भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 1049 में से

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अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ७३ जो ऋग्वेद में प्रातिशाख्यज्ञानपूर्वक शिक्षित नहीं है, जो यजुर्वेद को धारण नहीं करता एवं जो सामवेद नहीं जानता, वह ऐसा भाषण नहीं कर सकता । "नूनं व्याकरणं कृत्स्नं अनेन बहुधा श्रुतम् । बहु व्याहरताऽनेन न किञ्चिदपशब्दितम् ॥" (वा० रा० ४।३।२९) निश्चय ही इसने सम्पूर्ण व्याकरण का खूब श्रवण (अध्ययन) किया है, तभी तो बहुत बोलते हुए भी इसने कहीं भी अपशब्द का प्रयोग नहीं किया । "न मुखे नेत्रयोश्चापि ललाटे च भ्रुवोस्तथा । अन्येष्वपि च सर्वेषु दोषः संविदितः क्वचित् ॥" (वा० रा० ४।३।३०) बोलते समय इसके नेत्र, ललाट, भ्रू तथा अन्य सभी अङ्गों में किसी प्रकार की विक्रिया परिलक्षित नहीं होती । "अविस्तरमसन्दिग्धमविलम्बितमव्यथम् । उरस्थं कण्ठगं वाक्यं वर्तते मध्यमस्वरम् ॥" (वा० रा० ४।३।३१) मध्यमारूप से उरस्थ, वैखरीरूप से कण्ठ में रहनेवाला न अत्यन्त उच्च और न अत्यन्त नीच, मध्यम स्वर का इसके द्वारा उच्चारित वाक्य अविस्तर, असन्दिग्ध, अविलम्बित और अव्यथ (श्रोता के कानों को व्यथित न करनेवाला) अर्थात् श्रुतिकटुदोष से रहित है । "संस्कारक्रमसम्पन्नामद्रुतामविलम्बिताम् । उच्चारयति कल्याणीं वाचं हृदयहारिणीम् ॥" (वा० रा० ४।३।३२) यह ऐसी हृदय को आह्लादित करनेवाली कल्याणी वाणी का उच्चारण करता है जो कि संस्कारक्रम- विशिष्ट है, अर्थात् विशिष्ट आनुपूर्वीरूप से पद, वाक्य आदि के ग्रहणार्थ अन्तःकरण में क्रमविशिष्ट वर्णाकार संस्कार उत्पन्न करनेवाली है; क्योंकि क्रमविशिष्ट वर्णों में ही पदत्व और वाक्यत्व सम्पन्न होता है, तभी वाक्यार्थ-बोध हो सकता है । क्रमहीन या विपरीत क्रम से वर्णों के संस्कारों से अभीष्ट वाक्यार्थ-बोध नहीं हो सकता । साथ ही यह वाणी अद्भुत और अविलम्बित अर्थात् मध्यमस्वरवाली है । "अनया चित्रया वाचा त्रिस्थानव्यञ्जनस्थया । कस्य नाराध्यते चित्तं उद्यतासेररेरपि ॥" (वा० रा० ४।३।३३) यह वाणी उर, कण्ठ, सिर इन तीन स्थानों में व्यक्त होकर श्रोताओं के श्रोत्रों से ग्राह्य होनेवाली है । ऐसी चित्र वाणी सुनकर ऐसा शत्रु भी कौन होगा जिसका चित्त भी अनुकूल न बन जायेगा । क्या ऐसा चित्रण कोई ऋक्, साम, यजु तथा शिक्षा, प्रातिशाख्य आदि से अपरिचित कवि कर सकता है ? इसी तरह श्रीहनुमान् के अध्ययन की चर्चा करते हुए कहा गया है— "असौ पुनर्व्याकरणं ग्रहीष्यन् सूर्योन्मुखः प्रष्टुमनाः कपीन्द्रः । उद्यद्गिरेरस्तगिरि जगाम ग्रन्थं महद् धारयनप्रमेयः ॥ १०

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