रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ रामायणमीमांसा तृतीय उसी समय महर्षि वाल्मीकि और उनके वर्तमान रामायण महाकाव्य का आविर्भाव हुआ । पुराणान्तरों के अनुसार वाल्मीकि और शतकोटिप्रविस्तर रामायण तो राम के पूर्व ही आविर्भूत हो चुके थे । स्कान्दे पातालखण्डे अयोध्यामाहात्म्ये तत्रत्यतीर्थाश्रमवर्णनप्रस्तावे-- “शापोक्त्या हृदि सन्तप्तं प्राचेतसमकल्मषम् । प्रोवाच वचनं ब्रह्मा तत्रागत्य सुसत्कृतः ॥ न निषादः स वै रामो मृगयां कर्तुमागतः । तस्य संवर्णनेनैव सुश्लोक्यस्त्वं भविष्यसि ॥ इत्युक्त्वा तु जगामाशु ब्रह्मलोकं सनातनः । ततः संवर्णयामास राघवं ग्रन्थकोटिभिः ॥” कोटिभिः शतकोटिभिः, चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरमित्यन्यत्रोक्तेः ( वा० रा० १।२।१५ रामाभिरामीयटीकायाम् ) । अर्थात् स्कन्दपुराण पातालखण्ड अयोध्यामाहात्म्य में वहाँ के तीर्थ और आश्रमों के वर्णन के सिलसिले में कहा है— महर्षि वाल्मीकि “मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः” (वा० रा० १।२।१५) इत्यादि शाप देकर अन्तःसन्तप्त हो रहे थे उसी समय ब्रह्माजी आये । महर्षि से सत्कृत होकर उन्होंने कहा—“वह निषाद नहीं राम ही मृगया के लिए आये थे । तुम उनका चरित्र वर्णन करके सुश्लोक्य ( महायशस्वी ) होओगे ।” यह कहकर ब्रह्मा ब्रह्मलोक चले गये । महर्षि ने शतकोटि श्लोकों द्वारा रामचरित्र का वर्णन किया था । उसी में से कुश और लव के लिए चतुर्विंशत्साहस्रीसंहिता का उपदेश किया था ।