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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ७५ तीर्थयात्रार्थ आये हैं, तुम यह पाप क्यों कमाते हो ? उसने कहा, माता-पिता, भार्या, पुत्र आदि के भरणपोषणार्थ मैं ऐसा करता हूँ । उन्होंने कहा—उनसे पूछ लो, वे सब क्या तुम्हारे पाप में भी भागीदार होंगे । जब उसने जाकर पूछा तो सभी ने कहा कि तुम जो करते हो उसका फल तुम्हें ही भोगना पड़ेगा । हम उसके भागी नहीं हैं । यह सुनकर अग्निशर्मा निर्विण्ण होकर सप्तर्षियों की शरण में आ गया । उनके आदेशानुसार अग्नि का ध्यान और महामन्त्र का जप करता हुआ अविचल हो गया । उसके ऊपर वल्मीक बन गया । जब तीर्थयात्रा से वे मुनि उसी मार्ग से लौटे तो उन्होंने वल्मीक में से ध्वनि सुनी, खनन किया तो अग्निशर्मा निकला । उसी ने कुशस्थली में जाकर महेश्वर की आराधना की । उससे सिद्धि-लाभ कर रामायण महाकाव्य का निर्माण किया । तीसरी कथा नागरखण्ड में है । मुखार नामक उत्तम तीर्थ है, जहाँ उन श्रेष्ठ मुनियों की चोर से भेंट हुई जिनके प्रभाव से उस चोर ने सिद्धि प्राप्त की और रामायणकर्ता वाल्मीकि नाम से प्रख्यात हुआ । पूर्वकाल में चमत्कारपुर में माण्डव्यवंशोद्भव लोहजङ्घ नामक माता-पिता का भक्त द्विज रहता था । परिस्थितिवश चोर हो गया । ऋषिगणों की सङ्गति से उसे वैराग्य हुआ । पुलह नामक हास्यशील ऋषि ने उसे जाटघोटा नामक सिद्धिप्रद मन्त्र प्रदान किया । उसीसे उसको सिद्धि प्राप्त हुई । कहा है— “मन्त्रे तीर्थे द्विजे दैवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ । यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी ॥” मन्त्र, तीर्थ, द्विज, दैवज्ञ, भेषज तथा गुरु में जिसका जैसा विश्वास होता है उसको वैसी सिद्धि मिलती है । चौथी कथा प्रभासखण्ड देविकामाहात्म्य के मूलस्थान-माहात्म्य में है । पार्वती के प्रश्न पर शङ्कर ने बताया कि प्राचीनकाल में शमीमुख नामक द्विज को वैशाख नामक पुत्र हुआ । उसे माता-पिता की सेवा के अतिरिक्त कोई इच्छा नहीं थी । वह मनुष्यों को लूट कर माता-पिता तथा पत्नी का पालन करता था । एक बार उसे मार्ग में तीर्थ- यात्रापरायण सप्तर्षि मिले । इस कथा में अङ्गिरा ऋषि से उसका वार्तालाप हुआ । उस तस्कर के माता-पिता ने कहा जब तुम बालक थे, असमर्थ थे, तब हम दोनों ने तुम्हारा लालन-पालन किया था । अब हमारी वृद्धावस्था में तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम हमारी देखभाल करो । हम तुम्हारे पापकर्म के फलभागी नहीं हैं । इससे उसे वैराग्य हुआ । ऋषि ने उसे मन्त्र जपने को कहा । तदनन्तर उस गुरभुक्त की देविका के शुभ तट पर समाधि लग गयी । सहस्र वर्ष बाद ऋषियों ने उसे वल्मीक से निकाला । इस कथा के अनुसार ब्राह्मणों ने वैशाख के सुप्त शरीर पर योगसम्भव भेषजों का मर्दन किया । ऋषियों के आशीर्वाद से वह वाल्मीकि महर्षि हुआ । उसकी जिह्वा पर स्वच्छन्द सरस्वती विचरण करने लगी और उसने रामायण की रचना की । अध्यात्मरामायण के अनुसार महर्षि वाल्मीकि ने अपने आश्रम में आये हुए श्रीराम का पूजन और स्तवन करके अपनी कथा सुनाई थी—मैं पहले किरातों में उत्पन्न होकर उन्हीं में पला और बड़ा हुआ । केवल जन्म से ही मैं द्विज था । शूद्रा के सम्पर्क से मेरे बहुत से पुत्र उत्पन्न हुए । मैं चोर हो गया । एक बार विराट् वन में मैंने सप्तर्षियों को देखा । मैं उनके वस्त्रादि लूटने के लिए उनके पीछे दौड़ा । मुनियों ने कहा—द्विजाधम, क्यों दुःखी हो रहा है । मैंने कहा—कुछ लेने के लिए, क्योंकि मेरे स्त्री-पुत्र आदि भूखे हैं । ऋषियों ने कहा—जाओ उनसे पूछ आओ कि वे तुम्हारे पापसञ्चय में भी भागी होंगे क्या ? मैंने जाकर उनसे पूछा तो उत्तर मिला कि पाप के भागी तुम्हीं होओगे। इसपर मुझे निर्वेद हुआ । मुनियों के दर्शन से मेरा अन्तःकरण शुद्ध हो गया था । मुनियों ने कहा— भद्र ! उठो, तुम्हारा सत्समागम सफल हो गया । तुम 'मरा' शब्द को तब तक जपो जब तक हम पुनः यहाँ न आ जायें । मैंने वैसा ही किया । मैं बाह्य जगत् भूल गया । निश्चलरूप से खड़ा रहने के कारण मुझपर वल्मीक हो गया ।