भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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रामायणमीमांसा तृतीय

संस्कृत-साहित्य के विद्वान् कवि हो चुके हैं, बाल्यावस्था में उन्हें मूर्ख बताया गया है, क्योंकि विद्वान् का विपरीत मूर्ख ही होता है। तुलसीदास तथा सूरदास त्यागी, तपस्वी एवं महान् ग्रन्थों के प्रणेता थे। उन्हें पूर्वजीवन में विलासी बताया गया है। ऐसे ही ऋषि वाल्मीकि को भी प्रारम्भ में दस्यु माना गया है, क्योंकि ऋषि का वैपरीत्य दस्यु ही हो सकता है। राजाओं की परम्परा का भाट-चारणों को स्मरण रखना पड़ता था, परन्तु ऋषियों के निमित्त ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। जो ख्यातिप्राप्त होते हैं उन्हीं का नाम सुरक्षित रहता है।” यद्यपि उक्त बातें आपातरमणीय हैं; किन्तु प्रमाण-शून्य तथा वेद, पुराण, भारत आदि शास्त्रों से सर्वथा विरुद्ध हैं। वस्तुतः अतीत घटनाओं के सम्बन्ध में प्रामाणिक इतिहास ही प्रमाण होता है। अटकलबाजी से तो विपरीत दिशा में भी पहुँचा जा सकता है। भारतीय साहित्य में वेद, पुराण, महाभारत, रामायण आदि का धर्म, ब्रह्म तथा परम्परा, सदाचार आदि के सम्बन्ध में परम प्रामाण्य है। आधुनिक इतिहास में भ्रान्ति भी हो सकती है, परन्तु वाल्मीकि, वसिष्ठ, पराशर, व्यास आदि ऋषियों के द्वारा निर्मित ग्रन्थों में अप्रामाण्य की कल्पना ही निराधार है। प्रत्यक्षादि सभी प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः होता है। यदि प्रमाणों का प्रामाण्य परतः होगा तब तो उस प्रमाण का भी प्रामाण्य परतः होगा, ऐसी स्थिति में अनवस्था दोष होगा। यदि अन्त में किसी प्रमाण का स्वतःप्रामाण्य मानना ही है तो प्रथम का ही स्वतःप्रामाण्य क्यों न मान लिया जाय ? अप्रामाण्य परतः विषयबाध या कारण-दोष- ज्ञान से होता है। जैसे चक्षुरूप कारण में पित्त-दोष के ज्ञान से “पीतः शङ्खः” इस ज्ञान का अप्रामाण्य निश्चित होता है। “नेदं रजतम्” इस बाध-ज्ञान से “इदं रजतम्” इस ज्ञान का अप्रामाण्य निश्चित होता है। जिसमें उक्त अप्रामाण्य का कारण नहीं हो उसका प्रामाण्य स्वतः ही होता है। यही स्थिति अनुमान तथा आगमों के सम्बन्ध में भी है। वाक्यों में अर्थबोधकता स्वाभाविक होती है। वक्ता के भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव आदि दोषों के ज्ञान तथा विषयबाध से यहाँ भी अप्रामाण्य होता है। वेद अनादि और अपौरुषेय हैं। पुरुषनिर्मित न होने से उनमें पुरुषाश्रित भ्रम, प्रमाद आदि दूषणों से दूषित होने की सम्भावना ही नहीं है। उनका विषय अलौकिक होने से लौकिक प्रमाणों के द्वारा उनके विषय में बाध-ज्ञान भी सम्भव नहीं है; अतः वे स्वतःप्रमाण हैं। पौरुषेय रामायण, महाभारत, पुराण आदि में भी इतर प्रमाणों के समान प्रामाण्य स्वतः है। पौरुषेय होनेसे पुरुषाश्रित दोषों से दूषित होने की सम्भावना से अप्रामाण्य प्रसक्त होने पर उनके निर्माताओं के आप्तत्व और उनमें श्रुति-मूलकत्व का ज्ञान होने से अप्रामाण्य निरस्त हो जाता है। स्वतःप्रामाण्य ही स्थिर रह जाता है। जहाँ प्रत्यक्ष में श्रुतिमूलत्व उपलब्ध नहीं होता है वहाँ मूलभूत श्रुति का अनुमान किया जाता है। अनुमानप्रकार निम्नोक्त है— “इयं स्मृतिः श्रुतिमूलिका, स्मृतित्वाद्, मन्वादिस्मृतिवत् ।” विवादास्पद स्मृति भी श्रुतिमूलिका है, स्मृति होने से, मन्वादि स्मृति के समान। इस दृष्टि से सर्वज्ञकल्प, आप्त, आर्षविज्ञानसम्पन्न, श्रुतिनिष्ठ वाल्मीकि, व्यास आदि महर्षियों की कृतियों में भ्रम, प्रमाद आदि की कल्पना ही नहीं की जा सकती। जहाँ पौरुषेय स्मृत्यादि वचनों के विरुद्ध कोई श्रुति-वचन मिलता है वहाँ श्रुतिविरुद्ध स्मृति वचनों का प्रत्यक्ष श्रुतिवचनों के अविरुद्ध ही अर्थ लगाना उचित है। यह सब बात “विरोधे त्वनपेक्षं स्यादसति ह्यनुमानम्” जै० सू० में स्पष्ट है। इसी लिए “औदुम्बरीं स्पृष्ट्वा उद्गायति” इस श्रुति के विरुद्ध होने से ही “औदुम्बरी सर्वां वेष्टयितव्या” यह कल्पसूत्र-वचन बाधित हो जाता है। स्कन्दपुराण भी व्यास निर्मित पुराण है। उसे अर्वाचीन मानना निराधार है। स्कन्दपुराण अष्टादश पुराणों में एक है। श्रीमद्भागवत आदि अन्य पुराणों में उसका उल्लेख है। साथ ही आनन्दरामायणादि प्रोक्त वाल्मीकि-कथा का मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण, महाभारत आदि के वचनों से कोई विरोध भी नहीं है !