भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 151

७४ रामायणमीमांसा तृतीय ससूत्रवृत्त्यर्थपदं महार्थं ससंग्रहं सिद्ध्यति वै कपीन्द्रः । नह्यस्य कश्चित् सदृशोऽस्ति शास्त्रे वैशारदे छन्दगतौ तथैव ॥ सर्वासु विद्यासु तपोविधाने प्रस्पर्धतेऽयं हि गुरुं सुराणाम् ।” (वा० रा० ७।३६।४४-४६) उदयाचल से वे सूर्य के सम्मुख होकर उनसे प्रश्न करते हुए सूर्य से व्याकरण-वृत्ति, भाष्य, वातिक, संग्रह आदि के स्वरूपतः तथा अर्थतः महान् ग्रन्थों को धारण करते हुए रथ के सामने आकाश में अस्ताचल तक उलटे चलते रहे । पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा आदि द्वारा वेदार्थ के निर्णय एवं पाण्डित्य में हनुमान् से बढ़कर कोई भी नहीं है । हनुमान् सभी विद्याओं तथा तपोविधानों में बृहस्पति से स्पर्धा करते हैं । अतः आर्षज्ञानसम्पन्न महर्षि वाल्मीकि व्याकरण के आचार्य नहीं हो सकते, ऐसी कल्पना करना सर्वथा निर्मूल है । याकोबी आदि पाश्चात्य विद्वान् तो भारतीय संस्कारशून्य, आर्षज्ञान पर विश्वास न करनेवाले तथा दुरभिसन्धियुक्त हैं । वे वाल्मीकिरामायण की अर्वाचीनता और राम की अनीश्वरता सिद्ध करने में ही प्रयत्नशील रहते हैं । यद्यपि वेद, वेदान्त, मीमांसा, छन्द, अलङ्कार के आचार्यरूप में उनकी प्रशस्ति नहीं है, तो भी उनकी कृति ही उनके अगाध ज्ञान की गरिमा का परिचय दे रही है । रामायण के जिन अंशों में उनके महत्त्व का वर्णन है, दुर्भाग्यवश, उनको आधुनिक लोग क्षेपक सिद्ध करने में जुटे हुए हैं । उन्हीं लोगों ने बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त कहने का साहस किया है, जो सर्वथा उपेक्षणीय है । पुराणों की सामग्रियों से भी महर्षि के चरित्र में कोई विषमता नहीं सिद्ध होती है । एक प्रचण्ड दस्यु भी सत्सङ्ग से एक सुविज्ञ तपस्वी ही नहीं, किन्तु आर्षज्ञानसम्पन्न महर्षि भी हो ही सकता है— “सठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परस कुधातु सुहाई ।” (रा० मा० १।२।५) “वालमीकि नारद घटजोनी । निज निज मुखनि कही निज होनी ॥” (रा० मा० १।२।२) स्कन्दपुराण आदि अर्वाचीन सामग्री नहीं हैं और न ही उनका प्राचीन सामग्रियों के साथ कोई विरोध है । स्कन्दपुराण वैष्णव-खण्ड वैशाखमाहात्म्य के अनुसार एक व्याध ने शङ्ख नामक द्विज को बाँधकर उसके कुण्डल, छत्र, उपानद् आदि छीनकर छोड़ दिया । गरमी से शङ्ख के पैर जलते देख उसके मन में दया आयी, तो उसने अपना जीर्ण उपानद् उतार कर दे दिया । इसपर द्विज ने व्याध को आशीर्वाद दिया । शङ्ख ने उसे राम नाम का भी उपदेश दिया और आशीर्वाद में कहा कि तुम वाल्मीकि नाम से पृथ्वी पर विख्यात होगे । उसी सरोवर पर कृणु नाम का विप्र तप करता था । अधिक तप करने के कारण उसके ऊपर वल्मीक (दीमकों का बनाया मिट्टी का टीला) बन गया । लोग उसे वल्मीक कहते थे । किसी स्त्री के स्मरण से वीर्य-स्खलन हुआ । उसे किसी शैलूषी ने ग्रहण कर लिया । उसी से वाल्मीकि उत्पन्न हुए । दूसरी कथा आवन्त्यखण्ड के अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य में है । वहाँ वाल्मीकेश्वरमाहात्म्य का वर्णन है । सनत्कुमार के कथनानुसार भृगुवंशीय कोई सुमति नामक विप्र था । उसकी कौशिकी पत्नी से अग्निशर्मा उत्पन्न हुआ । वह वेदाध्ययन आदि से विमुख होकर दस्युओं में रहता था और दस्यु ही हो गया । एक बार तीर्थयात्रा के प्रसङ्ग से आये हुए सप्तर्षियों से उसका समागम हुआ । वह उनके भी छत्र, उपानद् आदि छीनने लगा । उन्होंने कहा, हम लोग