रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ रामायणमीमांसा चतुर्थ २८८ वें अध्याय के अनुसार रावण ने इन्द्रजित् को युद्ध करने के लिए प्रोत्साहित करते हुए कहा, वत्स ! तुमने सहस्राक्ष इन्द्र को जीतकर मेरा यश बढ़ाया है । तुम चाहे प्रकट चाहे अन्तर्हित होकर दिव्य शरों से शत्रुओं को मार डालो । प्रहस्त, कुम्भकर्ण आदि ने खर का बदला नहीं चुकाया, तुम उसका बदला चुकाओ । इन्द्रजित् रथारूढ़ हो रणक्षेत्र में पहुँचा । उसने नाम सुनाकर लक्ष्मण का आह्वान किया । लक्ष्मण अपने तलघोष से राक्षसों को त्रस्त करते हुए सामने आये । दोनों का भयङ्कर युद्ध हुआ । रावण-पुत्र इन्द्रजित् बाणों द्वारा लक्ष्मण से आगे बढ़ न सका । तब उसने महान् यत्न से वेगशाली तोमरों की वर्षा की । लक्ष्मण ने उन्हें भी तीक्ष्ण बाणों से काट दिया । अङ्गद ने तीव्र वेग से इन्द्रजित् पर प्रहार किया । इन्द्रजित् ने सावधानी से भीषण प्रास से अङ्गद को मारना चाहा; पर लक्ष्मण ने उसे बीच में ही काट दिया । फिर, उसने गदा से अङ्गद पर प्रहार किया । अङ्गद ने उसपर महान् साल वृक्ष के तने से प्रहार किया । उससे इन्द्रजित् के सारथि, अश्व और रथ नष्ट हो गये । इन्द्रजित् उस समय अन्तर्हित हो गया । महामायावी इन्द्रजित् के अन्तर्हित होने पर राम ने स्वयं आकर सैन्यरक्षा का भार संभाला । इन्द्रजित् ने वरदान में प्राप्त बाणों से राम को क्षत-विक्षत करना आरम्भ कर दिया । राम और लक्ष्मण दोनों ही अदृश्य मेघनाद से लड़ते रहे । उसने सहस्रों बाणों द्वारा राम तथा लक्ष्मण को विद्ध किया । अदृश्य इन्द्रजित् को ढूंढते हुए वानर वीर आकाश में प्रविष्ट हुए । उसने उनपर भी भीषण प्रहार किये । २८९ वें अध्याय के अनुसार उसने रणाङ्गण में गिरे हुए राम और लक्ष्मण को वरदानप्राप्त बाणों द्वारा सब ओर से बाँध दिया । पिंजड़े में पक्षी के समान दोनों पुरुषव्याघ्र बँध गये । सुग्रीव, सुषेण, मैन्द, द्विविद, कुमुद, अङ्गद, हनुमान्, नल, नील आदि मिलकर दोनों की रक्षा करने लगे । इतने में विभीषण ने आकर प्रज्ञास्त्र द्वारा दोनों को प्रबुद्ध किया एवं सुग्रीव ने अभिमन्त्रित विशल्या औषधि से दोनों को क्षणभर में स्वस्थ कर दिया । राम और लक्ष्मण दोनों क्षणभर में पुनः युद्धार्थ सन्नद्ध हो गये । विभीषण ने कृताञ्जलि होकर कहा, राजाधिराज कुबेर के आज्ञानुसार एक गुह्यक जल लिये हुए श्वेत पर्वत से आया है । कुबेर के अनुसार इस जल को आँख में लगाने से अदृश्य प्राणियों को भी आप देख सकेंगे । आप यह जल जिसे देंगे वह भी अन्तर्हित प्राणियों को देख सकेगा । दोनों ने उस संस्कृत जल से नेत्र धोये और सुग्रीव, हनुमान्, अङ्गद, जाम्बवान्, नील आदि प्रमुख वानरों ने भी उस जल से अपने अपने नेत्र धोये । सबकी आँखें अतीन्द्रिय पदार्थों को भी देखने लगीं । उधर इन्द्रजित् अपना पराक्रम पिता को बताकर शीघ्रता से पुनः रण-भूमि में आ गया । उसको आते देख विभीषण की सम्मति से लक्ष्मण आगे आये । विजय के उल्लास से इन्द्रजित् ने आह्निक कर्म भी नहीं किया । लक्ष्मण ने क्रुद्ध होकर उसपर भीषण बाणों से प्रहार करना प्रारम्भ किया । दोनों में आश्चर्यजनक युद्ध हुआ । सौमित्रि के बाणों से आहत होकर इन्द्रजित् ने नागतुल्य आठ बाण चलाये । लक्ष्मण ने एक बाण से उसके धनुषयुक्त बाहु को काट दिया, दूसरे बाण से उसके बाण सहित बाहु को काट दिया एवं तृतीय बाण से उसका मुकुट-कुण्डलयुक्त सिर काट दिया । रथ के सूत को भी मार दिया । घोड़ों ने सूत के बिना उसके रथ को लङ्का में पहुँचा दिया । रावण मृत पुत्र को देखकर विक्षुब्ध मन होकर वैदेही को मारने चला । परन्तु अविन्ध्य ने समझाबुझाकर उसे स्त्री-हत्या से निवृत्त किया । २९० वें अध्याय के अनुसार रथारूढ़ होकर वह स्वयं युद्धभूमि में आया । सब वीरों ने उसपर एक साथ आक्रमण कर दिया, मायावी रावण ने माया का प्रयोग किया । उसके शरीर से सहस्रों राक्षस युद्ध के लिए निकल पड़े । राम ने सबको मार डाला । उसने सहस्रों राम तथा लक्ष्मण के रूप बनाकर राम और लक्ष्मण तथा वानरों पर आक्रमण किया । सौमित्रि की सम्मति से राम ने उस माया को भी नष्ट कर दिया । इतने में मातलि आदित्य के अश्वों के तुल्य हर्यश्वों से युक्त रथ लेकर आया । श्रीराम से उसपर चढ़कर युद्ध करने की प्रार्थना करने लगा । राम को शङ्का हुई कि यह भी कहीं रावण की माया तो नहीं है, परन्तु विभीषण ने कहा—यह माया नही है ।