भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 153

सहस्रों युगों के बाद ऋषि पुनः आये ओर मुझसे बोले--बाहर निकलो । मैं नीहार से भास्कर की भाँति वल्मीक से बाहर निकला । मुनियों ने कहा--अब तुम वाल्मीकि मुनीश्वर हो गये हो । यह कह कर वे दिव्यगति ऋषि चले गये । हे राघव ! यह सब आपके नाम का प्रभाव है । तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार देवों के साथ भास्कर और विष्णु उन्हें रामायणकार होने का आशीर्वाद देते हैं । शेष कथा अध्यात्मरामायण के तुल्य ही है । आनन्दरामायण के अनुसार स्तम्भ नामक श्रीवत्सगोत्री ब्राह्मण महापापी तथा शूद्राचरणरत था । वह वेश्यारत भी था । किसी दिन उसके यहाँ एक ब्राह्मण का सत्कार हुआ । उसी से उसका उद्धार हुआ । वह जन्मान्तर में व्याध हुआ । उसने पम्पातीर पर शङ्ख का सब कुछ छीन लिया । शेष कथा स्कन्दपुराण की प्रथम कथा जैसी ही है । कृत्तिवासीय रामायण में उस व्याध का नाम रत्नाकर तथा उसके पिता का नाम च्यवन था । यहाँ सप्तर्षियों के स्थान पर उसे ब्रह्मा और नारद मिलते हैं । ब्रह्मा के आदेशानुसार वह नदी में स्नान के लिए जाता है । उसके देखनेमात्र से नदी सूख जाती है । ब्रह्मा उसे राम नाम का उपदेश करते हैं । किन्तु वह उसका उच्चारण न कर सकने के कारण 'मरा' नाम जपता है । मत्स्यपुराण तथा पद्मपुराण में इक्ष्वाकुवंशीय नृपतियों के प्रसङ्ग में जहाँ रामचरित वर्णित है, वहाँ कहा गया है कि भार्गवश्रेष्ठ वाल्मीकि ने रामचरित को निबद्ध किया है । विष्णुपुराण के अनुसार भृगुवंशी ऋक्ष व्यास हुए हैं जो वाल्मीकि कहलाते हैं । वायुपुराण के अनुसार माहेश्वरावतारयोगवर्णन के अन्तर्गत ऋक्ष के विषय में उल्लेख है कि वह चौबीसवें द्वापर में व्यास बनेगा । कूर्मपुराण के अनुसार तेईसवें व्यास तृणबिन्दु के पश्चात् वाल्मीकि का वर्णन है । महाभारत में वाल्मीकि का परिचय बहुलता से मिलता है । आदिपर्व में आस्तीक जनमेजय की प्रशंसा करते हुए कहता है—राजन् ! तुम वाल्मीकि के समान गम्भीर एवं धैर्यशाली हो, वसिष्ठ के समान जितक्रोध हो, इन्द्र के समान ऐश्वर्यशाली हो एवं कान्ति में नारायण के तुल्य हो । सभापर्व में शत्रु की दिव्य सभा का वर्णन करते हुए वहाँ उपस्थित जिन व्यक्तियों का नामोल्लेख है उनमें एक नाम वाल्मीकि का भी है । आरण्यकपर्व में जो ऋषि प्रतीक्षा कर रहे थे उनमें वाल्मीकि ऋषि का नाम प्रथम आता है । ( १ ) “वाल्मीकिर्यस्य चरितं चक्रे भार्गवसत्तमः ।।” (पद्मपु० ५।८।१५५; मत्स्यपु० १२।५१ ) ( २ ) “ऋक्षोऽभूद् भार्गवस्तस्माद् वाल्मीकिर्योऽभिधीयते ।।” (वि० पु० ३।३।१८) ( ३ ) “परिवर्त्ते चतुर्विंशे ऋक्षो व्यासो भविष्यति ।।” (वायुपु० ३३।१६४) ( ४ ) “तृणबिन्दुस्त्रयोविंशे वाल्मीकिस्तु ततः परम् ।” (कूर्मपु० ) ( ५ ) “वाल्मीकिवत्ते निभृतं स्ववीर्यं वसिष्ठवत्ते नियतश्च कोपः । प्रभुत्वमिन्द्रेण समं मतं मे द्युतिश्च नारायणवद् विभाति ।।” ( म० भा० १।५५।१४ ) ( ६ ) “सहदेवः सुनीथश्च वाल्मीकिश्च महातपाः । समीकः सत्यवाक् चैव प्रचेताः सत्यसंगरः ।।” (म० भा० २।७।१६ ) ( ७ ) “ऋषिमुख्याः सदा यत्र वाल्मीकिस्त्वथ काश्यपः । आत्रेयः कुण्डजठरो विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥ एते ऋषिवराः सर्वे त्वत्प्रतीक्षास्तपोधनाः ।” ( म० भा० ३।८५।११९-१२२