रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 165, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोकर सीताहरण की इच्छा से आया । उसे देखकर धर्मज्ञा सीता ने फलादि भोजन के लिए निमन्त्रित किया । सबकी उपेक्षा कर रावण ने कहा—मैं राक्षसराज रावण हूँ । महोदधि के पार मेरी रम्या लङ्कापुरी है। वहाँ तुम हमारी भार्या बनकर शोभित होओगी । सीता ने कान मूंद कर कहा—भले नक्षत्रों सहित अन्तरिक्ष गिर पड़े, भले पृथ्वी छिन्न-भिन्न हो जाय और भले अग्नि शीतल हो जाय, पर मैं राम को त्याग नहीं सकती । करेणु गजेन्द्र को छोड़कर सूकर का अनुसरण कैसे कर सकती है ? इत्यादि कहकर सीता क्रुद्ध होकर आश्रम में प्रविष्ट हो गयीं । रावण ने दौड़कर रूखे स्वर से सीता की भर्त्सना करके उनके सिर के बालों को पकड़कर आकाश की ओर प्रस्थान किया । गृध्र जटायु ने 'राम' 'राम' कहकर रोती हुई सीता को देखा । २७८ वें अध्याय में यह भी कहा गया है कि वह अरुणपुत्र दशरथ का सखा तथा सम्पाति का भाई था । उसने रावण के अङ्क में पुत्रवधू सीता को देखकर रावण से कहा—मैथिली सीता को छोड़ दो । मेरे जीते जी तुम इस वधू को कैसे ले जा सकते हो । बुल्के कहते हैं कि हरण के पहले राम आदि से जटायु का परिचय नहीं था । पर प्रस्तुत वर्णन से यह कथन सर्वथा विरुद्ध है । “सखा दशरथस्यासीद् जटायुररुणआत्मजः” (म० भा० ३।२७९।१), “रावणाङ्कगतां स्नुषाम्” (म० भा० ३।२७९।२), 'यदि नोत्सृज्यसे वधूम्' (म० भा० ३।२७९।४) इससे यह स्पष्ट है कि वह सीता को अपनी स्नुषा (पुत्रवधू) मानता था । जटायु ने प्रहारों से रावण को जर्जर कर दिया । अन्त में रावण खड्ग से जटायु के पक्ष काटकर आकाश मार्ग से चला गया । सीता जहाँ जहाँ ऋषियों का आश्रम या सरिता और सरोवर देखती थी वहाँ वहाँ अपने आभूषणों को छोड़ती जाती थी । उसने गिरिप्रस्थों पर वानरपुङ्गवों को देखा । वहाँ उसने अपने महद् दिव्य वस्त्र छोड़ दिये । अन्त में रावण सीता को लेकर लङ्का पहुँच गया । इधर लौटते हुए राम ने लक्ष्मण को देखकर कहा, “तुम राक्षससंकुल वन में सीता को छोड़कर कैसे आये ? लक्ष्मण ! वैदेही जीवित नहीं हो सकती ।” आश्रम के समीप जाकर पर्वततुल्य गृध्र को देखा और उसे राक्षस समझकर धनुष की प्रत्यञ्चा चढ़ायी । उसने कहा, “भद्र, मैं तुम्हारे पिता दशरथ का सखा गृध्रराज हूँ ।” राम ने उसकी बात सुन छिन्नपक्ष जटायु को देखा । जटायु ने सीता को छुड़ाने के लिये रावण से हुए युद्ध में अपने आहत होने की बात बतायी । इशारे से रावण के गगनमार्ग का निर्देश कर गृध्र जटायु ने प्राण त्याग दिये । राम ने पिता के सखा जटायु का संस्कार किया । दुःख और शोक से समाक्रान्त हो श्रीराम सीता की खोज करते हुए दक्षिण की ओर चले । आगे बढ़ने पर उन्होंने घोर-दर्शन महाभुज कबन्ध को देखा । उसने लक्ष्मण को पकड़ लिया । लक्ष्मण बड़े खिन्न हो उठे । राम ने उन्हें आश्वासन दिया और कबन्ध की वाम बाहु काटकर लक्ष्मण से कहा उसकी दक्षिण बाहु काट डालो । लक्ष्मण ने उसकी दक्षिण बाहु काट दी । लक्ष्मण ने भ्राता की ओर देखकर कबन्ध को पुनः पार्श्व में मारा । वह निष्प्राण होकर गिर पड़ा । उसके शरीर से दिव्यदर्शन सूर्य-तुल्य पुरुष निकल कर अन्तरिक्ष में स्थित हुआ । राम के यह पूछने पर कि तुम कौन हो ? उसने बताया, मैं विश्वावसु गन्धर्व हूँ, ब्राह्मण-शाप से राक्षसयोनि में आ गया था । आपकी अनुकम्पा से शापमुक्त हुआ हूँ । लङ्कावासी रावण ने सीता का अपहरण किया है । सुग्रीव के पास आप जायें । वह आप की सहायता करेगा । यहीं पम्पा है । ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव चार मन्त्रियों के साथ रहता है । उसके सहयोग से सीता को आप प्राप्त करेंगे । वानर-राज सुग्रीव रावण का घर जानता है । यह कहकर विश्वावसु अन्तर्हित हो गया ।