भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६९ महाभारत के अनुसार भगवान् व्यास ही भारत या महाभारत के रचयिता हैं। वे भला राम के समकालिक रामायण और उसके कवि से कैसे अपरिचित रह सकते हैं। जैसे पाश्चात्यों की रामायण और आदि- रामायण की कल्पना निर्मूल है वैसे ही भारत एवं महाभारत की कल्पना भी निर्मूल है। संस्कृत भाषा सर्वप्राचीन भाषा है तथापि संस्कृत, जेन्द, लैटिन, ग्रीक आदि भाषाओं का साम्य देखकर पाश्चात्यों ने उनकी जननी किसी नयी भाषा की कल्पना कर डाली, जिसके अस्तित्व में कोई प्रमाण नहीं है। वैसे ही उन्होंने महाभारत से भिन्न एक भारत की भी जो निर्मूल कल्पना कर डाली है वह निरी दुरभिसन्धि ही है। जिन पर्वों में रामकथाएँ कम हैं उन्हें प्राचीन और जिनमें अधिक हैं उन्हें नवीन तथा जिनमें रामकथा का अभाव है एवं उसके पात्रों का अस्तित्व है वह मूल भारत है यह कल्पना भी अन्योन्याश्रयदोष से ग्रस्त है। रामायण की अर्वाचीनता सिद्ध होने पर ही उसके उल्लेख से पर्वों की अर्वाचीनता सिद्ध होगी। इसी प्रकार पर्वों की अर्वाचीनता सिद्ध होने से ही रामायण की अर्वाचीनता सिद्ध होगी । पर जब रामायण की प्राचीनता रामायण महाभारत दोनों से ही सिद्ध है, तब इस आधार पर किन्हीं पर्वों की अर्वाचीनता कैसे सिद्ध हो सकेगी ? इसी लिए कौन सा पर्व प्रामाणिक है एवं कौन-सा अप्रामाणिक इसकी कोई कसौटी पाश्चात्यों के पास नहीं है। बुल्के के अनुसार "युद्धसम्बन्धी पर्वों में द्रोणपर्व सबसे अर्वाचीन है। उसमें रामकथा का चौदह बार उल्लेख है। भीष्म, कर्ण और शल्य पर्वों में पाँच बार उल्लेख आता है। आरण्यक-पर्व में रामकथा का दो बार वर्णन है। इसके अतिरिक्त भी उसमें रामकथाओं का पन्द्रह बार सङ्केत मिलता है। यह पर्व अपेक्षाकृत अर्वाचीन है। यह कथाओं तथा उपाख्यानों का भण्डार है। इस पर्व में राम का अवतार होने का भी उल्लेख है। इससे स्पष्ट है कि पर्वों की अर्वाचीनता का मूल अधिकाधिक रामकथा उल्लेख ही है ?” परन्तु यह मूल नहीं सर्वथा ही अमूल है। आरण्यकपर्व में भीम और हनुमान् की कथा एवं संक्षेप में रामकथा का प्रसंगानुसार वर्णन ठीक ही है। संक्षिप्तकथन में कुछ सामग्रियों का छूट जाना भी असंगत नहीं है। इसी तरह द्रोणपर्व की कथा में भी बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड की सामग्री का न होना असंगत नहीं, क्योंकि वहाँ तो षोडशराजोपाख्यान का उद्देश्य प्रभावशाली राजाओं के भी परलोक-गमन का वर्णन कर शोक-निवारणमात्र है, अतः सबका वर्णन इष्ट नहीं है। शान्तिपर्व में युधिष्ठिर की शोक-निवृत्ति ही इष्ट है। महाभारतवनपर्व में हनुमान्-संवाद में हनुमान् ने कहा है— “अथ दाशरथिर्वीरो रामो नाम महाबलः। विष्णुर्मानुषरूपेण चचार वसुधातborderलम् ॥” (म० भा० ३।१४७।३१) अर्थात् विष्णु ने ही मानुषरूप में दाशरथि राम होकर वसुधा को उपकृत किया था। रामोपाख्यान में ब्रह्मा ने कहा कि मेरे अनुरोध से चतुर्भुज विष्णु रावण-वधार्थ हुए हैं, वे रावण-वध करेंगे। धौम्य ने कहा है — “विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य वै। दशग्रीवो हतश्छन्नं संयुगे भीमकर्मणा ॥” (म० भा० ३।३१५।२०) “यमस्य नेता नमुचेश्च हन्ता ।” (म० भा० ३।२५।१०) “असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः। मार्कण्डेयश्च गोविन्दे कथयन्त्यद्भुतं महत् ॥” ( म० भा० १२।२०७।४ )