भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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आप भी मानते हैं कि “महाभारत एवं मत्स्यपुराण, विष्णुपुराण आदि उनके पूर्व जीवन के सम्बन्ध में मौन हैं ।” भारतीय साहित्य में सद्ग्रन्थों का समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है । मिताक्षरा, व्यवहारमयूख, पराशरमाधव, हेमाद्रि आदि निबन्धों की यही पद्धति है । पूर्वमीमांसा तथा उत्तरमीमांसा का भी यही दृष्टिकोण है । आधुनिक संविधानों ( Constitutions ) में विभिन्न धाराएँ टकराती हैं तो उनका समन्वय करना पड़ता है । सामान्य, विशेष या उत्सर्ग, अपवाद को ध्यान में रख कर ही बाध्य-बाधक भाव भी मानना पड़ता है । जिस विषय में महाभारत, वायुपुराण, विष्णुपुराण आदि मौन हैं उसके सम्बन्ध में स्कन्दपुराणादि की बात मानने में कोई दोष नहीं है । जो कालान्तर में दस्यु होता है वही कालान्तर में महर्षि भी हो सकता है । इससे यही सिद्ध होता है कि आत्मा स्वतः सच्चिदानन्दरूप है । देह, इन्द्रिय आदि उपाधियों के अनियन्त्रित होने से अशुद्ध-सा हो जाता है । उनके नियन्त्रण से शुद्ध हो जाता है। अतः किसी को निराश नहीं होना चाहिये । सच्छास्त्र के अभ्यास और सत्पुरुष के संग से पूर्ण उन्नति हो सकती है । स्कन्दपुराण आदि की कथाओं में भी विरोध नहीं है । तत् तत् तीर्थों तथा वैशाख मास आदि काल और पर्वों के माहात्म्य-वर्णन के प्रसङ्ग में कुछ भेद वर्णन असङ्गत नहीं है । व्यवहार में एक पुरुष आत्मकल्याणार्थ अनेक जन्मों में अनेक प्रकार के व्रत, जप, तप, तीर्थयात्रा आदि करता ही है । स्कन्दपुराण के वैष्णवखण्ड के वैशाख-माहात्म्य में एक व्याध के वृत्तान्त में रामनाम-जप के फलस्वरूप तथा वरदान के अनुसार वह व्याध वल्मीक नामक ऋषि से उत्पन्न होकर वाल्मीकि बन कर यशस्वी होता है । कृणु नामक तपस्वी के शरीर के चारों ओर वल्मीक ( दीमकों द्वारा एकत्रित मिट्टी का अम्बार ) बन जाने से उसका वल्मीक नाम पड़ा था । व्याध उसी के पुत्ररूप में प्रकट होकर वाल्मीकि महर्षि बनकर आदि काव्य रामायण का रचयिता हुआ है । पुराणान्तरों के साथ एकवाक्यता कर उसी वल्मीक को भृगुवंशीय तथा प्रचेता ( वरुण ) का अवतार भी माना जा सकता है । स्कन्दपुराण के अवन्तीखण्ड के अवन्तीक्षेत्र-माहात्म्य (अ० २४) में अग्निशर्मा डाकू सप्तर्षियों को मार कर उनके वस्त्र आदि छीनने को उद्यत हुआ । ऋषियों ने परिवार से यह पूछने के लिये उसे घर भेजा कि क्या तुम लोग मेरे पापों के भी फलभागी होने को तैयार हो । परिवार के लोगों के अस्वीकार करने पर अग्निशर्मा को निर्वेद हुआ और ऋषियों के उपदेशानुसार वह ध्यान तथा जप करने लगा । उसके चारों ओर वल्मीक हो गया । बारह वर्ष के बाद ऋषियों ने उसे निकाला, उसका वाल्मीकि नाम रखा और रामायण-निर्माण का आदेश दिया । इस कथा को भी उसके साथ मिलाने से यह समझना चाहिए कि कृणु के पुत्र का नाम अग्निशर्मा था और वह दुःसङ्ग से डाकू हो गया था । वही ऋषियों के सम्पर्क से तपस्या एवं ध्यान में मग्न होने पर वल्मीक से प्रावृत्त होकर वाल्मीकि हुआ । नागरखण्ड के लोहजङ्घ की कथा के साथ भी एकवाक्यता कर देने से कृणु-पुत्र का ही लोहजङ्घ भी नाम रहा होगा । शेष कथा पूर्ववत् ही है । प्रभासखण्डीय कथा के अनुसार कृणु का ही नाम शमीमुख भी रहा होगा । उसके पुत्र अग्निशर्मा का वैशाख नाम भी रहा होगा । अध्यात्मरामायण की कथा भी पूर्वोक्त कथाओं से समन्वित हो सकती । वही किरातों की संगति से जन्मना ब्राह्मण होने पर भी किरातप्राय होकर डाकू हो गया था । मुख्य कथा समान होने पर किञ्चित् परिवर्तन अकिञ्चित्कर है । व्यास के समान ही विभिन्न कल्पों में वाल्मीकि भी विभिन्न होते हैं, अतः कल्पभेद से भी कुछ कथाभेद संभव है ।