीत क्रम से वर्णों के संस्कारों से अभीष्ट वाक्यार्थ-बोध नहीं हो सकता । साथ ही यह वाणी अद्भुत और अविलम्बित अर्थात् मध्यमस्वरवाली है । "अनया चित्रया वाचा त्रिस्थानव्यञ्जनस्थया । कस्य नाराध्यते चित्तं उद्यतासेररेरपि ॥" (वा० रा० ४।३।३३) यह वाणी उर, कण्ठ, सिर इन तीन स्थानों में व्यक्त होकर श्रोताओं के श्रोत्रों से ग्राह्य होनेवाली है । ऐसी चित्र वाणी सुनकर ऐसा शत्रु भी कौन होगा जिसका चित्त भी अनुकूल न बन जायेगा । क्या ऐसा चित्रण कोई ऋक्, साम, यजु तथा शिक्षा, प्रातिशाख्य आदि से अपरिचित कवि कर सकता है ? इसी तरह श्रीहनुमान् के अध्ययन की चर्चा करते हुए कहा गया है— "असौ पुनर्व्याकरणं ग्रहीष्यन् सूर्योन्मुखः प्रष्टुमनाः कपीन्द्रः । उद्यद्गिरेरस्तगिरि जगाम ग्रन्थं महद् धारयनप्रमेयः ॥ १०

७४ रामायणमीमांसा तृतीय ससूत्रवृत्त्यर्थपदं महार्थं ससंग्रहं सिद्ध्यति वै कपीन्द्रः । नह्यस्य कश्चित् सदृशोऽस्ति शास्त्रे वैशारदे छन्दगतौ तथैव ॥ सर्वासु विद्यासु तपोविधाने प्रस्पर्धतेऽयं हि गुरुं सुराणाम् ।” (वा० रा० ७।३६।४४-४६) उदयाचल से वे सूर्य के सम्मुख होकर उनसे प्रश्न करते हुए सूर्य से व्याकरण-वृत्ति, भाष्य, वातिक, संग्रह आदि के स्वरूपतः तथा अर्थतः महान् ग्रन्थों को धारण करते हुए रथ के सामने आकाश में अस्ताचल तक उलटे चलते रहे । पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा आदि द्वारा वेदार्थ के निर्णय एवं पाण्डित्य में हनुमान् से बढ़कर कोई भी नहीं है । हनुमान् सभी विद्याओं तथा तपोविधानों में बृहस्पति से स्पर्धा करते हैं । अतः आर्षज्ञानसम्पन्न महर्षि वाल्मीकि व्याकरण के आचार्य नहीं हो सकते, ऐसी कल्पना करना सर्वथा निर्मूल है । याकोबी आदि पाश्चात्य विद्वान् तो भारतीय संस्कारशून्य, आर्षज्ञान पर विश्वास न करनेवाले तथा दुरभिसन्धियुक्त हैं । वे वाल्मीकिरामायण की अर्वाचीनता और राम की अनीश्वरता सिद्ध करने में ही प्रयत्नशील रहते हैं । यद्यपि वेद, वेदान्त, मीमांसा, छन्द, अलङ्कार के आचार्यरूप में उनकी प्रशस्ति नहीं है, तो भी उनकी कृति ही उनके अगाध ज्ञान की गरिमा का परिचय दे रही है । रामायण के जिन अंशों में उनके महत्त्व का वर्णन है, दुर्भाग्यवश, उनको आधुनिक लोग क्षेपक सिद्ध करने में जुटे हुए हैं । उन्हीं लोगों ने बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त कहने का साहस किया है, जो सर्वथा उपेक्षणीय है । पुराणों की सामग्रियों से भी महर्षि के चरित्र में कोई विषमता नहीं सिद्ध होती है । एक प्रचण्ड दस्यु भी सत्सङ्ग से एक सुविज्ञ तपस्वी ही नहीं, किन्तु आर्षज्ञानसम्पन्न महर्षि भी हो ही सकता है— “सठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परस कुधातु सुहाई ।” (रा० मा० १।२।५) “वालमीकि नारद घटजोनी । निज निज मुखनि कही निज होनी ॥” (रा० मा० १।२।२) स्कन्दपुराण आदि अर्वाचीन सामग्री नहीं हैं और न ही उनका प्राचीन सामग्रियों के साथ कोई विरोध है । स्कन्दपुराण वैष्णव-खण्ड वैशाखमाहात्म्य के अनुसार एक व्याध ने शङ्ख नामक द्विज को बाँधकर उसके कुण्डल, छत्र, उपानद् आदि छीनकर छोड़ दिया । गरमी से शङ्ख के पैर जलते देख उसके मन में दया आयी, तो उसने अपना जीर्ण उपानद् उतार कर दे दिया । इसपर द्विज ने व्याध को आशीर्वाद दिया । शङ्ख ने उसे राम नाम का भी उपदेश दिया और आशीर्वाद में कहा कि तुम वाल्मीकि नाम से पृथ्वी पर विख्यात होगे । उसी सरोवर पर कृणु नाम का विप्र तप करता था । अधिक तप करने के कारण उसके ऊपर वल्मीक (दीमकों का बनाया मिट्टी का टीला) बन गया । लोग उसे वल्मीक कहते थे । किसी स्त्री के स्मरण से वीर्य-स्खलन हुआ । उसे किसी शैलूषी ने ग्रहण कर लिया । उसी से वाल्मीकि उत्पन्न हुए । दूसरी कथा आवन्त्यखण्ड के अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य में है । वहाँ वाल्मीकेश्वरमाहात्म्य का वर्णन है । सनत्कुमार के कथनानुसार भृगुवंशीय कोई सुमति नामक विप्र था । उसकी कौशिकी पत्नी से अग्निशर्मा उत्पन्न हुआ । वह वेदाध्ययन आदि से विमुख होकर दस्युओं में रहता था और दस्यु ही हो गया । एक बार तीर्थयात्रा के प्रसङ्ग से आये हुए सप्तर्षियों से उसका समागम हुआ । वह उनके भी छत्र, उपानद् आदि छीनने लगा । उन्होंने कहा, हम लोग

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ७५ तीर्थयात्रार्थ आये हैं, तुम यह पाप क्यों कमाते हो ? उसने कहा, माता-पिता, भार्या, पुत्र आदि के भरणपोषणार्थ मैं ऐसा करता हूँ । उन्होंने कहा—उनसे पूछ लो, वे सब क्या तुम्हारे पाप में भी भागीदार होंगे । जब उसने जाकर पूछा तो सभी ने कहा कि तुम जो करते हो उसका फल तुम्हें ही भोगना पड़ेगा । हम उसके भागी नहीं हैं । यह सुनकर अग्निशर्मा निर्विण्ण होकर सप्तर्षियों की शरण में आ गया । उनके आदेशानुसार अग्नि का ध्यान और महामन्त्र का जप करता हुआ अविचल हो गया । उसके ऊपर वल्मीक बन गया । जब तीर्थयात्रा से वे मुनि उसी मार्ग से लौटे तो उन्होंने वल्मीक में से ध्वनि सुनी, खनन किया तो अग्निशर्मा निकला । उसी ने कुशस्थली में जाकर महेश्वर की आराधना की । उससे सिद्धि-लाभ कर रामायण महाकाव्य का निर्माण किया । तीसरी कथा नागरखण्ड में है । मुखार नामक उत्तम तीर्थ है, जहाँ उन श्रेष्ठ मुनियों की चोर से भेंट हुई जिनके प्रभाव से उस चोर ने सिद्धि प्राप्त की और रामायणकर्ता वाल्मीकि नाम से प्रख्यात हुआ । पूर्वकाल में चमत्कारपुर में माण्डव्यवंशोद्भव लोहजङ्घ नामक माता-पिता का भक्त द्विज रहता था । परिस्थितिवश चोर हो गया । ऋषिगणों की सङ्गति से उसे वैराग्य हुआ । पुलह नामक हास्यशील ऋषि ने उसे जाटघोटा नामक सिद्धिप्रद मन्त्र प्रदान किया । उसीसे उसको सिद्धि प्राप्त हुई । कहा है— “मन्त्रे तीर्थे द्विजे दैवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ । यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी ॥” मन्त्र, तीर्थ, द्विज, दैवज्ञ, भेषज तथा गुरु में जिसका जैसा विश्वास होता है उसको वैसी सिद्धि मिलती है । चौथी कथा प्रभासखण्ड देविकामाहात्म्य के मूलस्थान-माहात्म्य में है । पार्वती के प्रश्न पर शङ्कर ने बताया कि प्राचीनकाल में शमीमुख नामक द्विज को वैशाख नामक पुत्र हुआ । उसे माता-पिता की सेवा के अतिरिक्त कोई इच्छा नहीं थी । वह मनुष्यों को लूट कर माता-पिता तथा पत्नी का पालन करता था । एक बार उसे मार्ग में तीर्थ- यात्रापरायण सप्तर्षि मिले । इस कथा में अङ्गिरा ऋषि से उसका वार्तालाप हुआ । उस तस्कर के माता-पिता ने कहा जब तुम बालक थे, असमर्थ थे, तब हम दोनों ने तुम्हारा लालन-पालन किया था । अब हमारी वृद्धावस्था में तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम हमारी देखभाल करो । हम तुम्हारे पापकर्म के फलभागी नहीं हैं । इससे उसे वैराग्य हुआ । ऋषि ने उसे मन्त्र जपने को कहा । तदनन्तर उस गुरभुक्त की देविका के शुभ तट पर समाधि लग गयी । सहस्र वर्ष बाद ऋषियों ने उसे वल्मीक से निकाला । इस कथा के अनुसार ब्राह्मणों ने वैशाख के सुप्त शरीर पर योगसम्भव भेषजों का मर्दन किया । ऋषियों के आशीर्वाद से वह वाल्मीकि महर्षि हुआ । उसकी जिह्वा पर स्वच्छन्द सरस्वती विचरण करने लगी और उसने रामायण की रचना की । अध्यात्मरामायण के अनुसार महर्षि वाल्मीकि ने अपने आश्रम में आये हुए श्रीराम का पूजन और स्तवन करके अपनी कथा सुनाई थी—मैं पहले किरातों में उत्पन्न होकर उन्हीं में पला और बड़ा हुआ । केवल जन्म से ही मैं द्विज था । शूद्रा के सम्पर्क से मेरे बहुत से पुत्र उत्पन्न हुए । मैं चोर हो गया । एक बार विराट् वन में मैंने सप्तर्षियों को देखा । मैं उनके वस्त्रादि लूटने के लिए उनके पीछे दौड़ा । मुनियों ने कहा—द्विजाधम, क्यों दुःखी हो रहा है । मैंने कहा—कुछ लेने के लिए, क्योंकि मेरे स्त्री-पुत्र आदि भूखे हैं । ऋषियों ने कहा—जाओ उनसे पूछ आओ कि वे तुम्हारे पापसञ्चय में भी भागी होंगे क्या ? मैंने जाकर उनसे पूछा तो उत्तर मिला कि पाप के भागी तुम्हीं होओगे। इसपर मुझे निर्वेद हुआ । मुनियों के दर्शन से मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया था । मुनियों ने कहा— भद्र ! उठो, तुम्हारा सत्समागम सफल हो गया । तुम 'मरा' शब्द को तब तक जपो जब तक हम पुनः यहाँ न आ जायें । मैंने वैसा ही किया । मैं बाह्य जगत् भूल गया । निश्चलरूप से खड़ा रहने के कारण मुझपर वल्मीक हो गया ।

सहस्रों युगों के बाद ऋषि पुनः आये ओर मुझसे बोले--बाहर निकलो । मैं नीहार से भास्कर की भाँति वल्मीक से बाहर निकला । मुनियों ने कहा--अब तुम वाल्मीकि मुनीश्वर हो गये हो । यह कह कर वे दिव्यगति ऋषि चले गये । हे राघव ! यह सब आपके नाम का प्रभाव है । तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार देवों के साथ भास्कर और विष्णु उन्हें रामायणकार होने का आशीर्वाद देते हैं । शेष कथा अध्यात्मरामायण के तुल्य ही है । आनन्दरामायण के अनुसार स्तम्भ नामक श्रीवत्सगोत्री ब्राह्मण महापापी तथा शूद्राचरणरत था । वह वेश्यारत भी था । किसी दिन उसके यहाँ एक ब्राह्मण का सत्कार हुआ । उसी से उसका उद्धार हुआ । वह जन्मान्तर में व्याध हुआ । उसने पम्पातीर पर शङ्ख का सब कुछ छीन लिया । शेष कथा स्कन्दपुराण की प्रथम कथा जैसी ही है । कृत्तिवासीय रामायण में उस व्याध का नाम रत्नाकर तथा उसके पिता का नाम च्यवन था । यहाँ सप्तर्षियों के स्थान पर उसे ब्रह्मा और नारद मिलते हैं । ब्रह्मा के आदेशानुसार वह नदी में स्नान के लिए जाता है । उसके देखनेमात्र से नदी सूख जाती है । ब्रह्मा उसे राम नाम का उपदेश करते हैं । किन्तु वह उसका उच्चारण न कर सकने के कारण 'मरा' नाम जपता है । मत्स्यपुराण तथा पद्मपुराण में इक्ष्वाकुवंशीय नृपतियों के प्रसङ्ग में जहाँ रामचरित वर्णित है, वहाँ कहा गया है कि भार्गवश्रेष्ठ वाल्मीकि ने रामचरित को निबद्ध किया है । विष्णुपुराण के अनुसार भृगुवंशी ऋक्ष व्यास हुए हैं जो वाल्मीकि कहलाते हैं । वायुपुराण के अनुसार माहेश्वरावतारयोगवर्णन के अन्तर्गत ऋक्ष के विषय में उल्लेख है कि वह चौबीसवें द्वापर में व्यास बनेगा । कूर्मपुराण के अनुसार तेईसवें व्यास तृणबिन्दु के पश्चात् वाल्मीकि का वर्णन है । महाभारत में वाल्मीकि का परिचय बहुलता से मिलता है । आदिपर्व में आस्तीक जनमेजय की प्रशंसा करते हुए कहता है—राजन् ! तुम वाल्मीकि के समान गम्भीर एवं धैर्यशाली हो, वसिष्ठ के समान जितक्रोध हो, इन्द्र के समान ऐश्वर्यशाली हो एवं कान्ति में नारायण के तुल्य हो । सभापर्व में शत्रु की दिव्य सभा का वर्णन करते हुए वहाँ उपस्थित जिन व्यक्तियों का नामोल्लेख है उनमें एक नाम वाल्मीकि का भी है । आरण्यकपर्व में जो ऋषि प्रतीक्षा कर रहे थे उनमें वाल्मीकि ऋषि का नाम प्रथम आता है । ( १ ) “वाल्मीकिर्यस्य चरितं चक्रे भार्गवसत्तमः ।।” (पद्मपु० ५।८।१५५; मत्स्यपु० १२।५१ ) ( २ ) “ऋक्षोऽभूद् भार्गवस्तस्माद् वाल्मीकिर्योऽभिधीयते ।।” (वि० पु० ३।३।१८) ( ३ ) “परिवर्त्ते चतुर्विंशे ऋक्षो व्यासो भविष्यति ।।” (वायुपु० ३३।१६४) ( ४ ) “तृणबिन्दुस्त्रयोविंशे वाल्मीकिस्तु ततः परम् ।” (कूर्मपु० ) ( ५ ) “वाल्मीकिवत्ते निभृतं स्ववीर्यं वसिष्ठवत्ते नियतश्च कोपः । प्रभुत्वमिन्द्रेण समं मतं मे द्युतिश्च नारायणवद् विभाति ।।” ( म० भा० १।५५।१४ ) ( ६ ) “सहदेवः सुनीथश्च वाल्मीकिश्च महातपाः । समीकः सत्यवाक् चैव प्रचेताः सत्यसंगरः ।।” (म० भा० २।७।१६ ) ( ७ ) “ऋषिमुख्याः सदा यत्र वाल्मीकिस्त्वथ काश्यपः । आत्रेयः कुण्डजठरो विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥ एते ऋषिवराः सर्वे त्वत्प्रतीक्षास्तपोधनाः ।” ( म० भा० ३।८५।११९-१२२

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ७७ इसी तरह उद्योगपर्व के भगवद्यानपर्व में कौरवों के सदन जाने से पूर्व जिन महर्षियों ने कृष्ण की पूजा की थी उनमें भी वाल्मीकि का नाम है— "वसिष्ठो वामदेवश्च भूरिद्युम्नो गयः क्रथः । शुक्रनारदवाल्मीका मरुतः कुशिको भृगुः ।। एवमेतैर्महाभागैर्महर्षिगणसार्थिभिः । पूजितः प्रययौ कृष्णः कुरूणां सदनं प्रति ।।" ( म० भा० ५।८३।२७-२९ ) द्रोणपर्व के अन्तर्गत जयद्रथवधपर्व में वाल्मीकि का श्लोक भी उद्धृत है । “अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि । पीडाकरममित्राणां यत् स्यात् कर्तव्यमेव तत् ॥” ( म० भा० ७।१४३।६८ ) शान्तिपर्व के राजधर्मपर्व में कहा गया है--हे भारत ! रामचरित वर्णन में महात्मा भार्गव ने यह श्लोक कहा है । पहले राजा को प्राप्त करना चाहिये और फिर भार्या और फिर धन को प्राप्त करना चाहिये । क्योंकि राजा के न होने पर भार्या और धन कैसे रह सकेंगे ? "श्लोकश्चायं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना । आख्याते रामचरिते नृपति प्रति भारत ।। राजानं प्रथमं विन्देत्ततो भार्यां ततो धनम् । राजन्यसति लोकस्य कुतो भार्या कुतो धनम् ।।” ( म० भा० १२।५७।४०-४१ ) इसी शान्तिपर्व में युधिष्ठिर के प्रश्न पर भीष्म ने कहा है— असित, देवल, महातपा वाल्मीकि और मार्कण्डेय नारायण का अद्भुत वृत्तान्त कहते हैं : “असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः । मार्कण्डेयश्च गोविन्दे कथयन्त्यद्भुतं महत् ।।” ( म० भा० १२।२०७।४ ) कुछ लोग कहते हैं कि "स्कन्दपुराण तथा अध्यात्मरामायण जैसी अर्वाचीन कृतियों में वाल्मीकि की जो कथाएँ मिलती हैं, जिनमें उन्हें दस्यु बताया गया है; उनका मत्स्यपुराण, वायुपुराण, विष्णुपुराण, महाभारत आदि में संकेत भी नहीं है। रामायण एवं प्राचीन पुराण तथा भारत उनके पूर्वजीवन के सम्बन्ध में मौन हैं। उसके अनुसार वाल्मीकि के सम्बन्ध में इस प्रकार की कथा रचने के दो कारण हैं— १. वाल्मीकि नाम की व्युत्पत्ति अपेक्षित थी । पुराणकार किसी व्यक्ति का नाम समझाने के लिए कथा गढ़ लेते थे । जैसे जनक-पुत्री सीता के नाम को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने वैदिक सीता ( हलकृष्ट भूमि ) से सम्बन्ध जोड़कर उसका जन्म ही भूमि से करा दिया । यही बात इक्ष्वाकु, भरद्वाज, सगर आदि के बारे में भी है । इसी तरह वाल्मीकि का अभिधान समझाने के लिए भी किया गया । २. किसी महापुरुष के जीवन का लोगों पर पूर्णरूप से प्रभाव डालने की प्रवृत्ति पुराणों की रही । उसे अधिक कौतूहलपूर्ण और प्रभावशाली बनाने के लिए यह भी परिपाटी थी कि जो जिस बात के लिए प्रसिद्ध था, प्रारम्भ में उसको विपरीत बताया जाता था । सम्राट् अशोक भारत के इतिहास में धर्मात्मा तथा दयालु नरेश के रूप में विख्यात रहा है । इसी कारण उसे प्रारम्भिक जीवन में क्रूर या निर्दय चित्रित किया गया है । कालिदास

रामायणमीमांसा तृतीय

संस्कृत-साहित्य के विद्वान् कवि हो चुके हैं, बाल्यावस्था में उन्हें मूर्ख बताया गया है, क्योंकि विद्वान् का विपरीत मूर्ख ही होता है। तुलसीदास तथा सूरदास त्यागी, तपस्वी एवं महान् ग्रन्थों के प्रणेता थे। उन्हें पूर्वजीवन में विलासी बताया गया है। ऐसे ही ऋषि वाल्मीकि को भी प्रारम्भ में दस्यु माना गया है, क्योंकि ऋषि का वैपरीत्य दस्यु ही हो सकता है। राजाओं की परम्परा का भाट-चारणों को स्मरण रखना पड़ता था, परन्तु ऋषियों के निमित्त ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। जो ख्यातिप्राप्त होते हैं उन्हीं का नाम सुरक्षित रहता है।” यद्यपि उक्त बातें आपातरमणीय हैं; किन्तु प्रमाण-शून्य तथा वेद, पुराण, भारत आदि शास्त्रों से सर्वथा विरुद्ध हैं। वस्तुतः अतीत घटनाओं के सम्बन्ध में प्रामाणिक इतिहास ही प्रमाण होता है। अटकलबाजी से तो विपरीत दिशा में भी पहुँचा जा सकता है। भारतीय साहित्य में वेद, पुराण, महाभारत, रामायण आदि का धर्म, ब्रह्म तथा परम्परा, सदाचार आदि के सम्बन्ध में परम प्रामाण्य है। आधुनिक इतिहास में भ्रान्ति भी हो सकती है, परन्तु वाल्मीकि, वसिष्ठ, पराशर, व्यास आदि ऋषियों के द्वारा निर्मित ग्रन्थों में अप्रामाण्य की कल्पना ही निराधार है। प्रत्यक्षादि सभी प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः होता है। यदि प्रमाणों का प्रामाण्य परतः होगा तब तो उस प्रमाण का भी प्रामाण्य परतः होगा, ऐसी स्थिति में अनवस्था दोष होगा। यदि अन्त में किसी प्रमाण का स्वतःप्रामाण्य मानना ही है तो प्रथम का ही स्वतःप्रामाण्य क्यों न मान लिया जाय ? अप्रामाण्य परतः विषयबाध या कारण-दोष- ज्ञान से होता है। जैसे चक्षुरूप कारण में पित्त-दोष के ज्ञान से “पीतः शङ्खः” इस ज्ञान का अप्रामाण्य निश्चित होता है। “नेदं रजतम्” इस बाध-ज्ञान से “इदं रजतम्” इस ज्ञान का अप्रामाण्य निश्चित होता है। जिसमें उक्त अप्रामाण्य का कारण नहीं हो उसका प्रामाण्य स्वतः ही होता है। यही स्थिति अनुमान तथा आगमों के सम्बन्ध में भी है। वाक्यों में अर्थबोधकता स्वाभाविक होती है। वक्ता के भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव आदि दोषों के ज्ञान तथा विषयबाध से यहाँ भी अप्रामाण्य होता है। वेद अनादि और अपौरुषेय हैं। पुरुषनिर्मित न होने से उनमें पुरुषाश्रित भ्रम, प्रमाद आदि दूषणों से दूषित होने की सम्भावना ही नहीं है। उनका विषय अलौकिक होने से लौकिक प्रमाणों के द्वारा उनके विषय में बाध-ज्ञान भी सम्भव नहीं है; अतः वे स्वतःप्रमाण हैं। पौरुषेय रामायण, महाभारत, पुराण आदि में भी इतर प्रमाणों के समान प्रामाण्य स्वतः है। पौरुषेय होनेसे पुरुषाश्रित दोषों से दूषित होने की सम्भावना से अप्रामाण्य प्रसक्त होने पर उनके निर्माताओं के आप्तत्व और उनमें श्रुति-मूलकत्व का ज्ञान होने से अप्रामाण्य निरस्त हो जाता है। स्वतःप्रामाण्य ही स्थिर रह जाता है। जहाँ प्रत्यक्ष में श्रुतिमूलत्व उपलब्ध नहीं होता है वहाँ मूलभूत श्रुति का अनुमान किया जाता है। अनुमानप्रकार निम्नोक्त है— “इयं स्मृतिः श्रुतिमूलिका, स्मृतित्वाद्, मन्वादिस्मृतिवत् ।” विवादास्पद स्मृति भी श्रुतिमूलिका है, स्मृति होने से, मन्वादि स्मृति के समान। इस दृष्टि से सर्वज्ञकल्प, आप्त, आर्षविज्ञानसम्पन्न, श्रुतिनिष्ठ वाल्मीकि, व्यास आदि महर्षियों की कृतियों में भ्रम, प्रमाद आदि की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जहाँ पौरुषेय स्मृत्यादि वचनों के विरुद्ध कोई श्रुति-वचन मिलता है वहाँ श्रुतिविरुद्ध स्मृति वचनों का प्रत्यक्ष श्रुतिवचनों के अविरुद्ध ही अर्थ लगाना उचित है। यह सब बात “विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्” जै० सू० में स्पष्ट है। इसी लिए “औदुम्बरीं स्पृष्ट्वा उद्गायति” इस श्रुति के विरुद्ध होने से ही “औदुम्बरी सर्वां वेष्टयितव्या” यह कल्पसूत्र-वचन बाधित हो जाता है। स्कन्दपुराण भी व्यास निर्मित पुराण है। उसे अर्वाचीन मानना निराधार है। स्कन्दपुराण अष्टादश पुराणों में एक है। श्रीमद्भागवत आदि अन्य पुराणों में उसका उल्लेख है। साथ ही आनन्दरामायणादि प्रोक्त वाल्मीकि-कथा का मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, महाभारत आदि के वचनों से कोई विरोध भी नहीं है !

आप भी मानते हैं कि “महाभारत एवं मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण आदि उनके पूर्व जीवन के सम्बन्ध में मौन हैं ।” भारतीय साहित्य में सद्ग्रन्थों का समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है । मिताक्षरा, व्यवहारमयूख, पराशरमाधव, हेमाद्रि आदि निबन्धों की यही पद्धति है । पूर्वमीमांसा तथा उत्तरमीमांसा का भी यही दृष्टिकोण है । आधुनिक संविधानों ( Constitutions ) में विभिन्न धाराएँ टकराती हैं तो उनका समन्वय करना पड़ता है । सामान्य, विशेष या उत्सर्ग, अपवाद को ध्यान में रख कर ही बाध्य-बाधक भाव भी मानना पड़ता है । जिस विषय में महाभारत, वायुपुराण, विष्णुपुराण आदि मौन हैं उसके सम्बन्ध में स्कन्दपुराणादि की बात मानने में कोई दोष नहीं है । जो कालान्तर में दस्यु होता है वही कालान्तर में महर्षि भी हो सकता है । इससे यही सिद्ध होता है कि आत्मा स्वतः सच्चिदानन्दरूप है । देह, इन्द्रिय आदि उपाधियों के अनियन्त्रित होने से अशुद्ध-सा हो जाता है । उनके नियन्त्रण से शुद्ध हो जाता है। अतः किसी को निराश नहीं होना चाहिये । सच्छास्त्र के अभ्यास और सत्पुरुष के संग से पूर्ण उन्नति हो सकती है । स्कन्दपुराण आदि की कथाओं में भी विरोध नहीं है । तत् तत् तीर्थों तथा वैशाख मास आदि काल और पर्वों के माहात्म्य-वर्णन के प्रसङ्ग में कुछ भेद वर्णन असङ्गत नहीं है । व्यवहार में एक पुरुष आत्मकल्याणार्थ अनेक जन्मों में अनेक प्रकार के व्रत, जप, तप, तीर्थयात्रा आदि करता ही है । स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्ड के वैशाख-माहात्म्य में एक व्याध के वृत्तान्त में रामनाम-जप के फलस्वरूप तथा वरदान के अनुसार वह व्याध वल्मीक नामक ऋषि से उत्पन्न होकर वाल्मीकि बन कर यशस्वी होता है । कृणु नामक तपस्वी के शरीर के चारों ओर वल्मीक ( दीमकों द्वारा एकत्रित मिट्टी का अम्बार ) बन जाने से उसका वल्मीक नाम पड़ा था । व्याध उसी के पुत्ररूप में प्रकट होकर वाल्मीकि महर्षि बनकर आदि काव्य रामायण का रचयिता हुआ है । पुराणान्तरों के साथ एकवाक्यता कर उसी वल्मीक को भृगुवंशीय तथा प्रचेता ( वरुण ) का अवतार भी माना जा सकता है । स्कन्दपुराण के अवन्तीखण्ड के अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य (अ० २४) में अग्निशर्मा डाकू सप्तर्षियों को मार कर उनके वस्त्र आदि छीनने को उद्यत हुआ । ऋषियों ने परिवार से यह पूछने के लिये उसे घर भेजा कि क्या तुम लोग मेरे पापों के भी फलभागी होने को तैयार हो । परिवार के लोगों के अस्वीकार करने पर अग्निशर्मा को निर्वेद हुआ और ऋषियों के उपदेशानुसार वह ध्यान तथा जप करने लगा । उसके चारों ओर वल्मीक हो गया । बारह वर्ष के बाद ऋषियों ने उसे निकाला, उसका वाल्मीकि नाम रखा और रामायण-निर्माण का आदेश दिया । इस कथा को भी उसके साथ मिलाने से यह समझना चाहिए कि कृणु के पुत्र का नाम अग्निशर्मा था और वह दुःसङ्ग से डाकू हो गया था । वही ऋषियों के सम्पर्क से तपस्या एवं ध्यान में मग्न होने पर वल्मीक से प्रावृत्त होकर वाल्मीकि हुआ । नागरखण्ड के लोहजङ्घ की कथा के साथ भी एकवाक्यता कर देने से कृणु-पुत्र का ही लोहजङ्घ भी नाम रहा होगा । शेष कथा पूर्ववत् ही है । प्रभासखण्डीय कथा के अनुसार कृणु का ही नाम शमीमुख भी रहा होगा । उसके पुत्र अग्निशर्मा का वैशाख नाम भी रहा होगा । अध्यात्मरामायण की कथा भी पूर्वोक्त कथाओं से समन्वित हो सकती । वही किरातों की संगति से जन्मना ब्राह्मण होने पर भी किरातप्राय होकर डाकू हो गया था । मुख्य कथा समान होने पर किञ्चित् परिवर्तन अकिञ्चित्कर है । व्यास के समान ही विभिन्न कल्पों में वाल्मीकि भी विभिन्न होते हैं, अतः कल्पभेद से भी कुछ कथाभेद संभव है ।

८० रामायणमीमांसा तृतीय अश्वघोष के अनुसार च्यवन महर्षि वाल्मीकि के पूर्वज थे। च्यवन भृगुवंशीय थे, अतः वाल्मीकि का भी भार्गव होना स्वाभाविक है । 'वाल्मीकि शब्द की व्युत्पत्ति के लिये वाल्मीकि के पूर्व जीवन की कथा की कल्पना की गयी है', श्रीबुल्के का यह कहना सर्वथा असङ्गत है; क्योंकि सत्यनिष्ठ पुराणकार महर्षि मिथ्याभाषण से सदा ही घृणा करते थे । भरद्वाज, सगर आदि संज्ञाएँ भी अन्वर्थ ही थीं । पुराणोक्त आख्यायिकाओं को कल्पनामात्र कहना आतप्रामाण्य को ठुकराना है । 'कठेन प्रोक्तं काठकम्' आदि समाख्याएँ जैसे अन्वर्थ हैं, वैसे ही 'वाल्मीकि' आदि समाख्याओं को भी समझना चाहिए । जहाँ वास्तविकता नहीं होती वहाँ आख्यायिका भी नहीं होती । किसी वृक्ष की अश्वकर्ण समाख्या हो तो वह अन्वर्थ नहीं, क्योंकि वृक्ष से अश्व के कान का कोई सम्बन्ध नहीं है । वेद, पुराण आदि की आख्यायिकाओं के सम्बन्ध में यह नियम है कि यदि आख्यायिका किसी ऐसे अर्थ का प्रतिपादन करती हो जो प्रमाणान्तर से विरुद्ध है तो वह गुणवादिनी आख्यायिका अपने मुख्य अर्थ का प्रतिपादन न कर गौण अर्थ का ही प्रतिपादन करती है । जैसे—"आदित्यो यूपः" यह वचन आदित्य एवं यूप का अभेद बोधित करता है, पर वह प्रत्यक्ष से विरुद्ध है; अतः आदित्यसदृश यूप है यह गौण अर्थ ही उसका अर्थ समझना चाहिए । यदि आख्यायिका प्रमाणान्तरसिद्ध अर्थ को बोधित करती है—जैसे 'अग्निर्हिमस्य भेषजम्' (मा० सं० २३।१०) अग्नि जाड़े की ओषधि है, यह बात प्रत्यक्षसिद्ध ही है, तो यह वाक्य केवल अनुवादक है उसका स्वार्थ में प्रामाण्य नहीं है । परन्तु जो आख्यायिका या वाक्य प्रमाणान्तर से असिद्ध एवं अविरुद्ध अर्थ का बोधक होता है, उसका महातात्पर्य स्तुत्यादि में होने पर भी अवान्तरतात्पर्यगोचर स्वार्थ में भी प्रामाण्य होता है । इस दृष्टि से वाल्मीकि के पूर्वजीवनवृत्तान्त से किसी प्रमाण का विरोध नहीं है; क्योंकि उस सम्बन्ध में वे मौन हैं । प्रमाणान्तरों से उसकी सिद्धि भी नहीं है, अतः प्रमाणान्तरासिद्ध एवं प्रमाणान्तराविरुद्ध अर्थ में इन आख्यानों का प्रामाण्य सर्वथा मान्य है । अतएव मिथ्या आख्यान के द्वारा किसी नाम की व्युत्पत्ति प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती । भरद्वाज, सगर आदि नामों से सम्बन्धित आख्यािकाएँ भी मिथ्या नहीं हैं । लोक तथा वेद में ऐसी कोई व्युत्पत्ति नहीं है, जो मिथ्या कथा पर आधारित हो, प्रत्युत निरुक्त आदि में इन्द्र, अग्नि आदि नामों की अन्वर्थ ही व्युत्पत्तियाँ कही गयी हैं । बृहदारण्यक में प्राण का 'दूर्नाम' कहा गया है । उसका यथार्थ में ही यह अर्थ है कि आसङ्गरूप पाप्मा उससे दूर रहता है— सा वा एषा देवता दूर्नाम दूरं ह्यस्मान्मृत्युर्द्दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति य एवं वेद" (बृ० उ० १।३।९) सीता का नाम भी अन्वर्थ ही है । कृषि की अधिष्ठात्री देवी का अवतार होने तथा हलाग्र से प्रकट होने के कारण ही जनक-पुत्री का सीता नाम हुआ । वाल्मीकि का पूर्व जीवन दस्युजीवन होने पर भी जप, तप आदि से जो उनका पुनर्जीवन हुआ था उस नव जीवन के ही सम्बन्ध में वे कहते हैं कि मन, वचन तथा कर्म से कोई भी किल्बिष मैंने नहीं किया— "मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्वं न किल्बिषम् ॥” (वा० रा० ७।९६।२०) इसी तरह 'कौतूहल और प्रभावशाली बनाने के लिये वाल्मीकि के प्रसिद्ध ऋषिजिवन के विपरीत प्रारम्भिक दस्युजीवन बतलाया गया है' यह कथन भी सङ्गत नहीं हैं, क्योंकि मिथ्या-वर्णन से ऋषि का महत्त्व घट जाता है, बढ़ता नहीं । सूर और तुलसी के पूर्व जीवन का वर्णन भी यदि मिथ्या वर्णन है तो उससे उनमें प्रभाव

व्यक्त नहीं हो सकता, वैसे ही अशोक सम्राट् के पूर्व जीवन का वर्णन भी मिथ्या न होकर ऐतिहासिक तथ्यों पर ही आधारित है। जब वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में ही वाल्मीकि को राम का समकालीन कहा गया है, तब उस वर्णन को मिथ्या मानकर उनका अन्य काल ढूंढना सर्वथा असङ्गत और निराधार ही है। बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड को बाद का संस्करण मानना भी अप्रामाणिक ही है। किसी भी महान् नायक का जन्म, बाल्य- जीवन, शिक्षण, विवाह आदि तथा अन्तिम स्थिति का वर्णन स्वाभाविक ही है। "वाल्मीकि और राम दोनों प्राचीन हैं, इसलिये दोनों को समकालीन कह दिया गया" यह अटकल अशुद्ध है; क्योंकि यदि ऐसा हो तो राम और कृष्ण दोनों ही प्राचीन थे, उन्हें भी समकालिक क्यों नहीं माना गया ? राम और व्यास भी तो प्राचीन ही थे, फिर वाल्मीकि के समान ही व्यास को भी राम का समकालिक क्यों नहीं कहा गया ? अतएव "वाल्मीकि की भाषा जिसमें उन्होंने रामायण की रचना की थी, वह वैदिक संस्कृत न होकर लौकिक संस्कृत है; किन्तु राम का नाम ऋग्वेद में उपलब्ध होने से उनका वैदिक काल का होना सिद्ध है। यदि वाल्मीकि राम के समकालिक होते तो वैदिक युग में रहकर लौकिक संस्कृत में किस प्रकार अपने काव्य की रचना कर सकते थे। उनकी रचना वैदिक संस्कृत में ही होनी चाहिये, अतः वैदिककाल के पश्चात् और बौद्धकाल के ६०० ई० पूर्व ही रामायण का निर्माण मानना उचित है" यह कथन भी निस्सार है ? क्योंकि बौद्धकाल आदि कालों के समान कोई खास काल वैदिककाल नहीं है, कारण कि "वाचा विरूपनित्यया" ( ऋ० सं० ८।७५।६) तथा "अत एव च नित्यत्वम्" ( ब्र० सू० १।३।२९) के द्वारा वेद नित्य कहा गया है। अतएव वैदिक भाषा किसी समयविशेष की भाषा नहीं थी। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि उस समय की सभी रचनाएँ वैदिकभाषा में ही होती थीं और सब वेद ही होते थे; इसलिए यह सब कथन निष्प्रमाण एवं वेदविरुद्ध ही है। यह भी नियम नहीं है कि जिस ग्रन्थ में जिसका नाम आता है वह उस ग्रन्थकाल का ही होना चाहिये। हो सकता है, वेदकाल से भी प्राचीनकाल के राम रहे हों और यह भी हो सकता है कि त्रिकालज्ञ वेदकार ने भविष्य के राम का ही वर्णन किया हो । अथवा आपके अनुसार "जैसे तैत्तिरीयप्रातिशाख्य के वाल्मीकि से रामायण काव्य के रचयिता वाल्मीकि भिन्न हैं, वैसे ही वेद के राम से रामायण के राम भिन्न हैं।" वस्तुतः पूर्वकथन के अनुसार वेद किसी देश या काल के वर्गविशेष की किसी वैदिकभाषा के मनुष्य या देवों द्वारा रचित ग्रन्थ नहीं हैं; किन्तु वे अनादि ही हैं। हाँ, जिन सत्ययुग, त्रेतायुग आदि कालों में वेदों के पठन-पाठन एवं तदर्थानुष्ठान खूब प्रचलित होते हैं उन कालों को वैदिककाल कहा जा सकता है; परन्तु उस समय सब ग्रन्थ वैदिक भाषा में ही होते थे या वेद ही होते थे, यह नहीं कहा जा सकता। “मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्" ( आप० सू० ) के अनुसार 'मन्त्र' और 'ब्राह्मण' दोनों ही वेद हैं। उन वेदों के अनुसार ही विदित होता है कि वैदिक भाषा कभी किसी वर्गविशेष की भाषा थी ही नहीं । संस्कृत भाषा भी देवभाषा थी, मानुषी भाषा नहीं थी। इसी लिए संस्कृतभाषा को गीर्वाणवाणी या सुरभारती कहा जाता है। अतएव वैदिक यज्ञ, याग आदि में संस्कृत भाषा या देवभाषा बोलने का ही नियम है। उस बीच में यदि भूल से मानुषी भाषा का उच्चारण हो जाय तो प्रायश्चित्तस्वरूप वैष्णव यजुर्मन्त्र या वैष्णवी ऋचा के जप का विधान है— “स यदिदं पुरा मानुषीं वाचं व्याहरेत् ततो वैष्णवीमृचं वा यजुर्वा जपेद्यज्ञो वै विष्णुस्तद् यज्ञं पुनरारभते तस्यो हैवा प्रायश्चि- स्तिर्देवेभ्यस्त्वे त्वा गृह्णामीति देवानवदित्यु हि हविर्गृह्णते" ( श० ब्रा० १।१।४।६)। इससे यह भी सिद्ध होता है कि वेदकाल में संस्कृत भाषा ( सुरभारती ) और उससे भिन्न मानुषी भाषा भी थी। युगों के अनुसार विचार करने से वर्तमान मन्वन्तर के २४ वें त्रेता में श्रीरामचन्द्र का आविर्भाव हुआ था। ११

८२ रामायणमीमांसा तृतीय उसी समय महर्षि वाल्मीकि और उनके वर्तमान रामायण महाकाव्य का आविर्भाव हुआ । पुराणान्तरों के अनुसार वाल्मीकि और शतकोटिप्रविस्तर रामायण तो राम के पूर्व ही आविर्भूत हो चुके थे । स्कान्दे पातालखण्डे अयोध्यामाहात्म्ये तत्रत्यतीर्थाश्रमवर्णनप्रस्तावे-- “शापोक्त्या हृदि सन्तप्तं प्राचेतसमकल्मषम् । प्रोवाच वचनं ब्रह्मा तत्रागत्य सुसत्कृतः ॥ न निषादः स वै रामो मृगयां कर्तुमागतः । तस्य संवर्णनेनैव सुश्लोक्यस्त्वं भविष्यसि ॥ इत्युक्त्वा तु जगामाशु ब्रह्मलोकं सनातनः । ततः संवर्णयामास राघवं ग्रन्थकोटिभिः ॥” कोटिभिः शतकोटिभिः, चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरमित्यन्यत्रोक्तेः ( वा० रा० १।२।१५ रामाभिरामीयटीकायाम् ) । अर्थात् स्कन्दपुराण पातालखण्ड अयोध्यामाहात्म्य में वहाँ के तीर्थ और आश्रमों के वर्णन के सिलसिले में कहा है— महर्षि वाल्मीकि “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः” (वा० रा० १।२।१५) इत्यादि शाप देकर अन्तःसन्तप्त हो रहे थे उसी समय ब्रह्माजी आये । महर्षि से सत्कृत होकर उन्होंने कहा—“वह निषाद नहीं राम ही मृगया के लिए आये थे । तुम उनका चरित्र वर्णन करके सुश्लोक्य ( महायशस्वी ) होओगे ।” यह कहकर ब्रह्मा ब्रह्मलोक चले गये । महर्षि ने शतकोटि श्लोकों द्वारा रामचरित्र का वर्णन किया था । उसी में से कुश और लव के लिए चतुर्विंशत्साहस्रीसंहिता का उपदेश किया था ।

चतुर्थ अध्याय वाल्मीकिरामायण और महाभारत-रामोपाख्यान महाभारत वनपर्व के रामोपाख्यान के आधार के सम्बन्ध में पाश्चात्यों ने चार सम्भावनाएँ व्यक्त की हैं—( १ ) रामोपाख्यान रामायण का आधार है, ( २ ) रामोपाख्यान एक ऐसी रामायण पर निर्भर है, जो प्रचलित रामायण का पूर्वरूप है, ( ३ ) रामोपाख्यान वाल्मीकिरामायण का संक्षिप्त रूप है एवं ( ४ ) रामोपाख्यान तथा रामायण दोनों किसी सामान्य मूल स्रोत के स्वतन्त्र विकास हैं । पहला पक्ष ई० हाप्किन्स तथा ए० लुड्विग का है । इसके अनुसार रामोपाख्यान और रामायण में जो अन्तर है, वह यह सिद्ध करता है कि वह रामायण का संक्षिप्त रूप नहीं हो सकता । इसपर डा० याकोबी का उत्तर यह है कि यद्यपि रामोपाख्यान के रचयिता ने प्रचलित रामायण की हस्तलिपि का सहारा नहीं लिया, पर उसे अपने देश की प्रचलित रामायण कण्ठस्थ थी ! संक्षिप्त वर्णन में छोटे-मोटे अन्तर सहज ही आ गये होंगे, यह तीसरा मत है । अधिकांश विशेषज्ञ डा० याकोबी का मत मानते हैं। महाभारत के सम्पादक सुकण्ठकर ८६ स्थल उद्धृत करते हैं, जिनमें रामोपाख्यान और और रामायण में शाब्दिक साम्य मिलता है । साथ ही रामोपाख्यान के इन्द्रजित्-यज्ञ, काक-वृत्तान्त आदि रामायण के बिना समझ में नहीं आ सकते, अतः रामोपाख्यान का वृत्तान्त स्वतन्त्र नहीं है । महाभारत में रामायण तथा कवि वाल्मीकि का उल्लेख हुआ है; अतः रामायण को रामोपाख्यान का आधार मानने में कोई आपत्ति नही, यह बुल्के स्वीकार करते हैं । रामोपाख्यान के बालकाण्ड में राम तथा उनके भाइयों का जन्म वर्णित है । रामायण के पुत्रेष्टियज्ञ तथा पायस का उल्लेख नहीं है । सीता जनक-पुत्री हैं, उनकी अयोनजता का उल्लेख नहीं है । ब्रह्मर्षि, देवता आदि रावण से त्रस्त होकर ब्रह्मा की शरण लेते हैं । ब्रह्मा राम के अवतार का रहस्य बतलाते हैं । ब्रह्मा के आदेश से देवता विष्णु की सहायता के लिए ऋक्ष, वानर आदि रूपों में प्रकट होते हैं । चारों भाइयों के विवाह का वर्णन है, पर सीता को छोड़कर अन्य माण्डवी आदि का नाम-निर्देश नहीं है । २य काण्ड में गुह तथा अत्रि का उल्लेख नहीं हैं । कैकेयी को एक वरदान मिलना तथा मन्थरा को गन्धर्वी दुन्दुभी का अवतार कहा गया है । अरण्यकाण्ड में वाल्मीकिरामायण के समान ही कथा है; किन्तु विराध, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य, अयोमुखी और शबरी से सम्बन्धित सामग्री का अभाव है । किष्किन्धा में राम और सुग्रीव की मैत्री, वालीवध, सीतान्वेषणार्थ वानरों का प्रेषण तथा उनका पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशाओं से प्रत्यागमन वर्णित है । सुग्रीवसख्य के पहले राम की बल-परीक्षा का अभाव, वाली और सुग्रीव का एक ही द्वन्द्वयुद्ध इस अंश में रामायण से भिन्नता है । रामोपाख्यान के सुन्दरकाण्ड में हनुमान् एवं उनके साथियों की यात्रा के वृत्तान्त का वर्णन लौटकर स्वयं हनुमान् ने ही किया है । इसमें अविन्ध्य को अधिक महत्त्व दिया गया है। रामायण में सीता ने हनुमान् से अविन्ध्य की चर्चा की है—

८४ रामायणमीमांसा चतुर्थ “अविन्ध्यो नाम मेधावी विद्वान् राक्षसपुङ्गवः । धृतिमाञ्छीलवान् वृद्धो रावणस्य सुसम्मतः ॥ रामात् क्षयमनुप्राप्तं रक्षसां प्रत्यचोदयत् । न च तस्य स दुष्टात्मा शृणोति वचनं हितम् ॥” (वा० रा० ५।३६।१२,१३) अर्थात् अविन्ध्य विद्वान्, शीलवान् तथा राक्षसों में श्रेष्ठ है। उसने ‘राम से राक्षसों का क्षय प्राप्त है’ ऐसा कहा, पर दुष्ट रावण ने उसका हित वचन नहीं सुना । रामोपाख्यान में त्रिजटा ने सीता को अविन्ध्य का यह सन्देश सुनाया था कि राम और सुग्रीव की मैत्री हो गयी है। राम शीघ्र आ रहे हैं। ‘अविन्ध्यो नाम मेधावी वृद्धो राक्षसपुङ्गवः । स रामस्य हितान्वेषी·······” (म० भा० ३।२७०।५६) मेघनाद के मरने पर सीता के वध के लिए उद्यत रावण को अविन्ध्य रोकता है। रामायण में सुपार्श्व रोकता है। युद्धकाण्ड में भी कुछ परिवर्तन हैं। जैसे—रावण की सभा में राम के मायामय सिर की उपस्थिति एवं रावण और सुग्रीव का युद्ध आदि रामोपाख्यान में नहीं हैं। रामोपाख्यान में सेतु-बन्धन के वृत्तान्त में समुद्र ने स्वप्न में राम को दर्शन देकर सहायता देने का वचन दिया। वहाँ समुद्र के लिए राम के बाणप्रयोग का अभाव है। अङ्गद का दौत्य कार्य, लङ्कावरोध, पहला शरबन्ध, द्वन्द्वयुद्ध आदि रामोपाख्यान में नहीं हैं। रामो- पाख्यान के अनुसार कुम्भकर्ण का वध लक्ष्मण के द्वारा हुआ है। इन्द्रजित् द्वारा माया सीता की हत्या का उल्लेख रामोपाख्यान में नहीं है। नागपाश का वृत्तान्त रामायण में दो बार वर्णित है, पर रामोपाख्यान में एक ही बार कहा गया है। उसमें विभीषण राम और लक्ष्मण को प्रज्ञास्त्रसे स्वस्थ कर देते हैं एवं राम को कुबेर का भेजा हुआ जल देते हैं। उस जल से आँखें धोने से राम अदृश्य प्राणियों को देख सकते हैं। हनुमान् का पर्वत से ओषधियां लाने का उसमें उल्लेख नहीं है। रामोपाख्यान में लक्ष्मण को शक्ति लगने का वृत्तान्त नहीं है। उसमें रावण माया द्वारा राम और लक्ष्मण का रूप धारण किये हुए मायामय राक्षसों को उत्पन्न करता है। राम उनकी हत्या करते हैं। बाद में ब्रह्मास्त्र द्वारा रावण को ऐसा भस्म करते हैं कि उसकी राख भी शेष नहीं रहती। “न च भस्माप्यदृश्यत” ( म० भा० ३।२९०।३३ ) रामोपाख्यान में सीता की अग्निपरीक्षा भी नहीं है। उत्तरकाण्ड में रामकथा, अयोध्या आगमन, अभिषेक आदि का वर्णन है। जैसा कि पहले कहा गया है, शतकोटिप्रविस्तर रामायण महाकाव्य वाल्मीकि द्वारा वर्णित हुआ है। चौबीस हजार श्लोकोंवाला प्रसिद्ध वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ उसी का सार है। मार्कण्डेय, व्यास आदि महर्षि भी समाधिसम्पन्न तथा सर्वज्ञ हैं, अतः प्रसिद्ध रामायण में अनुक्त अंशों का वर्णन असङ्गत और अप्रामाणिक नहीं है। संक्षिप्त करने की दृष्टि से रामायणोक्त कई अंशों का वर्णन न करना भी सङ्गत ही है। अतएव व्यास द्वारा वर्णित

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ८५ पद्मपुराण में रामायणोक्त कथाओं से विलक्षण बहुत-सी कथाओं का वर्णन है । रामाश्वमेध नामक एक बहुत बड़ा भाग वहाँ वर्णित है । कल्पभेद से भी राम की अवतारकथाओं में भेद पुराणसम्मत है । महाभारत का रामोपाख्यान रामोपाख्यान के सहारे बुल्के रामायण के बहुत अंशों को प्रक्षिप्त कहते हैं । लङ्कादाह को वे प्रक्षिप्त कहते हैं । परन्तु रामोपाख्यान में लङ्कादाह का स्पष्ट उल्लेख है । सेतुबन्ध को भी वे असम्भव समझते हैं, पर वह भी रामो- पाख्यान में विद्यमान है । “प्रत्याजहार तां रामः सुग्रीवबलमाश्रितः । बद्ध्वा सेतुं समुद्रस्य दग्ध्वा लङ्कां शितैः शरैः ॥” ( म० भा० ३।२७४।३ ) अर्थात् राम सुग्रीव की सहायता से समुद्र में सेतु बाँधकर एवं हनुमान् द्वारा लङ्का को जलाकर सीता को लौटा लाये । रामोपाख्यान में सीता की अलौकिकता का भी वर्णन है— “विदेहराजो जनकः सीता तस्यात्मजा विभो । यां चकार स्वयं त्वष्टा रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥ ” ( म० भा० ३।२७४।९ ) इसमें असाधारणरूपवती होने से सीता को त्वष्टा द्वारा निर्मित कहा गया है । रावण को भी सर्वलोकस्रष्टा ब्रह्मा का प्रपौत्र एवं कुबेर का भ्राता कहा गया । पुलस्त्य से उनकी गोनाम्नो पत्नी में वैश्रवण की उत्पत्ति हुई । वैश्रवण पिता को छोड़कर पितामह की उपासना में संलग्न हुए, अतः वैश्रवण के प्रतीकारार्थ क्रुद्ध होकर पुलस्त्य अपने ही अर्धभाग से विश्रवा रूप में उत्पन्न हुए । उधर पितामह ने वैश्रवण पर प्रसन्न होकर उन्हें धनेशत्व, लोकपालत्व, अमरत्व, ईशानसख्य आदि महान् पद प्रदान किये, इतना ही नहीं उन्हें रक्षोगणान्वित लङ्का राजधानी, कामगामी पुष्पक विमान, यक्षाधिपत्य तथा राज- राजत्व भी प्रदान किया । पुलस्त्य के अर्धदेह से उत्पन्न विश्रवा वैश्रवण को सक्रोध दृष्टि से निहारते थे । उनको प्रसन्न करने के लिए राजराज कुबेर ने उन्हें सेवा के लिए पुष्पोत्कटा, राका और मालिनी नाम की तीन राक्षसियाँ प्रदान कीं । वे परस्पर उत्कर्ष की कामना से महर्षि की सेवा में तत्पर रहीं । उनपर संतुष्ट होकर विश्रवा ने उन्हें लोकपालों के सदृश पुत्र प्रदान किये । पुष्पोत्कटा से रावण और कुम्भकर्ण की, मालिनी से विभीषण की तथा राका से खर एवं शूर्पणखा की उत्पत्ति हुई । विभीषण सर्वाधिक रूपवान् तथा धार्मिक था । रावण महान् उत्साही तथा महाबलवान् था । कुम्भकर्ण सर्वाधिक बलवान्, मायावी तथा रणकोविद था । खर धनुर्धर और विक्रमी था तथा शूर्पणखा सिद्धिविघ्नकारिणी रौद्री थी । सभी वेदविद् तथा सम्यक् व्रतचारी थे एवं पिता के साथ गन्धमादन पर्वत पर रहते थे । नरवाहन कुबेर का वैभव देखकर ईर्ष्यावश तपस्या में लगकर सबने ब्रह्मा को सन्तुष्ट कर विविध वर प्राप्त किये । रावण सहस्र वर्ष की तपस्या पूर्ण होने पर अपना सिर अग्नि में होम कर देता है । इससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे अमरत्व छोड़कर इष्ट वर मांगने को कहा । उसने गन्धर्व, देव, असुर, यक्ष, राक्षस, सर्प, किन्नर और भूतों से अवध्यता का वरदान मांगा । ब्रह्मा ने कहा—मनुष्य को छोड़कर तुम्हें और किसी से भय नहीं होगा । विभीषण ने धर्मबुद्धि होने का वरदान माँगा । फलतः अमरत्व का वरदान उन्हें बिना माँगे ही मिल गया ।

८६ रामायणमीमांसा चतुर्थ दशग्रीव ने वैश्रवण पर आक्रमण कर लङ्का और पुष्पक विमान छीन लिये। वैश्रवण ने शाप दिया था कि वह विमान तुम्हारा वाहन न बन सकेगा, किन्तु जो तुम्हें मारेगा उसी का वाहन बनेगा— “शशाप तं वैश्रवणो न त्वामेतद् वहिष्यति। यस्तु त्वां समरे हन्ता तमेवैतद् वहिष्यति॥” ( म० भा० ३।२७५।३४ ) बुल्के पुष्पक विमान के वर्णन को प्रक्षेप मानते हैं। उनका यह भी तर्क है कि यदि पुष्पक होता तो रावण पुष्पक द्वारा ही सीता का हरण करता, परन्तु उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध है कि शापवश पुष्पक विमान रावण का वहन नहीं करता था। उपर्युक्त वचनों में रावण को दशग्रीव भी कहा गया है। कुम्भकर्ण को महती निद्रा का वरदान भी उक्त है। वहीं रावण को कामरूपी तथा आकाशगामी भी कहा गया है— “कामरूपी विहङ्गमः” ( म० भा० ३।२७५।३९ ) तथा “दशग्रीवः कामबलः” ( ३।२७५।४० ) उसे दशग्रीव एवं कामबल भी कहा गया है। अग्रिम २७६ वें अध्याय में अग्निसहित सभी देवता ब्रह्मा की शरण में जाते हैं। ब्रह्मा ने बताया, मेरे वरदान के प्रभाव से रावण देव और असुरों से अवध्य है। मेरी प्रार्थना से चतुर्भुज विष्णु ही अवतरित होकर उसका वध करेंगे— “तदर्थमवतीर्णोऽसौ मन्नियोगाच्चतुर्भुजः । विष्णुः प्रहरतां श्रेष्ठः स तत्कर्म करिष्यति॥” ( म० भा० ३।२७६।५ ) वहीं ब्रह्मा ने इन्द्र आदि देवताओं को भी यह आदेश दिया कि तुम लोग ऋक्षियों एवं वानरियों में काम- रूप बलान्वित वीरों को उत्पन्न कर विष्णु की सहायता करो। तदनुसार देवताओं ने साल, ताल, शिला आदि आयुधोंवाले वानरों को उत्पन्न किया। वे बल, वीर्य, विद्या, यश आदि में अपने पितृभूत देवों के ही तुल्य थे। वज्र- संहनन, कामबल-वीर्य तथा कामरूप थे। दस हजार हाथियों का बल रखते थे ( म० भा० ३।२७६।१६-१८ )। दुन्दुभी गन्धर्वी कुब्जा मन्थरा बनकर आयी थी। २७७ वें अध्याय में महाराज दशरथ के यहाँ राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के जन्म, ब्रह्मचर्य, वेद, उपवेद के अध्ययन और राम की विशेषता का वर्णन है। राम के यौवराज्य की तैयारी का विचार हुआ। राम मत्तमतङ्गगामी, महाबाहु, लोहिताक्ष, कम्बुग्रीव, महोरस्क, नीलकुञ्चितमूर्धज तथा दिव्यश्री से दीप्यमान थे। वे सब धर्मों में पारङ्गत तथा बुद्धि में बृहस्पति एवं बल में इन्द्र के तुल्य थे। सर्वविद्याविशारद, जितेन्द्रिय तथा अमित्रों के भी नेत्र एवं मन को हरण करनेवाले वे शत्रुओं को भी परम प्रिय लगते थे। “जितेन्द्रियममित्राणामपि दृष्टिमनोहरम् ॥” वे असाधुओं के नियन्ता तथा साधुओं के गोप्ता थे। धृतिमान्, अप्रधृष्य, जेता एवं अपराजित थे। ऐसे कौशल्यानन्दवर्धन पुत्र को पाकर राजा दशरथ परम प्रसन्न थे। पुरोहित वसिष्ठ की सम्मति से पुष्य नक्षत्र में अभिषेक के लिए संभारों के संग्रहार्थ राजा ने मन्त्रियों को आदेश दिया। यह सब सुनकर मन्थरा ने कैकेयी के सापत्न्य को उकसाया और कैकेयी ने प्रेमवशीभूत राजा से वरदान माँग लिया कि राम के लिए उपस्थापित अभिषेक की सामग्री से भरत का अभिषेक किया जाय और राम वन जायें। राजा दारुण विप्रिय वचन सुनकर कुछ न बोल सके। वीर्यवान् राम ने सब वृत्तान्त जानकर राजा की सत्यरक्षा के लिए वन को प्रस्थान किया। धनुष्मान् लक्ष्मण और पतिप्राणा जानकी ने उनका अनुगमन किया। राम के वन जाने पर राजा का देहान्त हो गया। कैकेयी ने भरत को ननिहाल से बुलाकर निष्कण्टक राज्य करने को कहा।