भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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७० रामायणमीमांसा तृतीय “सन्ध्यांशे समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च । अहं दाशरथी रामो भविष्यामि जगत्पतिः ॥” (म० भा० १२।३३९।८५) “वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ । आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥ (म० भा० १८।६।२३) शान्तिपर्व में शम्बूक का भी उल्लेख है— “श्रूयते शम्बूके शूद्रे हते ब्राह्मणदारकः । जीवितो धर्ममासाद्य रामात् सत्यपराक्रमात् ॥' (म० भा० १२।१५३।६७ ) ऊपर के उद्धरणों से राम का अवतार होना एवं रामायण तथा वाल्मीकि महर्षि का अति प्राचीन होना सिद्ध है, फिर भी बुल्के इन्हीं उद्धरणों के आधार पर यह सिद्ध करना चाहते हैं कि ये सब अंश बहुत पीछे के हैं, क्योंकि उक्त सब अंश प्रचलित रामायण के हैं जो कि आदिरामायण की अपेक्षा बहुत अर्वाचीन है । परन्तु यह उनकी केवल दुरभिसन्धि है । हम पहले लिख आये हैं कि उक्त सभी अंश प्रामाणिक हैं एवं वाल्मीकिनिर्मित हैं। महाभारत से अतिप्राचीन होने के कारण महाभारत में इनका उद्धरण उचित है । विष्णुपुराण के अनुसार ऋक्ष नामक भार्गव वाल्मीकि हुए हैं। “ऋक्षोऽभूद्‌भार्गवस्तस्माद् वाल्मीकिर्योऽभिधीयते ॥” वाल्मीकिरामायण में भी— “सन्निबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विंशत्सहस्रकम् । उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना ॥” (वा० रा० ७।९४।२५) इत्यादि वचनों में वाल्मीकि को भार्गव कहा गया है । वाल्मीकिरामायण में ही वाल्मीकि को प्रचेता का दसवां पुत्र कहा गया है । ‘वेदः प्राचेतसादासीत्’ इस लव-कुश के मंगलाचरण पुराणवचन में भी वाल्मीकि को प्राचे- तस कहा गया है । इन सब वचनों के अनुसार विदित होता है कि पृथु के प्रपौत्र प्राचीनबहीं राजर्षि ही प्रचेता हुए हैं । उनके ही दस प्रचेतस पुत्र हुए हैं। उन्हीं में अन्तिम वाल्मीकि थे, अथवा पूर्व के प्राचेतस मुनि ही शापवशात् विप्र होकर पुनः वाल्मीकि हुए हैं अथवा भृगु मुनि का ही प्रचेता भी नाम था । उनके दस पुत्रों में अन्तिम वाल्मीकि थे । वही निश्चल होकर तप में संलग्न हुए थे । उनपर वल्मीक बन गया था, पुनः उस वल्मीक से प्रादुर्भूत होने के कारण वे वाल्मीकि कहलाये । ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार लोक-पितामह ब्रह्मा ने वल्मीकप्रभूत होने से उन्हीं को 'वाल्मीकि' नाम प्रदान किया है— “अथाब्रवीन्महातेजा ब्रह्मा लोकपितामहः । वल्मीकप्रभवो यस्मात्तस्माद् वाल्मीकिरित्यसौ ॥” मातृगर्भ के समान वल्मीक में रहने के कारण वही महात्मा वाल्मीकि कहलाये । ब्रह्मवैवर्तपुराण २२ वें अध्याय में कहा गया है— “कति कल्पान्तरेऽतीते स्रष्टुः सृष्टिविधौ पुनः । यः पुत्रश्चेतसो धातुः बभूव मुनिपुङ्गवः ॥ तेन प्रचेता इति च नाम चक्रे पितामहः ।”