भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 163

८६ रामायणमीमांसा चतुर्थ दशग्रीव ने वैश्रवण पर आक्रमण कर लङ्का और पुष्पक विमान छीन लिये। वैश्रवण ने शाप दिया था कि वह विमान तुम्हारा वाहन न बन सकेगा, किन्तु जो तुम्हें मारेगा उसी का वाहन बनेगा— “शशाप तं वैश्रवणो न त्वामेतद् वहिष्यति। यस्तु त्वां समरे हन्ता तमेवैतद् वहिष्यति॥” ( म० भा० ३।२७५।३४ ) बुल्के पुष्पक विमान के वर्णन को प्रक्षेप मानते हैं। उनका यह भी तर्क है कि यदि पुष्पक होता तो रावण पुष्पक द्वारा ही सीता का हरण करता, परन्तु उपर्युक्त श्लोक से सिद्ध है कि शापवश पुष्पक विमान रावण का वहन नहीं करता था। उपर्युक्त वचनों में रावण को दशग्रीव भी कहा गया है। कुम्भकर्ण को महती निद्रा का वरदान भी उक्त है। वहीं रावण को कामरूपी तथा आकाशगामी भी कहा गया है— “कामरूपी विहङ्गमः” ( म० भा० ३।२७५।३९ ) तथा “दशग्रीवः कामबलः” ( ३।२७५।४० ) उसे दशग्रीव एवं कामबल भी कहा गया है। अग्रिम २७६ वें अध्याय में अग्निसहित सभी देवता ब्रह्मा की शरण में जाते हैं। ब्रह्मा ने बताया, मेरे वरदान के प्रभाव से रावण देव और असुरों से अवध्य है। मेरी प्रार्थना से चतुर्भुज विष्णु ही अवतरित होकर उसका वध करेंगे— “तदर्थमवतीर्णोऽसौ मन्नियोगाच्चतुर्भुजः । विष्णुः प्रहरतां श्रेष्ठः स तत्कर्म करिष्यति॥” ( म० भा० ३।२७६।५ ) वहीं ब्रह्मा ने इन्द्र आदि देवताओं को भी यह आदेश दिया कि तुम लोग ऋक्षियों एवं वानरियों में काम- रूप बलान्वित वीरों को उत्पन्न कर विष्णु की सहायता करो। तदनुसार देवताओं ने साल, ताल, शिला आदि आयुधोंवाले वानरों को उत्पन्न किया। वे बल, वीर्य, विद्या, यश आदि में अपने पितृभूत देवों के ही तुल्य थे। वज्र- संहनन, कामबल-वीर्य तथा कामरूप थे। दस हजार हाथियों का बल रखते थे ( म० भा० ३।२७६।१६-१८ )। दुन्दुभी गन्धर्वी कुब्जा मन्थरा बनकर आयी थी। २७७ वें अध्याय में महाराज दशरथ के यहाँ राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के जन्म, ब्रह्मचर्य, वेद, उपवेद के अध्ययन और राम की विशेषता का वर्णन है। राम के यौवराज्य की तैयारी का विचार हुआ। राम मत्तमतङ्गगामी, महाबाहु, लोहिताक्ष, कम्बुग्रीव, महोरस्क, नीलकुञ्चितमूर्धज तथा दिव्यश्री से दीप्यमान थे। वे सब धर्मों में पारङ्गत तथा बुद्धि में बृहस्पति एवं बल में इन्द्र के तुल्य थे। सर्वविद्याविशारद, जितेन्द्रिय तथा अमित्रों के भी नेत्र एवं मन को हरण करनेवाले वे शत्रुओं को भी परम प्रिय लगते थे। “जितेन्द्रियममित्राणामपि दृष्टिमनोहरम् ॥” वे असाधुओं के नियन्ता तथा साधुओं के गोप्ता थे। धृतिमान्, अप्रधृष्य, जेता एवं अपराजित थे। ऐसे कौशल्यानन्दवर्धन पुत्र को पाकर राजा दशरथ परम प्रसन्न थे। पुरोहित वसिष्ठ की सम्मति से पुष्य नक्षत्र में अभिषेक के लिए संभारों के संग्रहार्थ राजा ने मन्त्रियों को आदेश दिया। यह सब सुनकर मन्थरा ने कैकेयी के सापत्न्य को उकसाया और कैकेयी ने प्रेमवशीभूत राजा से वरदान माँग लिया कि राम के लिए उपस्थापित अभिषेक की सामग्री से भरत का अभिषेक किया जाय और राम वन जायें। राजा दारुण विप्रिय वचन सुनकर कुछ न बोल सके। वीर्यवान् राम ने सब वृत्तान्त जानकर राजा की सत्यरक्षा के लिए वन को प्रस्थान किया। धनुष्मान् लक्ष्मण और पतिप्राणा जानकी ने उनका अनुगमन किया। राम के वन जाने पर राजा का देहान्त हो गया। कैकेयी ने भरत को ननिहाल से बुलाकर निष्कण्टक राज्य करने को कहा।