भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 164

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ८७ भरत ने वह सुनकर कैकेयी की भर्त्सना कर मन्त्रियों के समक्ष अपने चरित्र का विशोधन किया और राम को वन से लौटाने की लालसा से भरत दुःखिता कौशल्या, सुमित्रा तथा कैकेयी को यानों द्वारा प्रस्थापित कर वसिष्ठ, वामदेव तथा अन्य सहस्रों विप्रों तथा पौर-जानपदों को साथ लेकर वन में गये और चित्रकूट में तापस वेषधारी राम और लक्ष्मण को देखा तथा राम से लौटकर राज्य स्वीकार करने की आकांक्षा व्यक्त की। राम ने प्रेम से समझा- बुझाकर भरत को लौटा दिया। इस प्रसङ्ग में यहाँ गुह निषाद की चर्चा नहीं है। संक्षेप के कारण ही सुमन्त्र की भी चर्चा नहीं है। यज्ञरक्षार्थ राम और लक्ष्मण का विश्वामित्र के साथ वनगमन, जनकपुर-गमन, धनुर्भङ्ग तथा सीता-विवाह का वर्णन भी नहीं है, फिर भी उनका अभाव नहीं समझना चाहिये । राम पुनः पौरों और जानपदों के आगमन की शङ्का से महारण्य में शरभङ्ग के आश्रम की ओर चले गये और गोदावरी के रम्य तट पर निवास करने लगे। वहाँ उनका शूर्पणखा के कारण खर के साथ महान् वैर हो गया। तापसों के रक्षार्थ धर्म-वत्सल राम ने चौदह हजार राक्षसों का वध किया। दूषण एवं खर को मार कर दण्डकारण्य को धर्मारण्य बना दिया। विकृतनासा और विकृतोष्ठी शूर्पणखा शुष्करुधिरानना होकर लङ्का गयी। दुःख से मू्र्च्छित होकर भ्राता रावण के चरणों में गिर पड़ी। रावण क्रुद्ध होकर आसन से उठा। अपने अमात्यों को हटा कर एकान्त में उसने शूर्पणखा से पूछा—किसने मेरा अपमान कर तुम्हें विरूपित किया है। कौन तीक्ष्ण शूल से अपने सर्वाङ्ग का छेदन कराना चाहता है, कौन सिर पर अग्नि जलाकर विश्वस्त होकर सोता है, कौन घोर नाग का पैर से स्पर्श करना चाहता है और केसरी सिंह का दाँत पकड़कर खड़ा रहना चाहता है। यह कहते उसके नेत्रादि स्रोतों से ज्वालाएँ भभक उठीं । शूर्पणखा ने रावण को राम का विक्रम तथा खर-दूषण सहित राक्षसों का पराभव बतलाया। वह बहन को आश्वस्त कर, नगररक्षा की व्यवस्था कर तथा महोदधि पार करके शूलपाणि के प्रिय गोकर्ण धाम में मारीच के पास पहुँचा। २७८ वें अध्याय में मारीच रावण का सम्मान कर और उसके आगमन का उद्देश्य जानकर उसे समझाता है और कहता है मैं राम के वीर्य का जानकार हूँ । राम के बाण-वेग को कौन सहन कर सकता है। जिसने तुम्हें वैसा परामर्श दिया है वह दुरात्मा है। यह तुम्हारे विनाश का मार्ग है। इसपर रावण ने सक्रोध होकर स्पष्ट कहा—मेरी आज्ञा का पालन न करने पर मृत्यु ध्रुव है। मारीच ने सोचा यदि मरना ही है तो विशिष्ट अरि के हाथ मरना ही श्रेष्ठ है और रावण के इच्छानुसार वह रत्नशृङ्ग, रत्नचित्रलोमा कनकमृग बनकर सीता के सामने गया। रावण भी मुण्डी त्रिदण्ड यति होकर राम के आश्रम के समीप गया। विधिवशात् सीता ने राम से उस विचित्र मृग को लाने के लिए कहा। राम ने धनुष लेकर, लक्ष्मण को सीता की रक्षा में छोड़कर, मृगलाभ की इच्छा से मृग का अनुसरण किया । मृग कभी अन्तर्हित होता था, कभी प्रकट होता था। इस तरह वह राम को बहुत दूर ले गया। प्रति- भावान् राम ने उसे राक्षस समझ कर अमोघ बाण मारा और वह राम के स्वर के सदृश स्वर में 'हा-सीते', 'हा-लक्ष्मण' यों चीखकर मर गया। राम के सदृश करुण स्वर सुनकर वैदेही उस शब्द की ओर दौड़ पड़ी। लक्ष्मण ने समझाया, आप डरिये नहीं, राम को कोई भी नहीं मार सकता। आप शीघ्र ही अपने भर्ता को देखेंगी। ऐसा कहने पर भी रोती हुई सीता स्त्रीस्वभाव से हतबुद्धि होकर लक्ष्मण के प्रति शङ्का करने लगीं । शुक्ल-चरितभूषणा पतिव्रता सीता ने लक्ष्मण के प्रति परुष वचन कहे। सुवृत्त राघवप्रिय लक्ष्मण ने कान मूंद कर राम के मार्ग का अनुसरण किया। इस बीच अभव्य रावण भव्य रूप में भस्मच्छन्न अनल के समान यतिवेश से प्रच्छन्न