भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 157

८० रामायणमीमांसा तृतीय अश्वघोष के अनुसार च्यवन महर्षि वाल्मीकि के पूर्वज थे। च्यवन भृगुवंशीय थे, अतः वाल्मीकि का भी भार्गव होना स्वाभाविक है । 'वाल्मीकि शब्द की व्युत्पत्ति के लिये वाल्मीकि के पूर्व जीवन की कथा की कल्पना की गयी है', श्रीबुल्के का यह कहना सर्वथा असङ्गत है; क्योंकि सत्यनिष्ठ पुराणकार महर्षि मिथ्याभाषण से सदा ही घृणा करते थे । भरद्वाज, सगर आदि संज्ञाएँ भी अन्वर्थ ही थीं । पुराणोक्त आख्यायिकाओं को कल्पनामात्र कहना आतप्रामाण्य को ठुकराना है । 'कठेन प्रोक्तं काठकम्' आदि समाख्याएँ जैसे अन्वर्थ हैं, वैसे ही 'वाल्मीकि' आदि समाख्याओं को भी समझना चाहिए । जहाँ वास्तविकता नहीं होती वहाँ आख्यायिका भी नहीं होती । किसी वृक्ष की अश्वकर्ण समाख्या हो तो वह अन्वर्थ नहीं, क्योंकि वृक्ष से अश्व के कान का कोई सम्बन्ध नहीं है । वेद, पुराण आदि की आख्यायिकाओं के सम्बन्ध में यह नियम है कि यदि आख्यायिका किसी ऐसे अर्थ का प्रतिपादन करती हो जो प्रमाणान्तर से विरुद्ध है तो वह गुणवादिनी आख्यायिका अपने मुख्य अर्थ का प्रतिपादन न कर गौण अर्थ का ही प्रतिपादन करती है । जैसे—"आदित्यो यूपः" यह वचन आदित्य एवं यूप का अभेद बोधित करता है, पर वह प्रत्यक्ष से विरुद्ध है; अतः आदित्यसदृश यूप है यह गौण अर्थ ही उसका अर्थ समझना चाहिए । यदि आख्यायिका प्रमाणान्तरसिद्ध अर्थ को बोधित करती है—जैसे 'अग्निर्हिमस्य भेषजम्' (मा० सं० २३।१०) अग्नि जाड़े की ओषधि है, यह बात प्रत्यक्षसिद्ध ही है, तो यह वाक्य केवल अनुवादक है उसका स्वार्थ में प्रामाण्य नहीं है । परन्तु जो आख्यायिका या वाक्य प्रमाणान्तर से असिद्ध एवं अविरुद्ध अर्थ का बोधक होता है, उसका महातात्पर्य स्तुत्यादि में होने पर भी अवान्तरतात्पर्यगोचर स्वार्थ में भी प्रामाण्य होता है । इस दृष्टि से वाल्मीकि के पूर्वजीवनवृत्तान्त से किसी प्रमाण का विरोध नहीं है; क्योंकि उस सम्बन्ध में वे मौन हैं । प्रमाणान्तरों से उसकी सिद्धि भी नहीं है, अतः प्रमाणान्तरासिद्ध एवं प्रमाणान्तराविरुद्ध अर्थ में इन आख्यानों का प्रामाण्य सर्वथा मान्य है । अतएव मिथ्या आख्यान के द्वारा किसी नाम की व्युत्पत्ति प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती । भरद्वाज, सगर आदि नामों से सम्बन्धित आख्यािकाएँ भी मिथ्या नहीं हैं । लोक तथा वेद में ऐसी कोई व्युत्पत्ति नहीं है, जो मिथ्या कथा पर आधारित हो, प्रत्युत निरुक्त आदि में इन्द्र, अग्नि आदि नामों की अन्वर्थ ही व्युत्पत्तियाँ कही गयी हैं । बृहदारण्यक में प्राण का 'दूर्नाम' कहा गया है । उसका यथार्थ में ही यह अर्थ है कि आसङ्गरूप पाप्मा उससे दूर रहता है— सा वा एषा देवता दूर्नाम दूरं ह्यस्मान्मृत्युर्द्दूरं ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति य एवं वेद" (बृ० उ० १।३।९) सीता का नाम भी अन्वर्थ ही है । कृषि की अधिष्ठात्री देवी का अवतार होने तथा हलाग्र से प्रकट होने के कारण ही जनक-पुत्री का सीता नाम हुआ । वाल्मीकि का पूर्व जीवन दस्युजीवन होने पर भी जप, तप आदि से जो उनका पुनर्जीवन हुआ था उस नव जीवन के ही सम्बन्ध में वे कहते हैं कि मन, वचन तथा कर्म से कोई भी किल्बिष मैंने नहीं किया— "मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्वं न किल्बिषम् ॥” (वा० रा० ७।९६।२०) इसी तरह 'कौतूहल और प्रभावशाली बनाने के लिये वाल्मीकि के प्रसिद्ध ऋषिजिवन के विपरीत प्रारम्भिक दस्युजीवन बतलाया गया है' यह कथन भी सङ्गत नहीं हैं, क्योंकि मिथ्या-वर्णन से ऋषि का महत्त्व घट जाता है, बढ़ता नहीं । सूर और तुलसी के पूर्व जीवन का वर्णन भी यदि मिथ्या वर्णन है तो उससे उनमें प्रभाव