भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 166

अध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ८९ २८०वें अध्याय में राम पम्पातट पर प्रिया का स्मरण करके विलाप करते हैं। सौमित्रि उन्हें आश्वासन देते हैं। अन्त में राम पितरों का तर्पण एवं पम्पा का जल पान कर ऋष्यमूक की ओर चले। वहाँ उन्होंने पाँच वानरों को देखा। सुग्रीव ने उनका परिचय जानने के लिये हनुमान् को भेजा। हनुमान् से सम्भाषण कर दोनों सुग्रीव के पास पहुँचे । श्रीराम ने वानरराज से मित्रता की। सुग्रीव ने सीता के वे दिव्य वस्त्र दिखलाये जिन्हें रावण द्वारा हरी जा रही सीता ने नीचे गिरा दिया था। उन्हें देखकर राम को बड़ा सन्ताप हुआ । राम ने सुग्रीव को अभिषिक्त कर पृथिवी के सभी वानरों का राजा बना दिया और वाली-वध की प्रतिज्ञा की। सुग्रीव ने वैदेही के प्रत्यानयन का राम को विश्वास दिलाया। इस तरह परस्पर विश्वास प्राप्त कर सब किष्किन्धा गये । सुग्रीव ने गर्जना की। वाली ने उसको सहन नहीं किया। तारा ने कहा—सुग्रीव जैसी गर्जना कर रहा है उससे प्रतीत होता है कि वह आश्रयवान् है; अतः आप न जायें। वाली ने कहा—तुम सब भूतों की बोली जानती हो, बुद्धि से देखो सुग्रीव किसके बल का सहारा लेकर आया है। तारा ने विचार कर कहा—'कपीश्वर ! सुनिये, हृतदार महासत्त्व राम सुग्रीव के साथ तुल्यारिमित्रता कर चुके हैं। वे तदनुसार परस्पर एक दूसरे के शत्रु को शत्रु और मित्र को मित्र मानने की प्रतिज्ञा कर परस्पर हित साधन के लिए सन्नद्ध हैं। राम के भ्राता अपराजित सौमित्रि, जो महामेधावी हैं, कार्यसिद्धि के लिये तत्पर हैं। मैन्द, द्विविद, हनुमान् एवं जाम्बवान् उनके साथ हैं। ये सभी महासत्त्व, महात्मा एवं महाबली हैं।' वाली ने तारा की हितोक्ति अनसुनी कर दी और उसके मन में ऐसा विचार आया कि इसका मन सुग्रीव पर आसक्त है, इसलिये ऐसा कह रही है। वाली ने सुग्रीव से कहा—अनेक बार मैंने तुझे स्वजातीय समझकर छोड़ दिया था, तुझे मरने की त्वरा क्यों उत्पन्न हुई है ? सुग्रीव ने कहा—जब तुमने मेरे राज्य और पत्नी का हरण कर लिया तो मुझमें जीवन का सामर्थ्य कहाँ है ? इसके अनन्तर दोनों भिड़ गये एवं साल, ताल तथा शिलाओं से प्रहार करने लगे। दोनों दोनों पर प्रहार करते हुए भूमि पर गिरे और सँभल कर पुनः मुष्टिप्रहार करने लगे। दोनों नख और दाँतों से क्षतविक्षत होकर रुधिर से लथपथ हो गये थे । परस्पर युद्ध कर रहे उन दोनों में कोई भेद प्रतीत नहीं होता था । दोनों में परस्पर विभेद के लिये हनुमान् ने सुग्रीव के गले में माला डाल दी। इस तरह माला से चिह्नित देखकर राम ने महाधनुष को खींचकर वाली को लक्ष्य बनाकर बाण प्रहार किया। भयभीत वाली शर से आहत हो गया तथा रुधिर वमन करते हुए उसने लक्ष्मणसहित राम को देखा ( यहाँ राम के छिपने का वर्णन नहीं है) और राम की गर्हणा कर भूमि पर गिर पड़ा। वाली के मरने पर सुग्रीव ने किष्किन्धा और तारा दोनों को प्राप्त कर लिया। राम ने वर्षा के चार मास माल्यवान् पर्वत पर निवास किया । उधर रावण ने लङ्का पहुँचकर सीता को नन्दनोपम अशोकवाटिका में राक्षसियों के पहरे में सुरक्षित रखा। वे सब राक्षसियाँ द्वयक्षी, त्र्यक्षी, ललाटाक्षी, दीर्घजिह्वा, त्रिस्तनी, एकपदा, त्रिजटा, एकलोचना, दीप्ताक्षी आदि भीषण रूप की थीं, और रातदिन जागकर सीता का तर्जन करती थीं। वे कहती थीं, इसे तिल-तिल विभक्त कर हम खा जायेंगी। यह हमारे स्वामी की अवहेलना करके कैसे जीवित रह सकती है ? सीता ने कहा—आर्याओ ! मुझे खा जाओ, पुण्डरीकाक्ष नीलकुन्तल श्रीराम के वियोग में मुझे जीवन का कोई लोभ नहीं है। प्रियतम से विलग हुई मैं निराहार रहूँगी एवं अपने शरीर का शोषण करूँगी। राघव से भिन्न अन्य पुरुष का मैं कदापि स्पर्श नहीं करूँगी। सीता के ऐसे वचन सुनकर राक्षसियाँ उनका निश्चय सुनाने रावण के पास चली गयीं। उस समय त्रिजटा नाम की राक्षसी ने सीता को सान्त्वना प्रदान करते हुए कहा—सीते ! १२