रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ अध्याय वाल्मीकिरामायण और महाभारत-रामोपाख्यान महाभारत वनपर्व के रामोपाख्यान के आधार के सम्बन्ध में पाश्चात्यों ने चार सम्भावनाएँ व्यक्त की हैं—( १ ) रामोपाख्यान रामायण का आधार है, ( २ ) रामोपाख्यान एक ऐसी रामायण पर निर्भर है, जो प्रचलित रामायण का पूर्वरूप है, ( ३ ) रामोपाख्यान वाल्मीकिरामायण का संक्षिप्त रूप है एवं ( ४ ) रामोपाख्यान तथा रामायण दोनों किसी सामान्य मूल स्रोत के स्वतन्त्र विकास हैं । पहला पक्ष ई० हाप्किन्स तथा ए० लुड्विग का है । इसके अनुसार रामोपाख्यान और रामायण में जो अन्तर है, वह यह सिद्ध करता है कि वह रामायण का संक्षिप्त रूप नहीं हो सकता । इसपर डा० याकोबी का उत्तर यह है कि यद्यपि रामोपाख्यान के रचयिता ने प्रचलित रामायण की हस्तलिपि का सहारा नहीं लिया, पर उसे अपने देश की प्रचलित रामायण कण्ठस्थ थी ! संक्षिप्त वर्णन में छोटे-मोटे अन्तर सहज ही आ गये होंगे, यह तीसरा मत है । अधिकांश विशेषज्ञ डा० याकोबी का मत मानते हैं। महाभारत के सम्पादक सुकण्ठकर ८६ स्थल उद्धृत करते हैं, जिनमें रामोपाख्यान और और रामायण में शाब्दिक साम्य मिलता है । साथ ही रामोपाख्यान के इन्द्रजित्-यज्ञ, काक-वृत्तान्त आदि रामायण के बिना समझ में नहीं आ सकते, अतः रामोपाख्यान का वृत्तान्त स्वतन्त्र नहीं है । महाभारत में रामायण तथा कवि वाल्मीकि का उल्लेख हुआ है; अतः रामायण को रामोपाख्यान का आधार मानने में कोई आपत्ति नही, यह बुल्के स्वीकार करते हैं । रामोपाख्यान के बालकाण्ड में राम तथा उनके भाइयों का जन्म वर्णित है । रामायण के पुत्रेष्टियज्ञ तथा पायस का उल्लेख नहीं है । सीता जनक-पुत्री हैं, उनकी अयोनजता का उल्लेख नहीं है । ब्रह्मर्षि, देवता आदि रावण से त्रस्त होकर ब्रह्मा की शरण लेते हैं । ब्रह्मा राम के अवतार का रहस्य बतलाते हैं । ब्रह्मा के आदेश से देवता विष्णु की सहायता के लिए ऋक्ष, वानर आदि रूपों में प्रकट होते हैं । चारों भाइयों के विवाह का वर्णन है, पर सीता को छोड़कर अन्य माण्डवी आदि का नाम-निर्देश नहीं है । २य काण्ड में गुह तथा अत्रि का उल्लेख नहीं हैं । कैकेयी को एक वरदान मिलना तथा मन्थरा को गन्धर्वी दुन्दुभी का अवतार कहा गया है । अरण्यकाण्ड में वाल्मीकिरामायण के समान ही कथा है; किन्तु विराध, सुतीक्ष्ण, अगस्त्य, अयोमुखी और शबरी से सम्बन्धित सामग्री का अभाव है । किष्किन्धा में राम और सुग्रीव की मैत्री, वालीवध, सीतान्वेषणार्थ वानरों का प्रेषण तथा उनका पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशाओं से प्रत्यागमन वर्णित है । सुग्रीवसख्य के पहले राम की बल-परीक्षा का अभाव, वाली और सुग्रीव का एक ही द्वन्द्वयुद्ध इस अंश में रामायण से भिन्नता है । रामोपाख्यान के सुन्दरकाण्ड में हनुमान् एवं उनके साथियों की यात्रा के वृत्तान्त का वर्णन लौटकर स्वयं हनुमान् ने ही किया है । इसमें अविन्ध्य को अधिक महत्त्व दिया गया है। रामायण में सीता ने हनुमान् से अविन्ध्य की चर्चा की है—