भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 1049 में से

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अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ८५ पद्मपुराण में रामायणोक्त कथाओं से विलक्षण बहुत-सी कथाओं का वर्णन है । रामाश्वमेध नामक एक बहुत बड़ा भाग वहाँ वर्णित है । कल्पभेद से भी राम की अवतारकथाओं में भेद पुराणसम्मत है । महाभारत का रामोपाख्यान रामोपाख्यान के सहारे बुल्के रामायण के बहुत अंशों को प्रक्षिप्त कहते हैं । लङ्कादाह को वे प्रक्षिप्त कहते हैं । परन्तु रामोपाख्यान में लङ्कादाह का स्पष्ट उल्लेख है । सेतुबन्ध को भी वे असम्भव समझते हैं, पर वह भी रामो- पाख्यान में विद्यमान है । “प्रत्याजहार तां रामः सुग्रीवबलमाश्रितः । बद्ध्वा सेतुं समुद्रस्य दग्ध्वा लङ्कां शितैः शरैः ॥” ( म० भा० ३।२७४।३ ) अर्थात् राम सुग्रीव की सहायता से समुद्र में सेतु बाँधकर एवं हनुमान् द्वारा लङ्का को जलाकर सीता को लौटा लाये । रामोपाख्यान में सीता की अलौकिकता का भी वर्णन है— “विदेहराजो जनकः सीता तस्यात्मजा विभो । यां चकार स्वयं त्वष्टा रामस्य महिषीं प्रियाम् ॥ ” ( म० भा० ३।२७४।९ ) इसमें असाधारणरूपवती होने से सीता को त्वष्टा द्वारा निर्मित कहा गया है । रावण को भी सर्वलोकस्रष्टा ब्रह्मा का प्रपौत्र एवं कुबेर का भ्राता कहा गया । पुलस्त्य से उनकी गोनाम्नो पत्नी में वैश्रवण की उत्पत्ति हुई । वैश्रवण पिता को छोड़कर पितामह की उपासना में संलग्न हुए, अतः वैश्रवण के प्रतीकारार्थ क्रुद्ध होकर पुलस्त्य अपने ही अर्धभाग से विश्रवा रूप में उत्पन्न हुए । उधर पितामह ने वैश्रवण पर प्रसन्न होकर उन्हें धनेशत्व, लोकपालत्व, अमरत्व, ईशानसख्य आदि महान् पद प्रदान किये, इतना ही नहीं उन्हें रक्षोगणान्वित लङ्का राजधानी, कामगामी पुष्पक विमान, यक्षाधिपत्य तथा राज- राजत्व भी प्रदान किया । पुलस्त्य के अर्धदेह से उत्पन्न विश्रवा वैश्रवण को सक्रोध दृष्टि से निहारते थे । उनको प्रसन्न करने के लिए राजराज कुबेर ने उन्हें सेवा के लिए पुष्पोत्कटा, राका और मालिनी नाम की तीन राक्षसियाँ प्रदान कीं । वे परस्पर उत्कर्ष की कामना से महर्षि की सेवा में तत्पर रहीं । उनपर संतुष्ट होकर विश्रवा ने उन्हें लोकपालों के सदृश पुत्र प्रदान किये । पुष्पोत्कटा से रावण और कुम्भकर्ण की, मालिनी से विभीषण की तथा राका से खर एवं शूर्पणखा की उत्पत्ति हुई । विभीषण सर्वाधिक रूपवान् तथा धार्मिक था । रावण महान् उत्साही तथा महाबलवान् था । कुम्भकर्ण सर्वाधिक बलवान्, मायावी तथा रणकोविद था । खर धनुर्धर और विक्रमी था तथा शूर्पणखा सिद्धिविघ्नकारिणी रौद्री थी । सभी वेदविद् तथा सम्यक् व्रतचारी थे एवं पिता के साथ गन्धमादन पर्वत पर रहते थे । नरवाहन कुबेर का वैभव देखकर ईर्ष्यावश तपस्या में लगकर सबने ब्रह्मा को सन्तुष्ट कर विविध वर प्राप्त किये । रावण सहस्र वर्ष की तपस्या पूर्ण होने पर अपना सिर अग्नि में होम कर देता है । इससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे अमरत्व छोड़कर इष्ट वर मांगने को कहा । उसने गन्धर्व, देव, असुर, यक्ष, राक्षस, सर्प, किन्नर और भूतों से अवध्यता का वरदान मांगा । ब्रह्मा ने कहा—मनुष्य को छोड़कर तुम्हें और किसी से भय नहीं होगा । विभीषण ने धर्मबुद्धि होने का वरदान माँगा । फलतः अमरत्व का वरदान उन्हें बिना माँगे ही मिल गया ।

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