रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 170, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ९३ २८४ वें अध्याय के अनुसार रावण की लङ्का नाना प्रकार के शस्त्रास्त्रों से युक्त, कपाट-यन्त्र तथा वीरों से सुरक्षित थी। अङ्गद ने निर्भय होकर लङ्काद्वार पर जाकर रावण को सूचना दी। उसकी अनुमति से वे अनेक करोड़ राक्षसों की सेना के बीच निर्भय होकर पहुँचे। वहाँ बादलों की घटा से घिरे हुए सूर्य के समान वे शोभित हुए। अङ्गद ने मन्त्रियों से परिवृत रावण से कहा—"कोसलेन्द्र ने कहा है कि अन्यायरत अकृतात्मा राजा को पाकर देश, नगर सब नष्ट हो जाते हैं। तुमने सीता का हरण किया है। बल के दर्प से ऋषियों तथा राजर्षियों को मारा है। रोती हुई स्त्रियों का हरण किया है। उस सबका फल तुम्हारे सामने है। मैं तुम्हारा वध करूँगा। साहस हो तो युद्ध करो। मेरे धनुष का बल देखो। जानकी को लौटा दो अन्यथा लोक को राक्षस-हीन बना दूँगा।" यह सुनकर राजा क्रोधमूर्च्छित हो गया। उसके इङ्गित को जाननेवाले चार राक्षस अङ्गद के चारों अङ्गों को पकड़ने लगे। उनके साथ ही अङ्गद उछलकर महल की छत पर जा चढ़े। अङ्गद के वेग से छूटकर चारों धरणीतल पर गिरे और मर गये। अङ्गद ने राम के पास आकर सब समाचार सुनाया। राम ने वायु के समान वेगवाले वानरों द्वारा लङ्का के प्राकार को तुड़वा दिया। विभीषण की सम्मति से लङ्का-द्वार को घेर लिया और विविध वानरों को युद्ध करने के लिए आदेश दिया। वे सब लङ्का को नष्ट करने लगे। उधर से राक्षस भी युद्ध के लिए सन्नद्ध हो गये। राम और लक्ष्मण के बाणों से राक्षसवीर नष्ट होने लगे। अन्त में राम की आज्ञा से युद्ध का प्रत्याहार हुआ। २८५ वें अध्याय के अनुसार जब वानर सैनिक शिविर में प्रवेश करने लगे तब रावणसेना के पवन, जम्भ, खर आदि ने क्रोधवश उनपर धावा बोल दिया। वे दुरात्मा अन्तर्धानविद्या से अदृश्य होकर वानरों को मारने लगे; परन्तु विभीषण ने अपनी विद्या से उनकी शक्ति नष्ट कर दी। दृश्य होते ही वे वानरों द्वारा मारे जाने लगे। तब सदलबल रावण स्वयं युद्धभूमि में आया। उसने शुक्रनीति के अनुसार व्यूह का निर्माण कर वानरों को घेर लिया। राघव ने बार्हस्पत्य नीति के अनुसार सेना का व्यूह बनाया और श्रीराम रावण का घोर युद्ध हुआ। बड़े बड़े राक्षस वानरों से भिड़ गये, जिससे चराचर जगत् व्यथित हो उठा। प्रहस्त ने विभीषण पर प्रहार किया, परन्तु शतघण्टावाली महाशक्ति को अभिमन्त्रित कर विभीषण ने प्रहस्त को मार डाला। हनुमान् एवं धूम्राक्ष का महान् युद्ध हुआ। श्रीहनुमान् ने धूम्राक्ष को मार डाला। रावण ने महान् प्रयत्न से कुम्भकर्ण को जगाया। वह भी भीषण युद्ध करते हुए रामदर्शन की लालसा से आगे बढ़ा। सामने धनुष्पाणि लक्ष्मण को देखा। वानरों ने उसपर वृक्षों, शिलाओं तथा विविध प्रहरणों से प्रहार किया। वह हँसता हुआ वानरों को खाने लगा। तब निर्भय होकर सुग्रीव ने कुम्भकर्ण पर भीषण प्रहार किया। कुम्भकर्ण महानाद कर सुग्रीव को दोनों बाहुओं से पकड़कर लङ्का की ओर चल पड़ा। लक्ष्मण ने उसका पीछा किया। अपने भीषण बाणों से उसके कवच को छिन्न-भिन्न कर उसे लहूलुहान कर दिया। वह सुग्रीव को छोड़कर लक्ष्मण की ओर दौड़ा। महेष्वास कुम्भकर्ण 'तिष्ठ, तिष्ठ' कहता हुआ महती शिला लेकर दौड़ा। लक्ष्मण ने उसके उच्छ्रित हाथों को क्षुरों से काट दिया। दोनों भुजाओं के कटते ही वह चार भुजावाला हो गया— "स बभूव चतुर्भुजः" उसने चारों भुजाओं से बड़ी चट्टानों को उठा लिया। सौमित्रि ने बड़ी फुर्ती के साथ बाणों से उसकी चारों भुजाएँ काट डाली। अन्त में वह लक्ष्मण के दिव्य अस्त्रों से वज्रदग्ध पादप के तुल्य जलकर मर गया। तदनन्तर भागती हुई राक्षसी सेना को प्रमाथी ने रोका। श्रीलक्ष्मण का उससे घोर युद्ध हुआ। श्रीहनु- मान् ने पर्वतशृङ्ग से वज्रवेग को और नील ने प्रमाथी को मार गिराया। तदनन्तर अन्य राक्षसों एवं वानरों के युद्ध हुए।