रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ रामायणमीमांसा पञ्चम राम की कहानी राम की जबानी राम की कहानी राम की जबानी नाम की पुस्तक में भदन्त आनन्द कौसल्यायन ने एक आधुनिक नास्तिक विचारवाले युवक के रूप में राम को प्रस्तुत कर वाल्मीकि के वचनाभासों द्वारा अनेक प्रकार की दुःशङ्काएँ पैदा करने का प्रयत्न किया है। पूर्वोक्त दशरथजातक में श्रीसीता को राम की बहन बनाने का प्रयास किया गया है। वैसे संसार में अनेक व्यक्ति एवं अनेक घटनाएँ होती हैं। उनमें किसी का नाम राम हो जाय, या किसी की कुछ घटनाएँ भी वैसी हो जाएँ तो कोई आश्चर्य नहीं है। परन्तु अनादि अपौरुषेय मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेदों, उनके अङ्गों और उपाङ्गों एवं तदनुसारी रामायण, पुराणों, उपपुराणों, धर्मशास्त्रों, तन्त्रों एवं आगमों के अनुसार श्रीराम अनन्तब्रह्माण्डनायक परात्पर ब्रह्मस्वरूप ही हैं। वही कृष्ण, विष्णु आदि शब्दों से भी व्यवहृत होते हैं। उनके मर्यादापुरुषोत्तम-स्वरूप के सभी चरित्र आदर्श चरित्र हैं। वेदादि शास्त्रों के अनुसार ही उनके सब चरित्र हैं। सीता सच्चिदानन्द ब्रह्मस्वरूपिणी हैं। अवतार-लीला में वे जनकनन्दिनी, श्रीदशरथ की पुत्रवधू एवं श्रीरामचन्द्रजी की पट्टमहिषी हैं। जनता जनार्दन के लिए श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों महापुरुष न देव हैं, न मानव, बल्कि भगवान् और विष्णु के अवतार हैं। साथ ही यह भी समझना चाहिए कि वे केवल जनता की भावनामात्र नहीं, किन्तु प्रबल प्रमाण वेदादि शास्त्रों से सिद्ध हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने अपनी जीवनी स्वयं नहीं लिखी। यह लेखक के अनुसार भी लेखक की अपनी कल्पना ही है। कल्पना में वास्तविकता नहीं होती, यह स्पष्ट ही है। आपका यह कथन सही नहीं है कि तुलसीदास के लिखे 'रामचरितमानस' से उन्हें सन्तोष नहीं हुआ, इसलिए उन्होंने अपने बारे में महाकवि वाल्मीकि द्वारा उपस्थित की गयी सामग्री को प्रमाण मानकर अपनी कहानी स्वयं लिखने का निश्चय किया है। आपकी उक्त कल्पना निराधार एवं निष्प्रमाण है। तुलसीदासजी ने जो कुछ भी लिखा है वह वेद, रामायण, पुराणादि से सम्मत ही है। उक्त पुस्तक में लेखक के काल्पनिक राम ने तो वाल्मीकिरामायण को भी प्रामाणिक नहीं माना है। वाल्मीकिरामायण में विशेषतः लङ्काकाण्ड में ब्रह्मादि देवताओं ने श्रीराम को परब्रह्मस्वरूप कहा है, पर वह लेखक के काल्पनिक राम को कहाँ मान्य है? असल में वेद-शास्त्र विरोधियों को तुलसीदासजी के रामचरितमानस से भयङ्कर उद्वेग होता है, क्योंकि उसके द्वारा वेद और ईश्वर का विश्वास सुदृढ़ होता है। इसलिए लेखक रामचरितमानस के प्रभाव को न्यून करने के लिए उसे धुन्ध की संज्ञा देकर अपने हृदय के कालुष्य को प्रकट करते हैं, पर आपकी मनोवाञ्छा की पूर्ति नहीं हो सकती। रामचरितमानस का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता ही जायगा। कौसल्यायन आगे कुछ खुलकर स्पष्ट ही कहते हैं—"लेखक के राम, तुलसी के भगवान् राम तो नहीं हैं। वे बहुत कुछ वाल्मीकि के श्रीराम ही हैं।" आगे अपना हृदय व्यक्त करते हुए लिखते हैं—‘‘वाल्मीकि के राम की अपेक्षा भी वे कुछ भिन्न हैं, कुछ विशिष्ट हैं।" पर यदि लेखक के काल्पनिक राम वाल्मीकिरामायण के राम से भिन्न हैं, तो उनकी जीवनी का आधार वाल्मीकिरामायण हो भी कैसे सकता है? आगे लेखक अपनी छद्ममयी नीति के अनुसार कहता है कि—'वाल्मीकिजी सत्य के उपासक थे। उन्होंने अधिक से अधिक यथार्थ का चित्रण किया है।' इसका आन्तर अभिप्राय यह है कि उसमें अयथार्थता है। श्री- कौसल्यायन कहते हैं—‘‘ब्राह्मण उस याज्ञिक युग में क्या-क्या कुछ नहीं करते थे।" ये ही बौद्धवाद के संस्कार हैं।