रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय महाभारत का रामोपाख्यान ९५ राम ने रथारूढ़ होकर बड़े रोष से रावण पर आक्रमण किया। समस्त प्राणी हाहाकार करने लगे। देवलोक में नगाड़े बजने लगे। उन दोनों के युद्ध की और कोई उपमा नहीं थी। उनका युद्ध उनके युद्ध के ही तुल्य था-- "अलब्धोपममन्यत्र तयोरेव तथाभवत् ॥" राम पर रावण ने ब्रह्मदण्ड तुल्य शूल छोड़ा। राम ने उसे काट दिया। उस दुष्कर कर्म को देखकर रावण को भय हुआ। फिर उसने बहुत शस्त्रास्त्र चलाये। रावण की माया देख डरकर सब वानर भागने लगे। तब राम ने तूणीर से हेमपुङ्ख सुपत्न सुमुख बाण निकाला। उसे ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित कर प्रयुक्त किया। यह देखकर देव, गन्धर्व आदि प्रसन्न हुए। उसके छूटते ही रथ और सारथि से युक्त रावण महाज्वालामाली अग्नि से परिप्लुत होकर प्रज्वलित हो उठा। सबने हर्ष से देखा कि ब्रह्मास्त्र के तेज से वह दग्ध हो उठा। रावण को मारने पर महर्षियों सहित देवताओं ने महाबाहु राम को विविध आशीर्वाद दिये तथा उनपर पुष्प वृष्टि की। विभीषण और अविन्ध्य ने सीता को लाकर राम से कहा, 'महाबाहो ! आप अपनी सद्वृत्ता पत्नी को ग्रहण करें।' राम ने शोककर्षित, मलोपचितसर्वाङ्गी, जटिला, कृष्णवस्त्रा, सीता को देखकर कहा--वैदेही ! जाओ, तुमसे मेरा कोई कार्य नहीं है। मुझ जैसे पति को प्राप्त कर वृद्धावस्था तक तुम्हें राक्षस के गृह में न रहना पड़े, इसी लिये मैंने रावण को मारा है। बुल्के कहते हैं--"राम का सीता में उत्कृष्ट प्रेम था और वह अन्त तक नहीं बदला। वे सीता के प्रति शङ्कायुक्त कटुवचन कैसे कहते, इसी लिये महाभारत रामोपाख्यान में अग्निपरीक्षा का संकेत तक नहीं मिलता।" परन्तु उनका यह कथन सरासर धोखा देना है, क्योंकि रामोपाख्यान में स्पष्ट ही राम की सीता के प्रति शङ्का और वायु, अग्नि आदि देवों तथा ब्रह्मा द्वारा सीता की शुद्धि का वर्णन है-- "कथं ह्यस्मद्विधो जातु जानन् धर्मविनिश्चयम् । परहस्तगतां नारीं मुहूर्त्तमपि धारयेत् ॥१२॥ सुवृत्तामसुवृत्तां वाप्यहं त्वामद्य मैथिलि । नोत्सहे परिभोगाय श्वावलीढं हविर्यथा ॥"१३॥ चाहे तुम सुवृत्त हो या असुवृत्त हो, श्वान के द्वारा स्पृष्ट हवि के समान मैं तुम्हें ग्रहण नहीं कर सकता। "ततः सा सहसा बाला तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः । पपात देवी व्यथिता निकृत्ता कदली यथा ॥"१४॥ वैसा दारुण वचन सुनकर सीता सहसा मूर्च्छित होकर वैसे ही गिर पड़ीं जैसे कटी हुई कदली गिर पड़ती है। "योऽप्यस्या हर्षसंभूतो मुखरागस्तदाऽभवत् । क्षणेन स पुनर्नष्टो निःश्वास इव दर्पणे ॥"१५॥ जो क्षण भर के लिये उसके मुख पर प्रसन्नता की लहर दौड़ रही थी वह भी निःश्वास से उपहत (मलिन) दर्पण की तरह नष्ट हो गई। "ततस्ते हरयः सर्वे तच्छ्रुत्वा रामभाषितम् । गतासुकल्पा निश्चेष्टा बभूवुः सहलक्ष्मणाः ॥"१६॥