भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( १० ) रावण का प्रणिधि अकम्पन कहता है— असाध्यः कुपितो रामो विक्रमेण महायशाः । आपगायास्तु पूर्णाया वेगं परिहरेच्छरैः ॥ २३ ॥ सताराग्रहनक्षत्रं नभश्चाप्यवसादयेत् । असौ रामस्तु सीदन्तीं श्रीमानभ्युद्धरेन्महीम् ॥ २४ ॥ भित्त्वा वेलां समुद्रस्य लोकानाप्लावयेद् विभुः । वेगं वापि समुद्रस्य वायुं वा विधमेच्छरैः ॥ २५ ॥ संहृत्य वा पुनर्लोकान् विक्रमेण महायशाः । शक्तः श्रेष्ठः स पुरुषः स्रष्टुं पुनरपि प्रजाः ॥ २६ ॥ नहि रामो दशग्रीव शक्यो जेतुं रणे त्वया । रक्षसां वापि लोकेन स्वर्गः पापजनैरिव ॥ २७॥(वा० रा० ६।३३।१) कुपित होकर काल के तुल्य संहार करने में प्रवृत्त हुए राम को और तो और ब्रह्मा आदि भी पराक्रम से नहीं रोक सकते । राम बाढ़ से लबालब भरी नदी का वेग बाणों से रोक सकते हैं, आकाश को भी त्रिविक्रमावतार की तरह तारारहित कर सकते हैं, यज्ञवराह के तुल्य जलमग्न पृथ्वी का उद्धार कर सकते हैं, शरों से समुद्र के तट- बन्धरूप मर्यादा को तोड़ कर सब लोकों को जलमग्न कर सकते हैं । शरों से समुद्र तथा वायु के वेग को रोक सकते हैं । महायशा राम विक्रम द्वारा सब लोकों का संहार कर फिर सारी प्रजा की नई सृष्टि करने में समर्थ हैं । हे दशकन्धर, तुम रण में राम को कदापि नहीं जीत सकते । तुम अकेले तो क्या सब राक्षसों के साथ भी उन्हें नहीं जीत सकते । रावण द्वारा मायामृग बनने के लिए अनुरोध करने पर मारीच कहता है— रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः । राजा सर्वस्य लोकस्य देवानामित्र वासवः ॥ १३ ॥ अप्रमेयं हि तत्तेजो यस्य सा जनकात्मजा । न त्वं समर्थस्तां हर्तुं रामचापाश्रयां वने ॥ १४ ॥ राम मूर्तिमान् धर्म हैं, सज्जनशिरोमणि हैं, उनका पराक्रम परम सत्य है जैसे देवताओं के इन्द्र राजा हैं वैसे ही वे सब लोकों के राजा हैं । वह तेज असीम हैं जिनकी पत्नी जनकनन्दिनी जानकी हैं । रावण, राम के बाणों से सुरक्षित उसे तुम हरने में सक्षम नहीं हो । उसे तुम्हें हरने का विचार नहीं करना चाहिये । ऐसा करना सर्वनाश को निमन्त्रण देना है । ऋषियों ने, देवताओं और गन्धर्वों ने यज्ञ की पूर्णाहुति एवं मन्त्र-संस्कृत वसोर्धारा के समान प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करती हुई सीता को देखा । धर्मात्मा राम बाष्पाकुललोचन होकर मुहूर्त भर ध्यानपरायण हुए । तदनन्तर ही राजराज वैश्रवण ( कुबेर ), पितरों सहित यमराज, सहस्रनयन देवराज, जलाधिप वरुण, वृषभध्वज महादेव, ब्रह्मविदों में श्रेष्ठ लोकपितामह ब्रह्मा आदि देवगण सूर्यसंनिभ विमानों द्वारा लङ्कापुरी में राम के निकट आये एवं प्राञ्जलि हो राम से बोले—आप सब लोकों के कर्ता हैं, ज्ञानवानों में श्रेष्ठ हैं, फिर अग्नि में प्रवेश कर रही सीता की क्यों उपेक्षा कर रहे हैं ? यहाँ देवगण, इन्द्र आदि से भी राम को श्रेष्ठ कहा गया है । नागेश के अनुसार ‘विष्णु- मुखा वै देवाः’ इस श्रुति से भी यह सिद्ध है । राम ने कहा मैं तो अपने को दशरथ का पुत्र मानव जानता हूँ । मैं वास्तव में जो हूँ और जैसा हूँ वह आप बतायें ।