रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९० रामायणमीमांसा चतुर्थ तुम मेरी बात पर विश्वास कर निर्भय हो जाओ । अविन्ध्य नाम का मेधावी वृद्ध राक्षस तुम्हारा हितैषी है । उसने मुझसे कहा है कि लक्ष्मणसहित तुम्हारे भर्ता सकुशल हैं । शक्रतुल्य वानरराज से सख्य कर वे तुम्हारी रक्षा के लिए उद्योगशील हैं । तुम र्गहित रावण से मत डरो । रावण को नलकूबर का शाप है कि यदि वह अवशा नारी का स्पर्श करेगा तो नष्ट हो जायगा सौमित्रिसहित तुम्हारे भर्ता शीघ्र ही आ रहे हैं । मैंने राक्षसों के लिए अनिष्ट फलवाले बहुत से स्वप्न देखे हैं । मैंने स्वप्न में देखा है—यह क्षुद्रकर्मा दारुण रावण मुण्डित एव तैललिप्त होकर खरयुक्त रथ पर नृत्य कर रहा है । इसी तरह कुम्भकर्ण आदि भी नग्न, मुण्डित एवं लाल माला और लाल ही अङ्गराग से युक्त होकर दक्षिण दिशा की ओर जा रहे हैं । विभीषण श्वेत छत्र एवं श्वेत उष्णीष धारण किये हुए शुक्ल माला और अङ्गराग से विभूषित होकर श्वेत पर्वत पर आरूढ़ हैं एवं उनके चार सचिव भी शुक्ल माल्यादियुक्त हो श्वेतपर्वत पर आरूढ़ हैं । राम के अस्त्र से सागर सहित पृथिवी पूरित हो गयी है । तुम्हारे पति के यश से सारी पृथिवी पूरित है । लक्ष्मण अस्थियों के अम्बार पर आरूढ़ होकर मधु और पायस भक्षण कर रहे हैं । तुम्हें रोती हुई और रुधिर से सराबोर होकर एवं व्याघ्र के मुख से बच कर उत्तर दिशा की ओर जाते हुए मैंने कई बार देखा है । वैदेहि ! तुम शीघ्र ही अपने भर्ता से युक्त होकर हर्ष को प्राप्त होओगी । त्रिजटा के ये वचन सुनकर सीता भर्तृसमागम के लिए आशान्वित हुईं । राक्षसियों ने आकर त्रिजटा के साथ शिला पर बैठी हुई सीता को देखा । २८१ वें अध्याय के अनुसार भर्तृशोकार्ता, दीना, मलिनवसना, मणिमात्र अलङ्कारवाली, रोती हुई, शिला- तल पर राक्षसियों के बीच बैठी हुई, पतिव्रता सीता के पास आकर कामार्त रावण ने उसे देखा । जो रावण देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर आदि से कभी भी पराजित नहीं हुआ, पतिप्राणा सीता के सम्मुख उसकी दाल न गली और वह दिव्यभूषण दिव्याम्बरधारी होकर मूर्तिमान् वसन्त के तुल्य प्रतीत होता था; परन्तु भूषित होने पर भी वह कल्पवृक्ष के समान नहीं बन सका, वह चैत्यवृक्ष के तुल्य भयङ्कर लगता था। जैसे रोहिणी के समक्ष शनैश्चर आया हो वैसे ही वह सीता के समीप आया । रावण ने संबोधित कर सीता से कहा—तन्वङ्गि ! तुमने अपने भर्ता का पर्याप्त आदर कर लिया है । वरारोहे ! महार्ह आभरण एवं वस्त्र धारण कर मुझे स्वीकार करो । मेरे पास देव, गन्धर्व, दानव और दैत्यों की १४ कन्याएँ मेरी भार्याओं के रूप में विद्यमान हैं। मेरे पास १४ करोड़ पिशाच एवं १४ करोड़ नरभक्षी राक्षस हैं । इन सबकी अपेक्षा तिगुनी संख्या यक्षों की है । वे सब मेरे भाई कुबेर के समान ही हैं । पानगोष्ठी में गन्धर्व और अप्सराएँ सामने खड़ी होकर मेरी आराधना करती हैं । मैं विश्रवा मुनि का पुत्र हूँ। चार लोकपालों के समान ही मेरा यश फैला हुआ है । इन्द्र के समान दिव्य भक्ष्य, भोज्य तथा विविध पान मेरे लिए सदा उपस्थित रहते हैं । तुम्हारा वनवास का हेतूभूत दुष्कृत क्षीण हो जाय, तुम मन्दोदरी के समान मेरी भार्या बन जाओ । यह सुनकर शुभानना वैदेही मुख फेरकर और बीच में तृण रखकर राक्षसों के लिए अमङ्गल सूचक आँसुओं से अपने पीनोन्नत वक्षस्थल को निरन्तर भिगोती हुई उस क्षुद्र राक्षस से बोली—राक्षसेश्वर, तुम्हारे मुख से मुझ अभागिनी ने कई बार अभद्र बातें सुनीं हैं । मैं पतिव्रता परभार्या हूँ, मैं सर्वथा अलभ्य हूँ । भद्र ! तुम अपना मन मेरी ओर से हटा लो । मुझ विवशा की धर्षणा से तुम्हें क्या लाभ होगा ? ब्रह्मा के वंश में उत्पन्न प्रजापति के समान विश्रवा तुम्हारे पिता हैं। तुम भी लोकपालों के तुल्य हो । अपने को महेश्वर का सखा एवं कुबेर का भाई कहते हो । फिर, ऐसा बरताव करते तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती है ? यह कहकर गर्दन और मुख को वस्त्र से ढककर श्रीसीता रोने लगीं । इस प्रकार सीता के निष्ठुर वचनों से प्रत्याख्यात हुए रावण ने कहा—सीते ! भले ही मेरे अङ्ग काम से पीड़ित हों फिर भी मैं अकामा का स्पर्श नहीं करूँगा । यह कहकर वह अन्तर्हित हो गया ।