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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पहले वे चमत्कार-पुर में भार्गव-वंश में लोहजङ्घ नामक ब्राह्मण हुए थे। उन्हीं का अन्य नाम ऋक्ष भी था। कुछ समय तक वे माता-पिता की सेवा करते हुए गृह में रहे। पश्चात् साध्वी पतिव्रता भार्या को त्याग कर, ब्राह्म-वृत्ति को छोड़कर चौर्य-कर्म करने लगे। अनन्तर नारद के उपदेश से वे तपस्या में लग गये और उनके शरीर पर वल्मीक जम गया। बहुत काल के पश्चात् नारद की ही आज्ञा से वे वल्मीक से निकल कर वाल्मीकि महर्षि हो गये। समन्वय की दृष्टि से कहा जा सकता है कि किसी कल्प में प्रचेता प्राचीनबर्ही के दसवें पुत्र थे, अतएव प्राचे- तस कहलाये। किसी कल्प में प्रचेता वरुण के दसवें पुत्र हुए थे। उसमें वे भृगु के भ्राता होने से भृगुसम्बन्धित होकर भार्गव कहलाये। वर्तमान कल्प में तो प्रकृष्ट चित्तवाले प्रचेता ब्रह्मा के मरीचि आदि दस पुत्रों में दशम होने के कारण प्रचेता कहलाये। स्वार्थ में अण् प्रत्यय होने के कारण प्रचेता ही प्राचेतस शब्द से भी कहे गये हैं। वे ही शापवश भार्गव वंश में ऋक्ष या लोहजङ्घ नाम से उत्पन्न हुए, अतः भार्गव कहलाये थे। चौर्यादि कर्म करते हुए वही किरात या निषाद हो गये थे। सप्तर्षियों या नारद के सम्पर्क से वही तपोनिष्ठ होकर महर्षि वाल्मीकि हुए थे। स्कन्दपुराण आदि की अन्य कथाओं से भी इस कथा का समन्वय कर लेना उचित है। अन्य लोगों ने भी वाल्मीकि की ऐतिहा- सिकता पर पाश्चात्य लोगों द्वारा प्रदर्शित मार्ग का ही अनुसरण किया है। वे लोग इतिहास और पुराण की वाल्मीकि सम्बन्धित कथाओं को परस्पर असम्बद्ध एवं विशृङ्खलित मानते हैं। कहीं उन्हें सुविज्ञ तपस्वी बताया गया है तो कहीं प्रचण्ड दस्यु। कहीं उन्हें राजा राम से अनेकों वर्ष पूर्व उत्पन्न कहा गया है तो कहीं उनके समकालीन कहा गया है; पर आधुनिक तो उन्हें ईसा से कुछ ही शती पूर्व का मानते हैं। भारतीय दृष्टिकोण से तो महर्षि वाल्मीकि को राम से अनेक वर्ष पूर्व उत्पन्न मानने में कोई आपत्ति नहीं है। वे दीर्घजीवी होने के कारण राम के समकालीन भी थे। पहले उन्होंने शतकोटि श्लोकों का सुविस्तृत रामायण काव्य लिखा था। राम के समय में सीताचरित्रशुद्धि तथा कुशी-लव के अधीत वेदों के उपबृंहणार्थ चौबीस सहस्र श्लोकों में गायत्री के चतुर्विंशति अक्षरों का अनुसरण करते हुए चतुर्विंशतिसहस्रसंहितारूप रामायण ग्रन्थ लिखा। जब वाल्मीकि के अनुसार राम की ग्यारह सहस्र वर्ष की आयु थी तो वाल्मीकि महर्षि की उससे भी अधिक आयु होना आश्चर्यपूर्ण तथा असम्भावित नहीं कहा जा सकता। ई० श० के कुछ ही शती पूर्व उनका जन्मकाल मानना तो सर्वथा निराधार ही है। तैत्तिरीयप्रातिशाख्य के तीन सूत्रों से सूचित वाल्मीकि को आदि कवि से पृथक् मानने में कोई समुचित तर्क नहीं है। ‘पकारपूर्वश्च वाल्मीकेः’ वाल्मीकिशाखी के मतानुसार पकारपूर्व पकार को छत्वापत्ति नहीं होती। यहाँ ‘च’ शब्द का ‘प्रतिषेध’ अर्थ है। ‘कपवर्गपरश्चाग्निवेश्यवाल्मीक्ययोः’ अग्निवेश्य और वाल्मीकि शाखा-वाले आचार्यों के मत में कवर्ग एवं पवर्ग पर विसर्जनीय स स्थान ऊष्मा नहीं बनता है। यहाँ भी ‘च’ का निषेध ही अर्थ है। ‘उदात्तो वाल्मीकेः’ वाल्मीकिशाखी के मतानुसार प्रणव का उदात्त स्वर होता है। कहा जाता है—इन वैयाकरण वाल्मीकि की आदि कवि वाल्मीकि के साथ एकता नहीं कही जा सकती; क्योंकि व्याकरणाचार्य के रूप से उनकी प्रशस्ति कहीं नहीं मिलती है। याकोबी इन दोनों व्यक्तियों को पृथक् ही मानते हैं, परन्तु उक्त कथन का कोई आधार नहीं है। रामायण सरीखे महाकाव्य का निर्माता महान् संस्कृतज्ञ व्याकरण का आचार्य नहीं था, यह कहना अत्यन्त उपहासास्पद ही है। वाल्मीकि ने हनुमान् की व्याकरणज्ञता का चित्रण किया है। श्रीराम कहते हैं— “नानुग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः । नासामवेदविदुषः शक्यमेवं विभाषितुम् ॥” (वा० रा० ४।३।२८)