भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ७७ इसी तरह उद्योगपर्व के भगवद्यानपर्व में कौरवों के सदन जाने से पूर्व जिन महर्षियों ने कृष्ण की पूजा की थी उनमें भी वाल्मीकि का नाम है— "वसिष्ठो वामदेवश्च भूरिद्युम्नो गयः क्रथः । शुक्रनारदवाल्मीका मरुतः कुशिको भृगुः ।। एवमेतैर्महाभागैर्महर्षिगणसार्थिभिः । पूजितः प्रययौ कृष्णः कुरूणां सदनं प्रति ।।" ( म० भा० ५।८३।२७-२९ ) द्रोणपर्व के अन्तर्गत जयद्रथवधपर्व में वाल्मीकि का श्लोक भी उद्धृत है । “अपि चायं पुरा गीतः श्लोको वाल्मीकिना भुवि । पीडाकरममित्राणां यत् स्यात् कर्तव्यमेव तत् ॥” ( म० भा० ७।१४३।६८ ) शान्तिपर्व के राजधर्मपर्व में कहा गया है--हे भारत ! रामचरित वर्णन में महात्मा भार्गव ने यह श्लोक कहा है । पहले राजा को प्राप्त करना चाहिये और फिर भार्या और फिर धन को प्राप्त करना चाहिये । क्योंकि राजा के न होने पर भार्या और धन कैसे रह सकेंगे ? "श्लोकश्चायं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना । आख्याते रामचरिते नृपति प्रति भारत ।। राजानं प्रथमं विन्देत्ततो भार्यां ततो धनम् । राजन्यसति लोकस्य कुतो भार्या कुतो धनम् ।।” ( म० भा० १२।५७।४०-४१ ) इसी शान्तिपर्व में युधिष्ठिर के प्रश्न पर भीष्म ने कहा है— असित, देवल, महातपा वाल्मीकि और मार्कण्डेय नारायण का अद्भुत वृत्तान्त कहते हैं : “असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः । मार्कण्डेयश्च गोविन्दे कथयन्त्यद्भुतं महत् ।।” ( म० भा० १२।२०७।४ ) कुछ लोग कहते हैं कि "स्कन्दपुराण तथा अध्यात्मरामायण जैसी अर्वाचीन कृतियों में वाल्मीकि की जो कथाएँ मिलती हैं, जिनमें उन्हें दस्यु बताया गया है; उनका मत्स्यपुराण, वायुपुराण, विष्णुपुराण, महाभारत आदि में संकेत भी नहीं है। रामायण एवं प्राचीन पुराण तथा भारत उनके पूर्वजीवन के सम्बन्ध में मौन हैं। उसके अनुसार वाल्मीकि के सम्बन्ध में इस प्रकार की कथा रचने के दो कारण हैं— १. वाल्मीकि नाम की व्युत्पत्ति अपेक्षित थी । पुराणकार किसी व्यक्ति का नाम समझाने के लिए कथा गढ़ लेते थे । जैसे जनक-पुत्री सीता के नाम को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने वैदिक सीता ( हलकृष्ट भूमि ) से सम्बन्ध जोड़कर उसका जन्म ही भूमि से करा दिया । यही बात इक्ष्वाकु, भरद्वाज, सगर आदि के बारे में भी है । इसी तरह वाल्मीकि का अभिधान समझाने के लिए भी किया गया । २. किसी महापुरुष के जीवन का लोगों पर पूर्णरूप से प्रभाव डालने की प्रवृत्ति पुराणों की रही । उसे अधिक कौतूहलपूर्ण और प्रभावशाली बनाने के लिए यह भी परिपाटी थी कि जो जिस बात के लिए प्रसिद्ध था, प्रारम्भ में उसको विपरीत बताया जाता था । सम्राट् अशोक भारत के इतिहास में धर्मात्मा तथा दयालु नरेश के रूप में विख्यात रहा है । इसी कारण उसे प्रारम्भिक जीवन में क्रूर या निर्दय चित्रित किया गया है । कालिदास