रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ रामायणमीमांसा चतुर्थ समाचार को सुनकर विषण्ण हो गया एवं उसने सारा वृत्तान्त विस्तार से जानना चाहा। हमने उसे सारा वृत्तान्त सुनाया। उसने कहा, मैं रावण तथा लङ्का को जानता हूँ। लङ्का समुद्र से पार त्रिकूट पर बसी है। अवश्य वहाँ जानकी मिलेगी। यह सुनकर शतयोजन समुद्र का लङ्घन कर मैंने जलराक्षसी को मारा और रावण के घर में उपवास और तप में निरत भर्तृ-दर्शनार्थ उत्सुक सीता को देखा। मैंने आर्या के समीप जाकर कहा, मैं राम का दूत मारुतात्मज हूँ। समुद्र पार कर आया हूँ। श्रीराम और लक्ष्मण कुशली हैं। राम तुम्हारे लिए बहुत बड़ी वानर-सेना के साथ आयेंगे। विश्वास करो, मैं वानर हूँ, राक्षस नहीं हूँ— "प्रत्ययं कुरु मे देवि वानरोऽस्मि न राक्षसः ।" थोड़ी देर सोचकर सीता ने कहा—अविन्ध्य के कहने से मैं जानती हूँ तुम हनुमान् हो। उसने त्रिजटा के द्वारा सब समाचार दिया है। सीता ने अभिज्ञानस्वरूप मणि दी, जिसे उन्होंने धारण कर रखा था एवं विश्वासार्थ चित्रकूट में कौए के लिए क्षिप्त ईषिका की कथा बतायी। उसके बाद मैंने सारा उपवन उजाड़ दिया। पकड़े जाने पर लङ्का पूरी तरह जला डाली। तदुपरान्त पुनः समुद्र लाँघ कर मैं यहाँ आया हूँ। बुल्के लङ्का-दाह को क्षेपक मानते हैं। पर यह रामोपाख्यान से विरुद्ध है। वहाँ स्पष्टतः यह उल्लेख है— "ततो दग्ध्वा पुरीं च ताम् ॥" २८३ वें अध्याय के अनुसार वहाँ कोटि कोटि वीर वानर एकत्रित हुए। गज, गवय, गवाक्ष, गन्धमादन, पनस, जाम्बवान् आदि महापराक्रमी बड़े-बड़े वानर करोड़ों वानर वीरों के साथ आये। शुभ मुहूर्त्त में सेनाव्यूह बनाकर सुग्रीवसहित श्रीराम और लक्ष्मण ने लङ्का के लिए प्रस्थान किया। सेना के मुहाने पर हनुमान् तथा पृष्ठरक्षार्थ लक्ष्मण सन्नद्ध हुए। साल, ताल एवं शिला रूप आयुधवाली नल, नील, अङ्गद, मैन्द, द्विविद आदि से पालित महती सेना ने रामकार्यार्थ चलकर सागरतट के प्रशस्त फल और जल से परिपूर्ण क्षेत्रों में पड़ाव डाल दिया। अब समुद्रलङ्घन का प्रश्न सामने आया। किसी ने लङ्घन की बात कही, किसी ने नावों का प्रबन्ध करना ठीक समझा। अन्त में राम ने समुद्र से मार्ग माँगने के लिये व्रत करने का निश्चय किया। समुद्र से सदुत्तर न मिलने पर बाण से समुद्र के शोषण की बात कही। सागर ने स्वप्न में दर्शन दिया और राम से कहा—"मैं आपके मार्ग में विघ्न नहीं बनना चाहता हूँ, परन्तु यदि आपके बाण के भय से मार्ग देता हूँ तो अन्य लोग भी धनुष के बल पर मुझे ऐसी ही आज्ञा देंगे। आपकी सेना में त्वष्टा का पुत्र नल नाम का वानर है। वह जिस काष्ठ, तृण या शिला को समुद्र में डालेगा मैं उसको धारण करूँगा। इस तरह पुल बन जायेगा। राम ने नल को आज्ञा दी और नल ने सेना की सहायता से दस योजन चौड़ा एवं सौ योजन लम्बा सेतु बना दिया। उसी प्रख्यात नल द्वारा निर्मित सेतु से राम ने सेना के साथ समुद्र पार किया। उसके पहले ही विभीषण राम की शरण में आ चुका था। राम ने उसका स्वागत किया। सुग्रीव को शङ्का हुई कि यह रावण का प्रणिधि हो सकता है। परन्तु राम ने विभीषण की सत्य चेष्टाओं तथा उसके आचरणों से सन्तुष्ट होकर उसे सर्वराक्षसराज्य पर अभिषिक्त किया और उसे अपना मन्त्री बनाया। उसकी सम्मति से समुद्र पार कर लङ्का के उद्यानों में श्रीराम ने सेनासहित पड़ाव डाला। वहाँ वानररूप में शुक तथा सारण नामक रावण के चर आये। वे पकड़े गये और उन्हें सेना दिखाकर छोड़ दिया गया एवं प्राज्ञ अङ्गद को दूत बनाकर लङ्का भेजा गया।